नवीन हलदूणवी - रोज सरीफ़ी रोआ दी



रोज सरीफ़ी रोआ दी


नवीन हलदूणवी


रोज सरीफ़ी रोआ दी,
ठोड्डी खूब मरोआ दी।

ढेरम - ढेरे  मूरख  जो,
कुदरत म्हेस्सा टोआ दी।

भूत बड़ा ई उड़का दा,
देवी रोज तणोआ दी।

जनता  मेरे  भारत  दी,
रातो - रात बठोआ दी।

वेवसुआस्सी झूरा दी,
मत्थे अपणे ठोरा दी।

घर नीं पुच्छ 'नवीने' दी,
तंदी  छुड़की  डोरा  दी।



नवीन हलदूणवी
8219484701
काव्य - कुंज जसूर-176201,
जिला कांगड़ा ,हिमाचल प्रदेश।

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