भारतीयता के रक्षक गुरु गोविंद सिंह जी महाराज


भारतीयता के रक्षक गुरु गोविंद सिंह जी महाराज

भारतीयता के रक्षक गुरु गोविंद सिंह जी महाराज


✍️गोविंद

जिस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा :-

“यदा यदा हि धर्मस्य  ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य त्दातमानं सृजाम्यहम ॥
परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम।
धर्मसंस्थापनार्थाय स्मभवामि युगे युगे ॥”

उसी प्रकार पिता दशमेश श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने कहा:-

 जब–जब होत अरिस्ट अपारा,
तब–तब देह धरत अवतारा ॥”

अर्थात जब-जब धर्म का ह्रास होकर अत्याचार, अन्याय, हिंसा और आतंक के कारण मानवता खतरे में होती है तब-तब भगवान दुष्टों का नाश और धर्म की रक्षा करने के लिए इस भूतल पर अवतरित होते हैं।

अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है कि जब जब भी धरती पर कोई पाप का भार बढ़ता है तो यह धरा अपनी अलौकिक शक्ति से किसी महापुरुष को जन्म देती है । ऐसे ही एक महापुरुष पिता दशमेश श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज का जन्म होता है। 

पतन के गर्त में गिरते हुए समस्त समाज की रक्षा करने हेतु पिता दशमेश अवतरित होते हैं। एक कवि , योद्धा , महान नेतृत्वकर्ता, परोपकारी, दीन दुखहर्ता, दूरदृष्टा पिता दशमेश को 'सरबंसदानी' (सर्ववंशदानी) , कलगीधर, दशमेश, बाजांवाले, संत सिपाही, पूर्ण पुरुष आदि कई नाम, उपनाम व उपाधियों से जाना जाता है तथा वे सिख पंथ की गुरु परंपरा के दसवें गुरु के रूप में आते हैं। प्रथम गुरु नानक देवजी, गुरु अंगद देव जी, गुरु अमरदास, गुरु रामदास , गुरु अर्जुन देव , गुरु हरगोविंद, गुरु हरि राय, गुरु हरकृष्ण, गुरु तेग बहादुर तथा अंतिम के रूप में श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज बैठे। यह हिंदुस्तान के अद्वितीय नेता एवं संत हुए। पिता दशमेश श्री गुरु गोविंद सिंह जी की महानता केवल इसी बात में नहीं है कि उन्होंने पाप से भरपूर मुगल शासन को हिला दिया बल्कि उनकी वास्तविक महत्वता तो मानव समाज का उत्थान करने में भी है। उन्होंने चारों वर्गों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ,शूद्र इन सभी में समन्वय किया जातिवाद की हीन भावना का भी अंत किया।उन्होंने धर्म के साथ धर्म की रक्षा का भी उपदेश दिया शास्त्र के साथ साथ, शास्त्र की रक्षा के लिए शस्त्र का ज्ञान भी दिया।

दयाभावी: 

कहा जाता है कि गुरु जी के तीरों में सोना मढ़ा होता था, ताकि मरने वाले को अंतिम संस्कार का सामान मिल सके और यदि वह घायल होता है, तो उसे इलाज का खर्च मिल सके।
   
एक चिंतक और कवि: 

गुरू गोबिन्द सिंह ने सिखों की पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिबको पूरा किया तथा उन्हें गुरु रूप में सुशोभित किया। बिचित्र नाटक को उनकी आत्मकथा माना जाता है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ, गुरू गोबिन्द सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है।

जाप साहिब : एक निरंकार के गुणवाचक नामों का संकलन

अकाल उस्तत: अकाल पुरख की अस्तुति एवं कर्म काण्ड पर भारी चोट

बचित्र नाटक : गोबिन्द सिंह की सवाई जीवनी और आत्मिक वंशावली से वर्णित रचना

चण्डी चरित्र - ४ रचनाएँ - अरूप-आदि शक्ति चंडी की स्तुति। इसमें चंडी को शरीर औरत एवंम मूर्ती में मानी जाने वाली मान्यताओं को तोड़ा है। चंडी को परमेशर की शक्ति = हुक्म के रूप में दर्शाया है। एक रचना मार्कण्डेय पुराण पर आधारित है।

शास्त्र नाम माला : अस्त्र-शस्त्रों के रूप में गुरमत का वर्णन।

अथ पख्याँ चरित्र लिख्यते : बुद्धिओं के चाल चलन के ऊपर विभिन्न कहानियों का संग्रह।

ज़फ़रनामा : मुगल शासक औरंगजेब के नाम पत्र।

खालसा महिमा : खालसा की परिभाषा और खालसा के कृतित्व।

एक महान नेतृत्वकर्ता और योद्धा

गुरु गोविंद महाराज एक महान नेता और योद्धा भी थे। चमकौर के युद्ध में उन्होंने कुछ ही सिखों के माध्यम से पूरी सेना को टक्कर दी । उनका सिखाया हुआ एक सिख कई कई हजारों सैनिकों पर भारी पड़ता था। उनकी कहीं यह पंक्ति उनके आत्मविश्वास और कौशल को दिखाती हैं:-

“सवा लाख से एक लड़ाऊँ,
चिडियन तै मैं बाज तुड़ाऊँ,
तबै गुरु गोबिन्द सिंह नाम कहाऊं’’


सिखों के लिए पांच ककार 

पाँच ककार : युद्ध की प्रत्येक स्थिति में सदा तैयार रहने के लिए उन्होंने सिखों के लिए पाँच ककार अनिवार्य घोषित किए, जिन्हें आज भी प्रत्येक सिख धारण करना अपना गौरव समझता है-

(1) केश : जिसे सभी गुरु और ऋषि-मुनि धारण करते आए थे।
(2) कंघा : केशों को साफ करने के लिए।
(3) कच्छा : स्फूर्ति के लिए।
(4) कड़ा : नियम और संयम में रहने की चेतावनी देने के लिए।
(5)कृपाण : आत्मरक्षा के लिए।

गुरु गोविन्द सिंह जी ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में किसी अन्य को गुरु चुनने के बजाये, सभी सिखों को आदेश दिया की मेरे बाद आप सभी पवित्र ग्रन्थ को ही गुरु मानें, और तभी से पवित्र ग्रन्थ को गुरु ग्रन्थ साहिब कहा जाता है. गुरु गोबिंद सिंह जी के ही शब्दों में:

“आज्ञा भई अकाल की तभी चलायो पंथ।
सब सिखन को हुकम है गुरु मान्यों ग्रंथ ॥”

                           
                        
✍️गोविंद, करनाल  

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