नागरिकता कानून के नाम पर हिंसा राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने की साजिश है।


नागरिकता कानून के नाम पर हिंसा राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने की साजिश है।

नागरिकता कानून के नाम पर हिंसा राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने की साजिश है। 

-ललित गर्ग –


रविवार को अफवाहों एवं सोशल मीडिया पर राजधानी में साम्प्रदायिक नफरत एवं द्वेष की आग भड़काने की एक और नाकाम कोशिश हुई, उससे यही आभास होता है कि कुछ लोग साम्प्रदायिक उन्माद को हवा देते रहना चाहते हैं। ये लोग भारत के राष्ट्रीय हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं। भारत की साम्प्रदायिक सद्भाव एवं सौहार्द की विश्वव्यापी छवि को ये ध्वस्त करना चाहते हैं। हमें दिल्ली पर लगी साम्प्रदायिक कालिख की कोरी तस्वीर बदलने की ही कोशिश नहीं करनी है, बल्कि तकदीर एवं तहजीब बदलने की दिशा में गति करनी होगी। दिल्ली में बार-बार गर्म होती साम्प्रदायिक हिंसा, नफरत एवं द्वेष के सन्दर्भ में एक टीस से मन में उठती है कि आखिर दिल्ली का जीवन कब तक साम्प्रदायिक खतरों से घिरा रहेगा। साम्प्रदायिकता की धधकती आग में वह कब तक अपने सह-जीवन एवं सौहार्द को भस्म होते देखती रहेगी? कब तक दिल्ली के साम्प्रदायिक सौहार्द एवं सद्भावना के अस्तित्व एवं अस्मिता को नौचा जाता रहेगा?

संशोधित नागरिकता कानून को लेकर राजधानी में जो खूनी तांडव पिछले दिनों हुआ है उसके परिणामों पर अब पूरे देश के नागरिकों को गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए और साथ ही सरकार व विपक्ष को भी विचार विनिमय करके वातावरण को सहज व अनुकूल बनाने की कोशिशें करनी चाहिएं। देश के प्रत्येक राजनैतिक दल के लिए राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होता है और जब इन हितों पर आंच आती है तो राजनीतिक हानि-लाभ के प्रश्न समाप्त हो जाते हैं। लेकिन देखने में आ रहा है कि राजनीतिक दल अब भी अपने हानि-लाभ का गणित बैठाते हुए इस समस्या के समाधान की दिशा में कोई सकारात्मक काम नहीं कर रहे हैं, जो दुर्भाग्यपूर्ण है।

दिल्ली के कारण समूचे भारत का मन इन दिनों व्यथित है, डरा हुआ है और चिन्तीत है। सांप्रदायिकता के राक्षस ने राष्ट्रीय एकता एवं साम्प्रदायिक सौहार्द को पलीता लगाया है। दिल्ली दंगों का यथार्थ डरावना एवं भयावह है। कई लोग मारे गए हैं। दो सौ से अधिक घायल हैं। व्यापक स्तर पर जन-धन की हानि हुई है, पुलिसकर्मी भी हिंसा के शिकार हुए हैं। सरकारी प्रयासों से स्थिति सामान्य हुई है। इसको लेकर राजनीतिक लाभ उठाने की निंदनीय कोशिशें भी हो रही हैं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से अकारण त्यागपत्र मांगा गया है। सांप्रदायिक आक्रामकता वस्तुतः कानून व्यवस्था की ही समस्या नहीं है, यह राष्ट्रीय एकता को चुनौती देने वाले अलगाववादी समूहों की साजिश है। देश में पिछले तीन-चार माह से सुनियोजित तरीके से सांप्रदायिकता का जहर फैलाया जा रहा है। ताजा हिंसा, आगजनी एवं तोड़फोड़ इसी सुनियोजित सांप्रदायिक आक्रामकता का नतीजा है। दुर्भाग्यपूर्ण तो यह भी रहा कि यह उन्मादी घटनाक्रम उन दो दिनों में सबसे ज्यादा हुआ जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत की राजकीय यात्रा पर थे। 

इस पर भी जम कर राजनीति हो चुकी है कि क्या खूनी तांडव का समय चुनने के पीछे कोई साजिश थी? किन्तु अब बात इस हद से बाहर जाती हुई दिखाई पड़ रही है क्योंकि इंडोनेशिया की सरकार ने वहां स्थित भारतीय राजदूत को जकार्ता बुला कर दिल्ली की साम्प्रदायिक हिंसा पर चिन्ता प्रकट की है। मलेशिया के प्रधानमन्त्री महाथिर मोहम्मद ने भी नागरिकता कानून को लेकर बहुत तीखी टिप्पणी कर चुके, जिसे लेकर भारत ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी और इसे भारत के अन्दरूनी मामलों में हस्तक्षेप बताया था। सच भी है कि भारत साम्प्रदायिक सौहार्द को खंडित करने वाली शक्तियों को मिल रहे मुस्लिम राष्ट्रों के संरक्षण को कैसे औचित्यपूर्ण माने? भारत की बढ़ती ताकत एवं राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने की यह एक तरह की साजिश है। पहले भी इस तरह की षडयंत्र एवं साजिशों से भारत को कमजोर करने की कोशिशें होती रही है। भारत के राजनीतिक दलों की भी विडम्बना रही है कि वे अपनी राजनीतिक ताकत को बढ़ाने के लिये साम्प्रदायिकता को हवा देते हैं। क्योंकि सांप्रदायिक अलगाववाद का वोट बैंक है। वे धौंस देते हैं कि हमारी संख्या 20-25 करोड़ है। हम एक अरब आबादी पर भारी हैं। इस तरह की धौंस कब तक भारत की एकता एवं अखंडता पर भारी पड़ती रहेगी?

भारत में सांप्रदायिक अलगाव की राजनीति का इतिहास पुराना और भयावह है। आक्रामक सांप्रदायिकता के चलते स्वाधीनता के पूर्व भी तमाम दंगे हुए थे। 1946 में बाकायदा कलकत्ता में सीधी कार्रवाई की घोषणा की गई थी। उसमें तब लगभग चार हजार लोग मारे गए थे। 10-11 हजार लोग घायल हुए थे। संविधान सभा को लेकर भी दंगे हुए थे। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद ढाई हजार से ज्यादा सिखों की हत्या हुई थी। मुंबई का 1992-93 का दंगा भी है। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ और मुजफ्फरनगर दंगों के लिए अक्सर चर्चा में रहते हैं। 2012 के असम दंगे में 80 लोग मारे गए थे। भागलपुर दंगों की याद डरावनी एवं भयावह है। इसके अलावा भी सांप्रदायिक आक्रामकता ने देश के अनेक हिस्सों में व्यापक जनधन की हानि की है। प्रश्न है कि सांप्रदायिक अलगाववाद कब तक भारत के अस्तित्व एवं अस्मिता के लिये खतरा बना रहेगा? सांप्रदायिक दंगों के पीछे राजनीति भड़काऊ ताकतें एवं संकीर्ण मानसिकताएं होती हैं। भारतीय समाज में सौहार्द और सद्भाव को बढ़ाने वाली शक्तियां भी अपना काम करती हैं, पर उनका प्रभाव सांप्रदायिक उन्माद पर नहीं पड़ता। तोड़ने वाली सांप्रदायिक नफरत एवं द्वेष की मानसिकता की समाप्ति व्यापक जन अभियान से ही संभव है, लेकिन इसके लिये देश के राजनीतिक दलों को भी ईमानदार प्रयास करने होंगे।

इंडोनेशिया भारत का मित्र राष्ट्र है, उसकी टिप्पणी पर हमें गंभीर होना होगा। दोनों देशों के बीच के प्रगाढ़ सम्बन्ध ऐतिहासिक व सांस्कृतिक रूप से बहुत निकट के रहे हैं। मुस्लिम देश होने के बावजूद इंडोनेशिया हिन्दू संस्कृति के प्रतीक चिन्हों को अपने देश की धरोहर समझता है और उनका प्रदर्शन भी खुले दिल से करता है। इस देश में भारी संख्या में हिन्दू, बौद्ध, ईसाई आदि भी पूरी स्वतन्त्रता के साथ रहते हैं और बराबर के नागरिक अधिकारों से लैस हैं। इस देश का समाज भी विविधतापूर्ण संस्कृति का हामी है। उसने दिल्ली के दंगों को गंभीरता से लिया है तो इसका नतीजा हमें निकालना होगा और सोचना होगा कि भारत की पहचान पर अंगुली क्यों उठाई जा रही है? अतः पूरे भारत को एक मत से अपनी प्रतिष्ठा को निर्विवाद रूप से ‘सर्वधर्म समभाव’ रूप में रखने को वरीयता देनी होगी और इसमें राजनैतिक मतभेद आड़े नहीं आते हैं क्योंकि भारत का संविधान यही घोषणा करता है। 

यह समय अति संवेदनशील है, बहुत सावधानी से साम्प्रदायिकता पर काबू पाना होगा, इन हालातों में प्रशासन को बहरा बन कर नहीं बैठना चाहिए। सांप्रदायिक आक्रामकता राष्ट्र विरोधी है। भारत के सभी नागरिक एक कौम हैं। साथ-साथ रहना, उन्नति करना, राष्ट्रीय समृद्धि में वृद्धि करना, समृद्धि में भागीदार बनना और संविधान के अनुशासन में रहना हम सबकी जिम्मेदारी है और यही हमारी नियति भी है। जब दंगे और हिंसा के बावजूद साथ-साथ रहना हम सबकी नियति है तो सांप्रदायिक आक्रामकता का क्या मतलब है? हम ऐसे राष्ट्र का निर्माण करे जिसमें प्यार-सौहार्द की छत हो, विश्वास की दीवारें हों, सहयोग के दरवाजे हों, अनुशासन की खिड़कियाँ हों और समता की फुलवारी हो। तथा उसका पवित्र आँचल सबके लिए स्नेह, सुरक्षा, सुविधा, स्वतंत्रता, सुख और शांति का आश्रय स्थल बने, ताकि इस सृष्टि में साम्प्रदायिक अलगाव, नफरत एवं द्वेष जैसे शब्दों का अस्तित्व ही समाज हो जाए।


प्रेषक:

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25, आई0पी0 एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोन: 22727486, 9811051133

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