कोरोना की जारी जंग को जीतने में कामयाब हुए तो यकीनन आने वाला कल हमारा होगा।


कोरोना की जारी जंग को जीतने में कामयाब हुए तो यकीनन आने वाला कल हमारा होगा।

कोरोना की जारी जंग को जीतने में कामयाब हुए तो यकीनन आने वाला कल हमारा होगा। 

कुंदन कुमार


मजदूरों के लिए बिधवा विलाप करने वाले शायद  सच्चाई से अपनी आखें छुपा रहे हो या इस बिपदा की घड़ी में भी मुख्य मुद्दा अस्पताल औऱ जनता के लिए जरूरी समान उपलब्ध करने के संकल्प से सरकारों को भटकाने की कोशशि कर रहे हो। जिससे कल इनकी लाश पर तुम्हारी राजनीतिक रोटियां सेकी जा सके। ज्यादा दोषी वो लोग नही होते जो बम बांध लोगो को मारने के उद्देश्य से निकल पड़ते है अपितु वो लोगो होते है जो इस भोले-भाले लोगो का ब्रेन वास् करके इस काम के लिए प्रेरित करते है। जाने अनजाने में आपकी कलमों से भी यही किया जा रहा है। महानगरों को छोड़ दो, मैं  बिहार के सबसे पिछड़े जगह की बात कर रहा हूँ । हमारे ग्राम में आज के दिन में मजदूरी 350 रुपये है। इस दर में भी कृषि कार्य के लिए मजदूर नही मिल रहे किन्तु  इस न्यूनतम दर से भी मजदूर पति-पत्नी मिलाकर 700 रुपये प्रतिदिन कमाते है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के तहद भारत के सभी ग्राम पंचायत में लगभग 80 %  जनता को राशन लगभग मुफ्त या 5 रुपये चावल और 2 रुपये गेहूं सरकार के द्वारा दिया जाता है। सिर्फ एक दिन की कमाई से ये मजदूर 6 महीने का मूलभूत राशन लेने के में सक्षम है। आज इस वैश्विक संकट के काल मे भारत के ज्यादातर लोग सिर्फ गुजारा ही तो कर रहे है। कोई बाहर खाने नही जा रहा है या खाने की बर्वादी नहीं कर रहा है। संकट सिर्फ मजदूरों औऱ सड़क पर घूमने वालो मनचलों के लिए ही नही आई है। सबके लिए समान रूप आयी है। लॉक डाउन का फर्क देखिये, भारत ने लॉक डाउन किया तो कल कुल नए 70 मामले आये औऱ अमेरिका ने नही किया तो कल कुल 17224 मामले आये।

अभी भी समय है सड़क पर घूमने वाले इन सिरफिरों से सहानुभूति मत दिखाइए। नुकसान सबका हो रहा है। ना कि सिर्फ ये सड़क पर घूमने वाले मजदूर का। मै ऐसे अनगिनत मध्यम वर्गीय लोगो को जनता हूँ  जिनके पास एक रुपये की सेविंग नही है। वेतन आता है तो घर का खर्चा चलता है, बच्चे के स्कूल का फीस, कमरे का किराया, घर के राशन का खर्च,लोन का EMI, बाबू जी के दवाई, सब आगे मुश्किल दिख रहा है। सरकार से भी इन लोगो को मदद की आस कम ही है, फिर भी ये लोग इस विषम परिस्थिति में संयम से घर मे बैठ कर राष्ट्र भक्ति का परिचय दे रहे है।

 कल भी कुछ लोगो द्वारा फेसबुक पर भूखे रहने की बातों को गहराई से छानबीन किया और कुछ मजदूरों को सहयोग करने की कोशिश की, जिसमे पाया कि किसी को सिर्फ भोजन की अभी तो कमी नही है। किन्तु उनको भोजन नही बल्कि नशे, गुटका, पान, सिगरेट के लिए पैसे चाहिए। आपने कभी सोचा है कि जो देश के सारे बुद्धिजीवी, नेता, नौकरशाही, मीडिया, जागरूक जनता दृढ़ इच्छाशक्ति से हॉस्पिटल और कोरोना संकट से आने वाले चुनौतियों के सामना करने का प्लान बना रहे थे। आपकी एक बिधवा आलाप के कारण सबके सब इनको खिलाने और इस पैसों को भरष्टाचार से बचाने का प्लान बनाने लगे। सोचिए बिहार जैसा गरीब राज्य जहाँ आज डॉक्टरों को मास्क,ग्लोब्स, सेनेटाइजर के साथ मूलभूत सुविधाएं औऱ उपकरणो की भारी कमी है, इनके सड़क पर निकलने की होड़ और नादानी के कारण, मरीजो की संख्याओं में बेतहाशा बढ़ोतरी की संभावना दिख रही  है।

स्वास्थ्य विभाग के अभी से हाथ पाव फूल रहे है। वहाँ भी इस मूल काम को छोड़ कर इन सरफिरे की भूख शांत करने के लिए 100 करोड़ के फण्ड की तुरंत व्यवथा करनी पड़ी। सारे देश का ध्यान मुख्य चुनौती को छोड़ कर इन लापरवाहो से ऊपर केन्दित हो गया है। मै ये नही कहता कि इसको भूखे छोड़ दो लेकिन क्या आपको लगता है कि 700 रुपये प्रतिदिन कमाने वाले को एक सप्ताह की विपत्ति झेलने की क्षमता नही है?  या वास्तव में ये इस वैश्विक विपत्ति का मुकावला नही करना चाहते या जाने अनजाने में इससे बचने के चक्कर मे सम्पूर्ण मानव जाति को खतरे में डालना चाहते है। इनका समर्थन करने वालो ये भी समझ लें कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी और सरकार की आलोचना करना आपका मौलिक अधिकार है किन्तु विपक्ष होने के नाते भी देश के प्रति कुछ आपके भी कर्तव्य है। जिसका सही से निष्पादित करना अभी अति आवश्यक है।

 एक बात समझिए इतना हाय तौबा सिर्फ औऱ सिर्फ हमारी सुरक्षा के लिए ही है। ये देश उच्य रक्तचाप ,मधुमेय,औऱ हृदय रोग वाले लोगों का देश है। यहाँ अगर हम सख्ती से नही लड़े तो परिणाम बिल्कुल आंकलन से परे आएगा। अगर कोरोना से लड़ने का ये हमारा भारतीय प्रयास कारगर नही हुआ तो आज भूखे लोग गिन रहो हो कल इनकी लाशें गिनने के लिए लोग नही मिलेंगे और चील कौओं भी इनके लाशों को खाना पसंद नही करेंगे। वक्त रहते संभल जाए और इस राष्ट्रीय विपदा के समय मे घर मे रह कर सरकार का सहयोग करे।

इस देश मे अभी अनगिनत समाजसेवी, उद्यमी, डॉक्टर, नेता, मुख्यमंत्री है जो बहुत अच्छा काम कर रहे है। विशेष कर हम सब बहुत ही भाग्यशाली है कि इस विषम परिस्थिति में भारतवर्ष में नरेंद्र मोदी जी जैसा प्रधानमंत्री है। दिल्ली की तो दाद देना पड़ेगा कि उनके पास अरविंद केजरीवाल जैसा मुख्यमंत्री है जो परिस्थितियों का सही आंकलन कर सकता है और चुनौतीओ का सामना करने की असीमित माद्दा रखता है।  किन्तु इनका धयान मुख्य लक्ष्य से भटकाने का प्रयास कम से कम हम पढ़े लिखे लोग तो ना ही करे। आप भी एक देशभक्त नागरिक होने का कर्तव्य निभाये,आपको युद्ध के मैदान में नही जाना है अपने ही घर में बैठे रहना है। सरकार को इस त्रासदी के समय मे सबसे जरूरी काम हॉस्पिटल, कोरोना की जाँच व्यवथा और उससे संबंधित जो भी वस्तु है उसपर धयान केंद्रित करवाना है।

आज के दिन में सबसे शक्तिशाली सोशल मीडिया है और अभी आपकी कलम ही देश की प्राथमिकता तय करती है । इसलिए अपनी सोच को सकारात्मक रखते हुए  कलम को सही दिशा दे। ये अभी देश के अहम फैसले को प्रभावित करता है। कल देश का भविष्य प्रभावित करेगा।। जिस तरह से दुनिया की परिस्थिति तेजी से बदल रही है अगर हम एक दो दिन उपवास करके भी इस कोरोना के ऊपर जारी जंग को जीतने में कामयाब हुए तो यकीनन आने वाला कल हमारा होगा ।


कुंदन कुमार
शिक्षा - पीएचडी (बायोटेक्नोलॉजी) एमबीएएग्रीकल्चर पालिसी में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा। वर्तमान में सोशल एंटरप्रेन्योरशिप दिल्ली में कार्यरत। 12 साल का रिसर्च तथा अन्य फील्ड में व्यतिगत अनुभव।

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