कोरोना काल में आस्तिक-नास्तिक विचार का द्वंद



कोरोना काल में आस्तिक-नास्तिक विचार का द्वंद

✍ मदन लाल

जब आदमी पर आफत आती है तो वो दूसरे की तरफ कातर दृष्टि से देखता है । अपने से बलशाली की ओर उम्मीद भरी नज़रों से देखता है कि वो मदद करेगा । परंतु जब बलशाली दिखने और खुद को ताकतवर कहने वाले पर ही आफत आन पड़े तो फिर कहाँ जाया जाए?

खुद को सर्वशक्तिमान कहने वाले देश अमेरिका, चीन, स्पेन, साउथ कोरिया, इटली या और दूसरे देश जो ये कहा करते थे कि हम हैं और बस हम ही हैं; 'कोरोना वायरस' ने घुटनों के बल ला दिया, हाथ खड़े करवा दिए सबके । और अब भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष देश है, इस कोरोना की चपेट में है । सदियों से अध्यात्म का केन्द्र रहा ये देश जहाँ हजारों मंदिर, हजारों मस्जिदें, हजारों गिरजाघर, गुरुद्वारे और विभिन्न तरह के मठ, मदरसे लोगों से खचाखच भरे रहा करते थे , जिन धार्मिक केंद्रों में पहुंच कर लोग अपनी-अपनी पूजा पद्धति अनुसार अपने आराध्य से तमाम दुखों के निवारण की कामना किया करते थे; आज वो सारे दरवाजे बंद हैं।

वो ईश्वर, वो अल्लाह, वो वाहेगुरु एकाएक भक्तों की नजरों में 'शक्तिहीन' कैसे हो गए ??? इतनी बड़ी आपदा के समय ,इस महासंकट के वक्त अपने भगवानों से हमारा कैसे विश्वास उठ गया ?? ईश्वर, अल्लाह, गाॅड  या जो भी कहें, वो हैं भी या नहीं  ??? मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, गिरजाघरों के कपाट आज बंद कर दिए जाने पर व्हाटसैपिया और फेसबुकिया 'संतो' ने ज्ञान-गंगा बहाई हुई है । तमाम तरह के सवालों की बौछार हो रही है । ईश्वर को मानने और न मानने वाले लोग अपने-अपने ढंग से व्हाटसैप और फेसबुक पर सवाल-जवाब कर रहे हैं।

"कोई कहै मोहि राम पिआरा,
कोई कहै रहिमाना!
आपस में दोऊ लरि-लरि मरैं,
मर्म न कोऊ जाना !!"

ईश्वर को प्रमाणित करने के लिए अनेक तर्क दिए गए हैं। एक बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि "ईश्वर  को इसलिए मानना जरूरी है, क्योंकि अगर वह न हो, तो फिर यह संसार किसने बनाया? जब जगत है, इसमें जीवन है, तो कोई इसे बनाने वाला भी होगा। यह प्रयोजनहीन मालूम नहीं पड़ता। एक्सीडेंट नहीं मालूम पड़ता है यह जगत । इसमें एक व्यवस्था है, एक सिस्टम है । ऐसा है तो फिर इसका कोई व्यवस्थापक भी होगा, होना भी चाहिए।

जगत में विचार है, मन है, चेतना है। यहाँ एक चैतन्यता दिखाई पड़ती है। अब चेतना का जन्म पदार्थ से तो हो नहीं सकता, तो जगत के पीछे कोई चैतन्य हाथ होना चाहिए।

हजारों तर्क लोगों ने इस तरह के दिए हैं और केवल ....केवल इन तर्कों के कारण हमारी श्रद्धा अगर है तो वह निकृष्ट श्रद्धा है । निकृष्ट इसलिए; क्योंकि ये सब तर्क कमजोर हैं। ये सबके सब काटे जा सकते हैं। इनका खंडन किया जा सकता है। कोई भी तर्क ऐसा नहीं जिसे काटा अथवा खंडित न किया जा सके ।सबसे बड़ी बात तो यह है कि जिस तर्क से हम सिद्ध करते हैं कि ईश्वर है, उसी तर्क से उसे असिद्ध किया जा सकता है।

आस्तिकों के अपने तर्क हैं तो नास्तिकों के अपने तर्क हैं। यदि आस्तिक कहता है कि हर चीज़ को बनाने वाला कोई न कोई जरूर है तो नास्तिक कहता है कि फिर ईश्वर को किसने बनाया ? तर्क वही है ,लेकिन आस्तिक इस पर नाराज हो जाते हैं । वे कहने लगते हैं कि भला यह भी कोई तर्क हुआ ?

आस्तिकों की सारी नाराजगी इस कारण है क्योंकि तर्क पर उसकी श्रद्धा टिकी है । उनका कहना है सृष्टि है तो स्रष्टा भी होगा। बिना सृष्टि के ये सब बनेगा कैसे ? लेकिन नास्तिकों का वही सवाल कि ईश्वर को कौन बनाएगा ? और इस बात को आस्तिक कुतर्क कहता है।

अब यदि नास्तिक का तर्क कुतर्क है तो आस्तिक का तर्क ठीक कैसे हो सकता है? तर्क के इस जाल जंजाल में ऐसा कोई तर्क नहीं है, जिसे नास्तिक तोड़ न सके। इसलिए आस्तिक, नास्तिकों से डरते हैं। अगर सच्चे आस्तिक होते तो न डरते । ये सब निकृष्ट आस्तिक हैं। ईश्वर आस्था का ढोंग करते हैं, दिखावा करते हैं। पूजा-अर्चना करते हुए के फोटो, विडियो अपलोड कर 'भक्त' होने का ये ढोंग ,छलावा नहीं तो और क्या है ? (भजन और भोजन पर्दे में)

दरअसल यही निकृष्ट श्रद्धा, निकृष्ट ईश्वर-आस्था मुश्किल में पड़ गई है। श्रेष्ठ श्रद्धा वह है ,जिसे तर्क की दरकार नहीं है। वह तर्क की कमजोर नींव पर नहीं खड़ी है। श्रेष्ठ श्रद्धा तो अनुभव पर खड़ी है, जो कहती है कि ये मेरा 'अनुभव' है.... ईश्वर है । लेकिन मुझे उसमें विश्वास की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि मैं जानता हूँ, वह है । ये मेरा अनुभव है ।

परमात्मा का होना हमारे होने से पहले है और इस क्षण भी वो हमारे भीतर मौजूद है । वही पालनहार है । इसलिए अगर इतना भरोसा है कि 'वो' सबके भीतर विराजमान है तो फिर कोई 'कोरोना वायरस' आपके पास तक नहीं फटक सकेगा ।

इसलिए मित्रो 'उस' के होने में विश्वास रखिए , न केवल घर के भीतर रहिए बल्कि खुद के भी भीतर हो आइए ! 'घर' वो अदद स्थान है,जहाँ मैं अपना जीवन निरापद मानता हूँ।

मदन लाल (शिक्षक)
करनाल (हरियाणा)

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