प्रहलाद की प्रतिज्ञा (कविता)



शीर्षक-'प्रहलाद की प्रतिज्ञा'


✍️प्रवीण जोरिया 'जन्नत'



मैं प्रहलाद 
हिमालय-सा अटल प्रहरी संबंधों का,
इस बार पूर्णिमा फाल्गुन मास को
कलुषित न होने दूँगा अवनि-अम्बर
बुआ जी की चिता के उठते धुएँ से,
उनके अंतः-व्योम के अहं का
दाह-संस्कार करूँगा,
न कि उनका निस्संदेह,
मैं प्रहलाद ।


मैं प्रहलाद
मैया-मन का आह्लाद,
पिता-मन का आच्छाद
हर घर का उन्माद,
इस बार अपने पिता को न डूबने दूँगा
फँसकर एकाधिपत्य के 
सनसनाते भँवर-कुण्ड में,
'मात्र नर-कल्याण ही सत्य है'
इस कर्म-पथ पर चला
उन्हें 'उन' नारायण में विश्वास दिलाऊँगा,
तो इस बार उनमें से ही प्रकटेंगे प्रभु
चारों दिशाएँ रक्त-रंजित होंगी पर
पिता-रक्त-छींटों से नहीं
प्रभु-भक्त पिता के मधुर भक्ति-गीतों से,
छिटकेगी रुधिर कणिकाओं-सी लालिमा
चहुँ ओर निस्संदेह,
मैं प्रहलाद।


मैं प्रहलाद
रक्षक-पोषक संबंधों का,
हो ली 'होली' पर प्रतिज्ञा 
छिटकते रंगों को और भी चमकीला करने की,
मैं वचनबद्ध-मैं प्रतिज्ञाबद्ध
करूँगा कथन पूर्ण अपने निस्संदेह,
मैं प्रहलाद।।




कवि

✍️प्रवीण जोरिया 'जन्नत'
कतलाहेड़ी, करनाल (हरियाणा)
चलभाष सं०-9034956534,8569928797

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