अधिकारों के साथ खो रहे है शिक्षा और सम्मान ।



अधिकारों के साथ खो रहे है शिक्षा और सम्मान ।

अधिकारों के साथ खो रहे है शिक्षा और सम्मान ।

आनंद जोनवार

भारत जब आजाद हुआ तो पर्याप्त मात्रा में  स्कूल नहीं थे। देश की नई पीढ़ी को शिक्षित करने के लिए स्कूलों की मांग थी । भूखे भारत ने परिस्थितयों से जूझते हुए विकास की राह पकड़ी। हरित क्रांति और वैश्वीकरण से रफ्तार पकड़ी और तेजी से दौड़ने लगा। विकास की इस दौड़ में एक कदम शिक्षा के निजीकरण का भी था । शिक्षा का निजीकरण सरकार के संरक्षण में था और व्यापारिक नहीं था। उसका लालन-पालन खुद निजी संस्थाएं करती थी । तब यह निजी व्यवसाय न होकर शिक्षा हितैषी था ।

उस समय सरकारी स्कूल पर्याप्त नहीं थे ।तो निजी स्कूलों  ने शिक्षा का स्तर और भारत की साक्षरता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। ये वो दौर था जब साक्षरता  के साथ साथ शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ रही थी । जैसे ही 21 वी सदी में हम शिक्षा के अधिकार (RTE) के  साथ निजी शिक्षा में कूदे, वैसे ही शिक्षा का स्तर डगमगा गया। सवाल यह उठता है कि इस अधिकार की क्या जरूरत पड़ गई थी ।  हमारे संविधान में 14 साल  तक की उम्र के बच्चों को  निशुल्क शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार पहले से मौजूद था ।

राइट टू एजुकेशन (RTE) राज्य के वित्त को प्राइवेट स्कूलों  को देकर सरकारी शिक्षा तंत्र को खत्म करने की एक  दूरगामी साजिश है । इसे आप एक उदाहरण से समझ सकते है । एक कॉलोनी में 200 गरीब बच्चे है । एक सरकारी स्कूल है। उसमें 5 अध्यापक पढ़ाते है । राइट टू एजुकेशन (RTE) आने से उस कॉलोनी में चार नए निजी स्कूल खुल गए । साल दर साल पच्चीस प्रतिशत के हिसाब से बच्चे  नर्सरी, एलकेजी, यूकेजी, पहली कक्षाओं में एडमिशन लेते गए। कुछ सालों बाद  हाल ये हुआ की  उस कॉलोनी में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों  की  संख्या दस से भी कम रह गयी । इस स्थिति से सरकारी विधालय में शिक्षकों की संख्या घट गई । गरीबों की शिक्षा से खिलवाड़ करने वाली चालाक सरकार को ये आरोप लगाने का मौका मिल जाता है कि शिक्षक पढ़ाते नहीं है। दवाब और कानून का डर दिखाकर इन शिक्षकों को निलंबित या सेवानिवृत्त कर दिया जाएगा । अंततः विधालय को कम संख्या के आधार पर बंद कर दिया जाता है ।

आप सोच रहे होंगे इससे तो सरकार का पैसा बचेगा । जिसे वो विकास के अन्य  कार्यो में खर्च करेंगी । आपका सोचना लाजमी है । यदि इसे व्यापक स्तर पर देखा जाए और अनुमान लगाया जाए तो यह पैसा सरकार खर्च करने से बच जाएगी जो इन गरीब बच्चों पर मिड डे मीलपुस्तक वितरणअध्यापकों के वेतन के नाम पर खर्च किया जाता था। आपका सोचना भी सही है यदि गरीब बच्चों को इन निजी स्कूलों में सही ढंग से पढ़ाया जाए तो।

ये शिक्षा का अधिकार (RTE) तब कलंकित हो जाता है जब गरीब बच्चों से खेल-शुल्क, लाइब्रेरी-शुल्क, ड्रेस-शुल्क, यातायात-शुल्क,पुस्तक शुल्क और ना जाने  कितने शुल्क वसूले  जाने लगते हैं ।इनमें से कोई भी शुल्क की भरपाई न होने पर बच्चे को जलील किया  जाता है। बेइज्जती के साथ वाहन से  ऊतार दिया जाता है।  कहीं उस मासूम की  टीसी पर खराब चरित्र का दाग लगा दिया जाता है। उनकी पढ़ाई पर भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता । राइट टू एजुकेशन (RTE) में कक्षा आठ तक किसी को भी अनुतीर्ण करने की मनाही है जिस  के  कारण इस दशक में  50 प्रतिशत 5वी  कक्षा के छात्र कक्षा दो की पुस्तक नहीं पढ़ पाते । आठवीं  के आधे से अधिक छात्र भाग के सवाल हल नहीं कर पाते ।

ये बदहाल  स्थिति हिंदी बेल्ट में और भयावह हो जाती है । हिंदी बेल्ट के उन राज्यों में शिक्षा की स्थिति और दयनीय हो जाती है। जहाँ से होकर राजनेता सत्ता की कुर्सी तक पहुँचते है । आज प्राइवेट शिक्षा प्रणाली सरकार के दम पर पल रही है क्योंकि आरटीइ से प्रवेशित छात्र की निर्धारित शुल्क सरकारी खजाने से भरी जाती है तभी तो 2009 के बाद गली-मोहल्लों में निजी स्कूलों की बाढ़ आ गई है ।  सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले छात्र को प्राइवेट नाम का लॉलीपॉप  थमा कर सरकारी स्कूलों पर खर्च करने वाली जनता की गाढ़ी कमाई निजी स्कूलों को दे दी जाती है । जिससे अध्यापकों की कमी के साथ-साथ  बेरोजगारी बढ़ती गई और शिक्षा स्तर में भी गिरावट आ गई। ऐसे हालातों में सीमेंट कंक्रीट के स्कूल तो है पर पढ़ने और पढ़ाने वाला कोई नहीं ।

कभी गुरु की समाज में बहुत अहमियत थी। गुरु से माड साहबफिर सर  और टीचर । बदलते दौर में जिंदगी  जीने के गुर सिखाने वाला ये गुरु आज सरकार का कर्मचारी बन कर रह गया  है । गेस्ट फैकल्टी बने गुरुओं का विभाग सम्मान नहीं करता । स्थायी और अस्थायी टीचर्स में भेदभाव  बढ़ाने की नई सरकारी चाल है। वो पढ़ी लिखी नई बेरोजगार जवान पीढ़ी क्या करें जो इस अपमानित स्टेज पर आकर भी  सरकार के सम्मान की तारीफ करती है । कुछ ना होने से अच्छा है कुछ तो है, जिसके सहारे वह अपना असम्मानित जीवन यापन कर रहा है। बदलती बदहाल  शिक्षा प्रणाली में अधिकारों से शिक्षा, शिक्षक, विद्यार्थी तीनों का अपमान हो रहा है ।

लेखक

आनंद जोनवार

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