कमलमय के हो गए ज्योतिरादित्य सिंधिया

कमलमय के हो गए ज्योतिरादित्य सिंधिया
कमलमय के हो गए ज्योतिरादित्य सिंधिया
✍ लिमटी खरे

 
देश के हृदय प्रदेश में कांग्रेस के अंदर पिछले एक पखवाड़े से जिस तरह का हाई वोल्टेज ड्रामा चल रहा था, उसका पटाक्षेप ज्योतिरादित्य सिंधिया के गले में तीन रंगों के बजाए अब दो रंगों वाले गमछे के डलने से हो गया है। ज्योतिरादित्य सिंधिया अब भाजपा के हो गए हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया के द्वारा मध्य प्रदेश सरकार के द्वारा की जाने वाली उनकी कथित उपेक्षा से नाराज होकर यह कदम उठाया है। प्रदेश में कांग्रेस बिखराव की ओर बढ़ती दिख रही है। कांग्रेस के अखिल भारतीय स्तर के नेताओं को भी देश भर में कांग्रेस की बदहाली दिखाई नहीं दे रही है, यही कारण है कि देश भर में कांग्रेस का जनाधार तेजी से घटता भी नजर आ रहा है। मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस एक तरह से बिखरती दिख रही है। पार्टी के आला नेताओं को इससे सबक लेने की आवश्यकता है। आज कांग्रेस के बजाय गणेश परिक्रमा करने वाले नेताओं की जमकर पूछ परख हो रही है। कांग्रेस को मजबूत बनाने, कांग्रेस की रीतियों नीतियों के प्रचार प्रसार के बजाए नेताओं के द्वारा अपने एजेण्डे को ही लागू किया जा रहा है जो कांग्रेस के लिए चिंता की बात मानी जा सकती है।
मध्य प्रदेश में लगभग चौदह माह पूर्व भाजपा की डेढ़ दशक पुरानी सरकार को धूल चटाकर कांग्रेस ने सत्ता पाने में सफलता पाई थी। इसके बाद सरकार का गठन हुआ और जनता के हितों से जुड़े मामलों को मुख्यमंत्री कमल नाथ के द्वारा बहुत ही करीने से लागू कराया गया। यह अलहदा बात है कि जमीनी स्तर पर तैनात अफसरशाहों के द्वारा जनता के हितों वाले फैसलों को लागू करने में पूरी ईमानदारी नहीं बरतने से इनका लाभ वास्तविक लोगों को नहीं मिल पाया।
इधर, संगठन में भी किसी अन्य नेता को प्रदेश कांग्रेस की जवाबदेही नहीं सौंपने के कारण संगठन का काम प्रभावित हुए बिना नहीं है। मुख्यमंत्री कमल नाथ के पास सरकार के मुखिया के साथ ही साथ संगठन के मुखिया की महती जवाबदेही है। निश्चित तौर पर मुख्यमंत्री की व्यस्तताएं बहुत ही ज्यादा होती हैं। कमल नाथ बहुत ही अनुभवी और सुलझे हुए नेता हैं। वे विवादों से सदा ही दूर रहते आए हैं। प्रशासन पर उनकी पकड़ बहुत ही मजबूत मानी जा सकती है, पर जिस तरह की परिस्थितियां निर्मित हुईं उसे देखकर यही लग रहा है कि चूक कहीं न कहीं हुई है।
कांग्रेस को देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी माना जाता है, इस बात में दो मत नहीं है। कांग्रेस के अंदर दूसरी पंक्ति के नेताओं की पौध तैयार नहीं हो पाने से वे चेहरे जो दो तीन दशकों से दिखाई देते आए हैं, वे आज भी उसी सक्रियता से दिख रहे हैं। दरअसल, कांग्रेस के अंदर नर्सरी में पौध निर्माण का काम मानो बंद हो चुका है। जब तक युवा नेतृत्व को सामने नहीं लाया जाता तब तक किसी भी दल को उर्जा कहां से प्रदान की जा सकेगी!
कमल नाथ सरकार के द्वारा एक नायाब प्रयोग किया गया। उनके द्वारा मंत्रीमण्डल में शामिल सभी विधायकों को सीधे कबीना मंत्री बना दिया गया। इसमें उप मंत्री, राज्य मंत्री जैसे पद मानो समाप्त ही कर दिए गए। इससे वरिष्ठता और कनिष्ठता के बीच वैचारिक द्वंद को सीधे सीधे रोका जा सका। प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के द्वारा कांग्रेस से विलग होने की घोषणा के साथ ही कांग्रेस में बिखराव होता दिख रहा है। इस घटना को प्रतीकात्मक तरीके से लिया जा सकता है। कांग्रेस के अंदर की परतों में दरारें साफ महसूस भी की जा सकती हैं।
सियासी बियावान में चल रही चर्चाओं के अनुसार ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने की लालसा रखते थे, पर उन्हें इस पद से बहुत दूर ही रखा गया। उसके बाद जिस तरह का खिंचाव कांग्रेस के अंदर महसूस किया जा रहा था, उससे यही लग रहा था कि जल्द ही कांग्रेस को किसी अप्रिय स्थिति से भी दो चार होना पड़ सकता है। राजा दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच लंबे समय से कलह मची हुई है। कांग्रेस नेतृत्व के आंख, कान अगर पूरी तरह खुले होते तो उसके रणनीतिकार इन स्थितियों को बेहतर तरीके से भांपकर सारी स्थितियों को नियंत्रित कर सकते थे।
सिंधिया के द्वारा भाजपा का दामन थामने से भाजपा के अंदर भी अब रार तेज होती दिख रही है। प्रभात झा जैसे वरिष्ठ नेताओं की भकुटियां तनती दिख रहीं हैं। इधर, कांग्रेस के नेताओं के द्वारा ग्वालियर चंबल अंचल में महाराजा के खिलाफ माहौल बनाना आरंभ कर दिया गया है। कहा जाने लगा है कि आने वाले समय में जब भी चुनाव होंगे तो ग्वालियर चंबल अंचल में सालों से भाजपा का झंडा, डंडा उठाने वाले नेताओं के बजाए महाराजा के साथ भाजपा का दामन थामने वाले नेताओं को ज्यादा तवज्जो मिलेगी और चुनावों में टिकिट भी देने में उन्हें प्रथमिकता दी जाएगी।
सियासी हल्कों में यह बात भी जोर शोर से चल रही है कि भाजपा का दामन थामने के बाद क्या महाराजा प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच पाएंगे! कांग्रेस में महाराजा एक सर्वमान्य नेता की छवि को विकसित कर चुके थे, अब भाजपा में उन्हें नए सिरे से एबीसीडी लिखना होगा! ग्वालियर चंबल अंचल में पहले से स्थापित नेताओं की खासी फौज है, जिसके सामने अपने पैर जमाने के लिए महाराजा को बहुत मेहनत करना पड़ सकता है। ये नेता कोई और नहीं वरन वे ही हैं तो सालों से महाराजा का विरोध करते आए हैं। वैसे भी भाजपा में सिंधिया घराने के कद के हिसाब से सत्ता में भागीदारी नहीं मिल पाई है।
विधान सभा चुनावों में कांग्रेस के द्वारा कृपांक (ग्रेस मार्कस) से परीक्षा उत्तीर्ण की है। कांग्रेस के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। संख्या बल इतना नहीं था कि बहुत आराम और इत्मीनान के साथ सरकार को चलाया जा सकता हो! हनी ट्रेप काण्ड के बाद अनेक नेताओं और नौकरशाहों पर खतरा मण्डरा ही रहा था। इसी बीच भाजपा के द्वारा जिस तरह से कांग्रेस के विधायकों पर डोरे डाले जा रहे थे, उससे खतरा और भी बढ़ ही चुका था।
बहरहाल, कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को इस बात पर विचार करना होगा कि कांग्रेस का जनाधार गिर क्यों रहा है! इसके पीछे एक वजह यह भी है कि उमर दराज नेताओं की फौज के द्वारा कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को पूरी तरह अपने काकस में जकड़ लिया गया है। कांग्रेस के पास अच्छे सलाहकारों की कमी स्पष्ट दिखाई दे रही है। बुजुर्ग नेताओं के द्वारा जिस तरह सब कुछ हम ही हैं, की तर्ज पर काम किया जा रहा है, वह बहुत ही निराशाजनक माना जा सकता है। बुजुर्ग नेताओं की मण्डली के द्वारा युवाओं को आगे लाने की बात को स्वीकार नहीं किया जा रहा है, जबकि युवा ही कांग्रेस के अच्छे दिन लाने में सहायक साबित हो सकते हैं। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को इस बारे में विचार करना होगा और हवा का रूख भांपते हुए वरिष्ठ नेताओं को मार्गदर्शक की भूमिका में लाना होगा अन्यथा कांग्रेस जिस तेज गति से जनाधार खोती जा रही है उसे देखते हुए प्रधानमंत्री के द्वारा कही गई वह बात सच न हो जाए कि कांग्रेस को लोग खोजते नजर आएंगे! 

लेखक
 लिमटी खरे
(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

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