संयम और अनुशासन से ही हारेगा कोरोना।

संयम और अनुशासन से ही हारेगा कोरोना।


 कृष्ण कुमार निर्माण


कोई भी समस्या जब भी आती है तो हमें कुछ न कुछ समझाकर ही जाती है। कोरोना रूपी महामारी भी कुछ इसी तरह की है। इसी बीच कुछ बेहद डरावनी खबरें भी हैं लेकिन अच्छी ख़बरों की भी कमी नहीं हैं। सबसे पहले बात ये कि हमारे देश की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये देश और इस देश के लोग किसी भी समस्या के आने पर जात-धर्म नहीं देखते बल्कि एक होते हैं,चाहे कोई कितनी भी कोशिश कर लें लेकिन भारतीय हमेशा एक थे, एक हैं और एक ही रहेंगे।

ये तिरंगा हमें हमेशा एकसूत्र में पिरोये रहता है बेशक हमारे धर्म अलग हों,पूजा पद्धति अलग हो,खान-पान,रीति-रिवाज, भाषा, पहनावे अलग हों पर वक्त आने पर हम एक होते हैं। ये विषेशता आपको विश्व में कहीं और दिखाई नहीं देगी। लेकिन दूसरी तरफ हमारी एक और अलग तरह की आदत है कि हम अफवाह फैलाने में बहुत आगे हैं और अफवाहों पर विश्वास करते हैं, न जाने इस आदत कब हम बदलेंगे, जबकि हम सब अच्छे से जानते हैं लेकिन फिर भी हम ऐसा करते हैं। ये वक्त ऐसा है कि हम किसी भी प्रकार की कोई भी अफवाह न फैलाएं और न ही किसी भी प्रकार की अफवाह पर ध्यान दें। जो बात सरकार या उसकी कोई अधिकृत एजेंसी कहे, उसे ही पुख्ता माने।

खैरइस महामारी ने एक पोल तो हमारी खोल ही दी कि जिस तरह की खबरें प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आ रहीं, उससे तो ऐसा लगता है कि अभी भी हमारे लिए पेट गुजारा ही सबसे पहली प्राथमिकता है क्योंकि लॉकडाउन के बाद जिस तरह का हुजूम सड़कों पर उमड़ पड़ा है,उससे तो जो भयावह तस्वीर हमारी बनती है,इसमें निश्चित रूप से देश और प्रदेशों की सरकार को गम्भीरता से सोचना तो चाहिए कि आखिर हम भाषणबाजी में ही उलझे रहे, हम मंदिर-मस्जिद के झगड़ों में उलझे रहे इतने वर्षों तक और देश में गरीबी आतंक मचाती रही।चाहे सरकार किसी की रही हो या वर्तमान में हो--- गरीबों, मजदूरों, किसानों के लिए किसी ने कुछ नहीं किया सिवाए भाषणों के।अगर कुछ किया होता तो शायद ये तस्वीरें नहीं होती।खेर,अब समय कुछ और है लेकिन यहाँ भारतीय नागरिकों की भी एक दिक्कत यह है कि हम भी कुछ का कुछ समझ लेते हैं।

लॉकडाउन में ऐसा क्या हुआ कि हम सब निकल ही पड़े, ये सही है कि रोटी की चिंता हैं लेकिन ये काम सरकार कर ही रही है। देर-सबेर हम सबको रोटी मिलेगी ही,ऐसा हो ही नहीं सकता कि सरकार किसी एक भी आदमी को भूखा रहने देगी।इसका सवाल ही पैदा नहीं होता।यहाँ भी देश की एक खासियत देखिए कि हमारे यहाँ हमारी संस्कृति और संस्कारों के अनुसार देश में स्वयंसेवकों की कोई कमी नहीं है और दान करने वालों की भी कोई कमी नहीं है। सारा देश देख रहा है कि हम झोपड़ियों तक, स्लम बस्तियों तक, रेलवे तक, फुटपाथों पर रह रहे लोगों तक जाकर खाना और अन्य जरुरी सामान पहुंचा रहे हैंतो थोड़ा धीरज रखना भी चाहिए। गनीमत अभी तक यह भी है कि अभी तक हमारे देश में पब्लिक संक्रमण का कोई केस नहीं है और अभी तक हालात हमारे अपने हाथ में हैधीरज रखिएसरकार और उसकी तमाम एजेंसी और देश के तमाम सेवक जुटे हुए हैं और हम सब संयम,अनुशासन से कोरोना को हराकर ही दम लेंगे।

लेकिन इसी बीच यह समस्या हमें यह भी समझा रही कि किसी भी आपदा से निपटने के लिए हमें इतंजाम पहले से ही करके तो रखने ही चाहिए। हमारे देश में अब भी डॉक्टर्स की कमी हैस्वास्थ्य सेवाओं की बहुत कमी हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हम जागते तभी हैं जब हम बहुत मुसीबत में होते हैं और साथ ही हमारे अंदर जल्दी भी भूल जाने की बहुत जबरदस्त बीमारी है। हम बहुत जल्दी भूल जाते हैं और एक बने बनाए ढर्रे पर फिर से चलने लग पड़ते हैं।अब इसे तोड़ना होगा और चीजों को सिरे से बदलने की जरूरत है।स्थाई रोजगार के साधन बढ़ाने होंगे।हर हाथ को काम देना होगा।हर पेट को रोटी देनी होगी।

शिक्षास्वास्थ्य और सुरक्षा की सेवाओं को और अधिक मजबूत करना होगा।देश भर में एक ऐसी स्वयंसेवी सेना का गठन भी करना होगा जो किसी भी तरह की मुसीबत आने पर तैयार रहे और देश के किसी भी नागरिक को यों भटकना ना पड़ेसिसकना ना पड़े और किसी भी कीमत पर लॉकडाउन की नौबत ही ना आए। देश के नागरिकों को ऐसी शिक्षा भी देनी ही होगी। फिलहाल हम सब संयम बरतेघरों से बाहर न निकले,पुलिस भी डंडे वाली छवि को तोड़े-छोड़े और हम सब मिलकर सरकार के साथ कदमताल करते हुए कोरोना को हराने के लिए कृतसंकल्प होकर अपने अपने स्तर पर काम करें। वैसे पिछले दो दिन से बढ़ रही संख्या चिंतित करने वाली तो है।


 कृष्ण कुमार निर्माण
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