पुर्ननिर्वाण की प्रक्रिया का आरम्भ बिन्दु

तीसरा विकल्प (लेखक दत्तोपंत ठेंगड़ी)


पुर्ननिर्वाण की प्रक्रिया का आरम्भ बिन्दु



पुस्तक - तीसरा विकल्प 
(लेखक दत्तोपंत ठेंगड़ी)

संकलनकर्ता - राजीव मिश्रा (संकलन - भाग-2)


हमने अभी तक उन स्नायविक (बेचैन) तथा मानसिक असंतुलन से उत्पन्न समस्याओं का सही मूल्यांकन नही किया है, जो व्यक्तित्व में बिखराव लाती है तथा मस्तिष्क मे अव्यवस्था उत्पन्न करती है। मन की साम्यावस्था को नष्ट करती है और जिनका अंतिम रुप आत्मघात है । हमने अभी तक कोई राष्ट्रीय समाजनीति स्थापित नही की है क्योंकि उसके लिए आवश्यक डाटा हमारे पास नही है। जीवन के भौतिक पहलू सुधारने के लिए हमारे भगीरथ प्रयत्नों का यही आरंम्भ बिन्दु है। जीवन के अभौतिक पहलू के नष्ट होने की जबरदस्त कीमत अनिवार्यतः भौतिक, सामाजिक तथा आर्थिक पक्ष में चुकानी पडती है। हमारे सामाजिक जीवन का सबसे कष्टप्रद पहलू बढता हुआ भ्रष्टाचार है।

राबर्ट सी. ब्रुक्स कहता है कि "व्यक्तिगत लाभ के लिए जानबूझकर अपना विशिष्ट कर्तव्य न करना राजकीय भ्रष्टाचार है." इलियट तथा एफ.ई. मेरिल ने कहा है कि "कारोबार की भ्रष्ट पद्धति, राजनीतिक भ्रष्टाचार और संगठित अपराध मिलकर एक ऐसा निदेशालय बन जाते हैं, जिसमें सामाजिक विघटन दुर्जेय होता है।"  छोटे मोटे अपराधों के अलावा ऐसा लगता है कि शासक वर्ग ही सबसे बडा आर्थिक अपराधी है।


हमारी प्रमुख धारणाएंः-

1. हम नही मानते कि उन्नति और विकास के लिए पश्चिम प्रतिमान ही वैश्विक आदर्श हैं।

2. पश्चिम के चिंतकों तथा उनके भारतीय अनुयायियों का यह मानन कि दुनिया के हर समाज को विकास की उन्ही अवस्थाओं से गुजरना पडेगा, जिसका अनुभव यूरोपीय समाज ने किया है। टैगोर कहा करते थे "भिन्न-भिन्न देशों के लिए भगवान ने अलग-अलग प्रश्न पत्र दिए हैं।"

3. ज्ञान तथा सत्य  वैश्विक होते हैं। सत्य के लिए वर्ग, जाति या राष्ट्र का कोई अर्थ नही। अतः हम प्रत्येक मानव के ज्ञान के समीकरण के पक्ष में हैं। जो बात विज्ञान और तंत्रज्ञान में सही होती है वह दर्शन धर्म, नीतिशास्त्र और आदर्शों के विषय में उतनी ही सही नही माननी चाहिए।

4. तीसरी दुनिया के देशों को समृद्धि के लिए अपने-अपने स्वतंत्र मार्ग खोजने पडेगें जो उनकी अपनी परम्पराओं, अवस्थाओं और आवश्यकताओं  के अनुसार होगें।

5. हमारी दृढ श्रद्धा है कि विभिन्न क्षेत्रों में मानवता से सम्बन्धित समस्याओं को सुलझााने में हमारी संस्कृति पूर्णतयः सक्षम है।

6. ‘एकात्म मानवता‘ की संकल्पना को सुस्पष्ट व्याख्या करके पं0 दीनदयाल उपाध्याय जी ने मानवता की महान सेवा की है। वे किसी ‘वाद‘ (Ism) के पक्ष में नही थे, क्योकि उसमें सोच सीमित हो जाती है, आगे नही बढती।

7. भारत जैसे प्राचीन देश के लिए, जिसकी सांस्कृतिक विरासत समृद्ध हो, यह लज्जास्पद होगा कि अपने राष्ट्रीय लक्ष्य का वर्णन करने हेतु उसे  पश्चिम की शब्दावली उधार लेनी पडे।

धर्म हमारा संदर्भ बिन्दु

महाभारत में भीष्म ने कहा कि धर्म की परिभाषा करना दुश्कर काम  है। अतःवह निश्चित रुप से ‘धर्म‘ है जो मानव का कल्याण करें। हमारे मेधावीशास्त्रपारंगत ऋषियों ने घोषित किया है कि जो धारण करता है वह "धर्म" है।

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश गजेन्द्र गडकर लिखते है - "दुनिया के अन्य सम्प्रदायों की तरह हिंदू धर्म किसी प्रेषित का दावा नही करता। इसमें किसी एक विशिष्ट देवता की पूजा नही है। इसमें न तो किसी विशिष्ट दार्शनिक संकल्पना का अनुमोदन है, न ही विशिष्ट कर्मकाण्ड का पालन। सही मायने में किसी सम्प्रदाय या पंथ के संकुचित पारंपरिक तत्वों को संतुष्ट करने की विधि उसमें नही दिखाई देती। इसका यही वर्णन किया जा सकता है कि हिन्दू धर्म जीवन की यह एक पद्धति (Way of Life) है, और कुछ नही। भारतीय चिंतन का इतिहास इस तथ्य को बलपूर्वक उजागर करता है कि हिंदूधर्म का विकास सदैव सत्य खोजने की असीम जिज्ञासा से ही अनुप्राणित रहा है। यह सत्यजिज्ञासा इसी धारणा पर अधिष्ठित है कि सत्य के अनंत पहलू को सकते हैं। सत्य मूलतया एक ही है, परन्तु विद्वान लोग इसे भिन्न-भिन्न तरीकों से वर्णित करते हैं-  "एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति"।

पं. नेहरु ने मृत्यु से दो दिन पूर्व लिखाः "आधुनिक तंत्र, वैज्ञानिक प्रक्रियाओं से लाभ उठाना तथा कृषि और उद्योग दोनों में उत्पादन बढाना भारत के लिए महत्वपूर्ण है। परन्तु यह करते समय व्यक्ति का स्तर और उसमें अन्तर्निहित ‘धर्म‘ की संकल्पना को हम न भूलें - वही हमारा परमावश्यक लक्ष्य है।"

गंतव्य

वे ही बुद्धिमान है जो किसी आदर्श से जकडे नही हैं, वे दुनिया के सुखी जीव हैं। अलेक्जेंडर पोप ने कहा है कि "जन्म लिया समूचे विश्व के लिए, किन्तु मन को संकुचित बना डाला और जो अखिल मानवजाति को देना था वह एक छोटे से समूह को दे बैठे"।  यात्रा आरंम्भ करने से पहले उसकी रुपरेखा का निर्धारण करना पडता है। क्लिफर्ड गीर्टन ने अपनी पुस्तक Ideology as a cultural system मे कहा है कि "जो  लोग राजकीय क्षेत्र में मनोवांछित फल चाहते हैं, उनके लिए विचारधाराएं सडकों के  नक़्शे (The Map) का काम करती  हैं। ऐसी  विचारधाराएं ही राष्ट्रीय पुर्ननिर्माण के व्यापकतर लक्ष्य की प्राप्ति हेतु पथ प्रदर्शक होती है। आदर्शवादी लोग मार्गो के नक़्शे (The Map) बनाते हैं और हिन्दू राष्ट्रवादियों के पास ऐसे नक़्शे पहले से ही रहते हैं.


रुपरेखा (ब्ल्यूप्रिंट)

मद्रास में पं0 दीनदयाल जी से पूछा गया कि जनसंघ की रुपरेखा (Blue Print) क्या होगी तो उन्होने कहा कि "क्या आप भावी पीढियों के हाथ बांधना चाहते है।" गांधी जी ने 20 फरवरी 1940 को ढाका में कहा कि "मेरी हार्दिक इच्छा है कि गांधीवाद शब्द का प्रचलन न हो।" सावरकर ने लेनिन से पूछा कि साम्यवादी रुस की रुपरेखा क्या होगी ? तो लेनिन ने कहा कि "किसी भी रुपरेखा का आंकलन तब होता है जब क्रियान्वयन की अवस्था तक पहुंचा जाए"।आदर्श का अंतिम विश्लेषण है - परिपूर्ण अवस्था।


संकलनकर्ता - राजीव मिश्रा
नई दिल्ली

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