नवीन हलदूणवी की कविता - मत्था टेक्को



मत्था टेक्को



नवीन हलदूणवी


औआ ऊत गलांदे सारे,
घर-घर लग्गण पुट्ठे नारे।

हर कोई ऐ सुधरा करदा,
अप्पू अपणा रूप सुआरे।

बच्चे बोल्लण छल्लकबड्डी,
बांदर बोल्लण बारे - न्यारे।

माणुसता ऐ तड़फा करदी,
सुच्चमसुच्ची  सोच  वचारे।

माता अज्ज बचाए स्हांजो,
कोरोना   नैं   माह्णू   मारे।

अज्ज "नवीन" नरात्ते आए,
मत्था  टेक्को  मुड़ियै  प्यारे।

नवीन हलदूणवी
8219484701
काव्य कुंज जसूर-176201,
जिला कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश।

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