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भारतीय नव-वर्ष इतिहास

भारतीय नव-वर्ष इतिहास

भारतीय नव-वर्ष इतिहास


✍ राज शर्मा


अखण्ड भारत के कालगणना का पहला दिवस युगाब्द (युधिष्ठिर सम्वत) सप्तर्षि सम्वत, विक्रम सम्वत जिसके अंतर्गत इसी दिन सृष्टि रचना का कार्य आरम्भ हुआ था । सनातन हिन्दू धर्म का सबसे प्रमुख दिवस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का रहता है । सूर्य की प्रथम किरण धरती पर पड़ते ही समग्र सृष्टि इंद्र की अलकापुरी सी दृश्यमान हो जाती है।

●  दुर्गा पूजन नवरात्रि का श्रीगणेश
●  युगाब्द (युधिष्ठिर सम्वत) का शुभारंभ
●  चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य से प्रचलित विक्रम सम्वत का शुभारंभ
●  शालिवाहन शक सम्वत का शुभारंभ
●  सतयुग का शुभारंभ इसी दिन किया हुआ था 
●  भगवान श्रीरामचन्द्र का राज्याभिषेक इसी तिथि को हुआ था।
●  ब्रह्मा जी द्वारा इस धरती पर प्रथम बार देवी दुर्गा का आवाहन 

चैत्र मासे जगद्ब्रह्म समग्रे प्रथमेऽनि
शुक्ल पक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति। (ब्रह्म पुराण अनुसार)

जहां एक ओर पश्चिमी नववर्ष की शुरूआत पटाखों एवं मदिरा तामसिक पदार्थों, आधी रात की आगोश में खुशियां मनाते हैं वहीं दूसरी ओर सबसे ज्यादा प्रचलित नव वर्ष विक्रम संवत का श्रीगणेश व्रतोपवास दुर्गा अर्चन से किया जाता है । 

इस दिन भगवान विष्णु के २४ अवतारों में मत्स्य अवतार का प्रादुर्भाव भी माना जाता है । पुराणों के अनुसार इसी तिथि को भगवान ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि रचना का कार्य आरम्भ हुआ था। युगों पूर्व १,९७,५८,८५,११८ वर्ष सृष्टि को रचे हुए बीत चुके हैं । भारतीय ज्योतिष के अनुसार प्रतिपदा तिथि को चन्द्रमा अपनी कला के प्रथम सोपान में होता है । शायद इसी कारण विधाता ने इस दिन की महिमा को जानकर सृष्टि रचने का कार्य प्रारंभ किया था । 

समग्र सृष्टि नव वर्ष का स्वागत अपने नवीन कोपलों व फूल पत्तों से करती है । ऐसा प्रतीत होता है कि मानो समग्र स्वर्ग ही धरती पर स्थापित किया गया हो  । तरुवर के नवीन पुष्पों से मधुर सुगन्ध व मनभावन वातावरण हो जाता है । ब्रह्मांड की सभी प्रकार के काल गणना से सनातन भारतीय काल गणना सबसे पुरातन मानी जाती है । पूर्व में अनेक प्रकार के सम्वतों का प्रयोग रहा है परन्तु समय समय पर विशेष परिवर्तनों के चलते नवीन-नवीन सम्वतों का प्रादुर्भाव हुआ । श्रीकृष्ण जन्म सम्वत , सप्तऋषि सम्वत, महात्मा बुद्ध सम्वत, महावीर निर्वाण सम्वत, नानकशाही सम्वत , खालसा सम्वत और जय हिंद सम्वत इत्यादि । हिन्दुधर्म में शक सम्वत एवं विक्रम सम्वत को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है ।

भारत के अनेक स्थानों पर इस दिन वर्षभर का पूरा लेख-जोखा ब्राह्मण के मुख से सुनने की परम्परा रही है । इसी प्रकार एक श्लोक इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देता है ।

यश्चेव शुक्लप्रतिपदा धीमान श्रुणोति वर्षीय फल पवित्रं भवेद।
धनाढ्यो बहुसशय भोगो जह्यश पीड़ां तनुजां च वार्षिकीम ।।

षड ऋतुओं के एक चक्र को सम्वत के नाम से अलंकृत किया गया है । विक्रम संवत से पूर्व सप्तऋषि सम्वत का प्रचलन रहा । जिसका वर्णन महाभारत में भी काल गणना के अंतर्गत आता है। विक्रम सम्वत का शुभारंभ ५७ ई० पूर्व में हुई थी  । तत्पश्चात कुछ समय बाद ७८ ई० में शक सम्वत अस्तित्व में आया । सनातन धर्म हिंन्दुओं का सबसे ज्यादा प्रयोग में आने वाला विक्रम संवत ही है । सम्वत के इतिहास की अगर बात करें तो यह २०२० वर्ष से प्रचलन में आया जिसको आज भी धार्मिक कार्यप्रणाली के अंतर्गत ब्राह्मण संकल्प और सभी प्रकार के धार्मिक आयोजनों में प्रयोग करते रहे हैं । 


राज शर्मा (संस्कृति संरक्षक)
आनी कुल्लू हिमाचल प्रदेश
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