पूंजीवाद तथा साम्यवाद के विपरीत विकल्प की अवधारणा है - तीसरा विकल्प

श्रद्धेय दत्तोपंत ठेगडी जन्म शताब्दी वर्ष 10.11.2019 से 10.11.2020


पूंजीवाद तथा साम्यवाद के विपरीत विकल्प की अवधारणा है - तीसरा विकल्प


संकलनकर्ता-राजीव मिश्रा 

श्रद्धेय दत्तोपंत ठेगडी जन्म शताब्दी वर्ष 10.11.2019 से 10.11.2020 तक कई सारे कार्यक्रम पूरे देश में आयोजित हो रहे हैं. उस महान आत्मा को हम सभी नमन करते हैं. उनकी दूरदर्शिता इसनी सूक्ष्म थी कि उन्होने पूरे विश्व के पूंजीवाद तथा साम्यवाद के विपरीत तीसरा विकल्प देने की प्रस्तावना पेश की. हम सभी को इस प्रस्तावना का गहन अध्ययन करना चाहिए साथ ही इस पर विविध प्रकार से इसके विभिन्न प्रकार के पहलुओं पर चर्चा भी करनी चाहिए. आम जन की भाषा के समीप ठेगडी जी के विचार को सरल तरीके से आपके समक्ष प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हूं. आाशा है आप सब इस पर चिंतन मनन अवश्य करेंगें.

हिन्दू दृष्टिकोणः जब तक जल निर्मल शांत और स्थिर नही होगा उसमें चांद तारों का प्रतिबिंम्ब स्पष्ट रुप से नही दिखाई देता. उसी प्रकार जब तक जनमानस भ्रांति के सभी आवरणों से, बौद्धिक तथा मानसिक भ्रमजाल से मुक्त नही होगा तब तक किसी भी दृष्टिकोण को ग्रहण करने की क्षमता उसमें नही होगी. सामान्य मनुष्य के पास उतना समय नही है कि वह विचार तल की सूक्षमता से अध्ययन करे। अतः वह केवल नारो, मुहावरों, शब्द जालों से संतुष्ट रहता है और उन्ही में बह जाता है.

वाल्टेयर का कहना है कि “यदि आप मुझसे बात करना चाहते हैं तो अपनी शब्दावली को पहले परिभाषित कीजिए ” अतः पहली आवश्यकता है कि जन समुदाय को सुसंगत शब्दावली का ज्ञान होने की. इसमें समय लगेगा परन्तु फिर भी यह करना ही पडेगा. तीन देशो को छोडकर साम्यवाद मर चुका है. पूंजीवाद विनाश की कगार पर है किन्तु अंतिम सांसे थोडी दूर है. तीसरे विकल्प की तलाश शुरु हो चुकी है इस कडी में इस्लामिक विद्वानों ने मुस्लिम अर्थशास्त्र को विकसित करने के योजनावद्ध प्रयास आरंम्भ किए थे, किन्तु सर्वेस्पर्शी समाधान प्राप्त नही कर सके क्योकि उन विचारों पर खुल चर्चा नही हुई.


पूंजीवाद तथा साम्यवाद के विपरीत विकल्प की अवधारणा है - तीसरा विकल्प
पूंजीवाद तथा साम्यवाद के विपरीत विकल्प की अवधारणा है - तीसरा विकल्प

भौतिकवादी पश्चिम की मान्यता थी कि जडतत्व ही आाधारभूत वस्तु है और मन केवल उसपर आधारित एक अधिरचना. फलस्वरुप सामाजिक, आर्थिक व्यवस्थाक्रम ही उसकी नीव थी. अंबेडकर ने कहा कि ” अधिकारों की रक्षा कानून से नही, अपितु समाज की सामाजिक तथा नैतिक चेतना से ही सम्भव है वे ही कानूनी अधिकार सुरक्षित -संरक्षित रख सकते हैं जिन्हे समाज चेतना वैध अधिकार के रुप में मान्यता देती है. किन्तु यदि समाज द्वारा ही मूलभूत अधिकारों का विरोध किया जाए तो न कानून, पार्लियामेंट न ही न्यायपालिका उनकी सही अर्थ में गारंटी ले सकेगी.“  अब्राहम लिंकन कहते हैं “जन सामान्य की भावनाओं के अनुकूल हो तो कुछ भी असफल नही होता और उसके विरोध में कुछ भी सफल नही होता अतः जनभावना को अपने अनुकूल ढाल सकने की पैठ कानून बनाने वालों या विधिनिर्णायकों से अधिक गहरी होगी. कानून अथवा निर्णय के क्रियान्वयन को संभव या असंभव बनाना उसी के हाथ में होता है.”

इस प्रकार संविधान के सफल क्रियान्वयन की सही गारंटी न संस्थागत चैखट में रहती है न उस प्रदेश के कानून में, अपितु वह सामान्यजन की चेतन के स्तर में ही अंतर्निहित होती है. कोई भी पाश्चात्य विद्वान, शासनाधिकार के विकेन्द्रीकरण के साथ एकता की कल्पना भी नही कर सकता क्योकि यह उनकी समझ के परे है कि क्षेत्रीय, औद्योगिक तथा नागरी स्वयंशासन के साथ साथ कोई केन्द्रीय एकात्म अधिसत्ता भी हो सकती है जो कि भारतीय समाज व्यवस्था की विशेषता है.

पश्चिमी सोच के अनुसार राष्ट्रवाद साम्राज्यवाद में निहित रहता है और अंतराष्ट्रीयता होती है अपने स्वदेशी से गद्दारी. इसके उलट भारतीय की एकात्मता की प्रणाली ने हमें विश्वराज्य की ऐसी संकल्पना के लिए सक्षम बनाया है जो विविध संस्कृतियों के विकास और योगदान से समृद्ध होगा. जिसमें सभी धर्मो के साथ-2 उनमें भौतिकतावाद भी समाविष्ट है-मानवधर्म परिपुष्ट होगा.

यह सर्वविदित है कि ”अर्थ“ तथा ”काम“ पुरुषार्थ जीवन के भौतिक पक्ष हैं जो धर्म तथा मोक्ष नामक अभौतिक मूल्यों में एकरस हो चुके हैं. भौतिक पक्ष की यहां न तो उपेक्षा की गई है न ही उसे महत्व दिया गया है. एक ओर भौतिक लाभ और उपभोग और दूसरी ओर अभौतिक मूल्य पर आधारित सामाजिक प्रतिष्ठा तथा कीर्ति.  

सामाजिक प्रतिष्ठा जितनी ऊंची, सुखोपयोग की मात्रा उतनी ही कम और सुखोपयोग का दायरा जितना अधिक विस्तृत, उतनी ही मात्रा में प्रतिष्ठा कम” हम भूल गए हैं कि वाह्म क्रांति से पूर्व आंतरिक क्रांति आवश्यक होती है.  

वाद से दूरी
       
साधारण मनुष्य सदैव किसी न किसी “वाद” के पीछे दौडता है क्योकि उसमें उसे कुछ निश्चिंता प्राप्त होती है. महान विचारकों की जिज्ञासा कभी शांत नही होती. उन्हे लगता है कि संदेह की अवस्था ठीक नही, किन्तु निःसंदेह होना भी मूर्खता है. वे “वाद” का समर्थन नही करते क्योकि “वाद” तो स्वभाव से ही विचारों की बंद पुस्तक के समान होता है.

वाल्टेयर ने ”अच्छे ब्राम्हण की कथा लिखाी“ जो इस प्रकार है-

ब्राम्हण : मेरा बस चलता तो मै पैदा ही नही होता.
वाल्टेयर: ऐसा क्यो?

ब्राम्हण : मै चालीस वर्षो तक अध्ययन करता रहा और मुझे लगा कि इसना सारा समय व्यर्थ गया. मेरा विश्वास है कि मै भौतिक तत्वों से बना हूं पर यह नही जान पाया कि “विचारो” को कौन जन्म देता है? मै यह भी नही जानता कि क्या मेरी आकलन शक्ति भी मेरी चलने की शक्ति या पाचन शक्ति के समान ही एक विधा है? या जैसे मै अपने हाथों से कोई वस्तु ग्रहण करता हूं? मै बहुत बोलता हूं और बोल चुकने के बाद भी उतना ही संभ्रमित रहता हूं और लज्जित हो जाता हूं.

उसी दिन, एक वृद्ध महिला के साथ वाल्टेयर का वार्तालाप हुआ जो उस ब्राम्हण की पडोसन थी. वाल्टेयर ने उससे पूछा कि हमारी आत्मा कैसे बनी है? इस विषय में कुछ भी न जानने के कारण क्या तुम कभी दुःखी हुई हो?

वृद्धा वाल्टेयर का प्रश्न ही न समझ सकी. जिस प्रश्न को लेकर अच्छा ब्राम्हण इतना व्यथित था, उस पर उस वृद्धा ने जीवनभर में एक पल भी नही सोचा था. विष्णु के अवतार पर उसकी असीम श्रद्धा थी और गंगाजल से अध्र्य चढाने का अवसर मिलता तो वह स्वयं को सबसे भाग्यवान महिला मानती. उस दरिद्री वृद्धा की आनंदवृति से अभिभूत होकर वाल्टेयर फिर उस दार्शनिक के पास गया और कहाः-

वाल्टेयर: क्या आपको इस शोचनीय दशा पर लज्जा नही आती, जब कि आप से पचास गज की दूरी पर रहने वाली महिला कुछ भी नही सोचती, फिर भी सुखी है?

बा्रम्हण: तुम ठीक कहते हो. मैने हजारो बार सोचा है कि अपनी बूढी पडोसन के समान अज्ञानी होता तो मै सुखी हो जाता ! परंतु मै उस प्रकार का सुख नही चाहता.

वाल्टेयर ने लिखा कि ब्राम्हण के उस उत्तर ने मुझ पर ऐसी गहरी छाप छोडी जैसी पहले की किसी बात से नही पडी थी. सभी “ वादो” के अनुयायी भी उतने ही सुखी, उतने ही आत्मतृप्त और उतने ही आत्मविश्वासी हैं, जितनी इस कथा की वृद्धा!

संकलनकर्ता
✍  राजीव मिश्रा 

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