मुरली मनोहर श्रीवास्तव का लेख - खतरे की आहट है कोरोना



खतरे की आहट है कोरोना


मुरली मनोहर श्रीवास्तव


दुनिया आज चांद पर जा पहुंचा है। दुनिया के सभी देश अपने कामयाबी के झंडे बुलंद कर रहे हैं। लेकिन कोरोना वायरस के प्रकोप के आगे पूरी दुनिया त्राहिमाम कर रही है। चीन, जो दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश होने का दावा कर रही थी आज वही इसकी मार को सबसे अधिक झेल रहा है। वैसे तो बाहर के देशों से पहले भी वायरस संबंधित कई मामले सामने आ चुके हैं, जिसमें कांगो से एचआईवी, मलेशिया से नीपाह, सूडान से इबोला, हांग कांग से बर्ड फ्लू, मनीला से डेंगू और चीन से कोरोना वायरस शामिल है। कोरोना कोई साधारण वायरस नहीं तभी तो दुनिया के तमाम देश इससे निपटने के लिए लगातार शोध कर रहे हैं। बावजूद इसके हल को ढूंढना किसी कठिन डगर से कम नहीं है।

चीन से निकलकर दूसरे देशों में जैसे ही कोरोना से लोगों की मौत होने लगी। वैश्विक स्तर पर सभी प्रभावित देशों में दिशा-निर्देश जारी किया जाने लगा। अब तक इससे भारत में भी तीन लोगों की मौत हो चुकी है। जबकि अन्य देशों में हजारों लोगों की इस वायरस से जानें जा चुकी हैं। कोरोना वायरस के भयावह प्रकोप से बचने के लिए भारत में भी लोगों को घरों में रहने के लिए सरकार ने सलाह दी है।

अपने देश की पब्लिक को सुरक्षित रखने के लिए स्कूल, कॉलेजों, जू, सिनेमा हॉल, मॉल तक को बंद कर दिया है ताकि लोगों की भीड़ एक जगह इकट्ठा न हो सके। क्योंकि यह एक ऐसा संक्रमण है जिसका अब तक इलाज नहीं ढूंढ़ा जा सका है लेकिन इसका हल ढूंढने के लिए पूरी दुनिया में प्रयास जारी है। इसके पहले से ही कुछ बीमारियों का आदान-प्रदान जीव-जंतुओं के माध्यम से फैलने के सबूत मिलते रहे हैं। अभी कोरोना वायरस की मूल वजह से सभी अनभिज्ञ हैं लेकिन कई बीमारियों का प्रसार जीवों के माध्यम से मनुष्य में हुआ है। विकास की अंधी दौड़ में पर्यावरण की अनदेखी का दुष्प्रभाव दिखने लगा है। 

 पर्यावरण अंसुतलन के दिखने लगे हैं दुष्प्रभाव


पर्यावरण में असंतुलन के कई प्रभाव दिखने लगे हैं। कभी तापमान का ज्यादा होना, असमय वर्षा होना, अधिक वर्षा से बाढ़ की स्थिति बनना के अलावे कई अन्य प्रभाव दिखने लगे हैं जिससे कृषि के साथ-साथ मानव जीवन पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव स्पष्ट तौर पर लोग महसूस कर रहे हैं। इन दुष्प्रभावों से बचने के लिए पर्यावरण को संरक्षित करना होगा। इसमें जैव विविधता को भी ध्यान में रखना होगा। प्रकृति में छोटे से छोटे जीव के साथ-साथ छोटे से छोटे पौधों का भी प्राचीनकाल से महत्व रहा है। सनातन काल से हमारे देश के सभी धार्मिक ग्रंथों में भी प्रकृति और जैव विविधता को पूजनीय माना जाता है। जैव विविधता के नष्ट होने से गौरैया और गिद्ध जैसे पक्षी विलुप्त हो रहे हैं। अब तो मोर और साइबेरियन पक्षी को भी बचाना चुनौतीपूर्ण कार्य है। कई प्रकार के पौधे, झाड़ियों के नष्ट होने से प्राकृतिक असंतुलन स्पष्ट दिखने लगे हैं। जैविक संसाधनों का अवैज्ञानिक तौर पर दोहन हो रहा है जिसकी वजह से समस्याओं का बढ़ना आम हो गया है। विशेषज्ञों की मानें तो कोरोना उसी की एक बानगी है।

 जल-जीवन-हरियाली अभियान से होगा पर्यावरण संरक्षण


बिहार सरकार पर्यावरण संरक्षण के लिए लगातार काम कर रही है। राज्य सरकार की प्राथमिकता में पर्यावरण संरक्षण प्राथमिकता में सबसे ऊपर है। हाल ही के दिनों में मुख्यमंत्री ने जल-जीवन-हरियाली के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए कई जिलों में यात्रा की और स्वयं मॉनिटरिंग की। जल-जीवन-हरियाली अभियान के माध्यम से सरकार इस पर अगले तीन वर्षों में 24 हजार 500 करोड़ रुपए खर्च कर रही है।

इस अभियान का मुख्य उद्देश्य जल का संरक्षण के साथ-साथ हरियाली को बढ़ावा देना है। जल-जीवन-हरियाली अभियान का मतलब है जल औऱ हरियाली है तभी जीवन सुरक्षित है। बिहार में हरित आवरण 15 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जिसे 17 प्रतिशत तक पहुंचाने के लक्ष्य पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार काम कर रहे हैं। हरियाली मिशन के अंतर्गत 19 करोड़ पौधे लगाए जा चुके हैं। इस वर्ष पृथ्वी दिवस के दिन 2.51 करोड़ पौधा लगाए जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। राज्य में नर्सरी को बढ़ावा दिया जा रहा है। बागवानी कृषि के साथ ही पशुओं के संरक्षण एवं उनकी प्रजाति को स्वस्थ्य बनाए रखने के लिए राज्य सरकार कई कदम उठा रही है।

पर्यावरण संरक्षण से होगा कई समस्याओं का समाधान


वाहन प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए राज्य में सड़कों के किनारे वृक्ष लगाए जा रहे हैं। सभी सार्वजनिक तालाब, आहर, पईन आदि को अतिक्रमणमुक्त करवाकर जल की व्यवस्था के साथ-साथ कुछ जलीय जीवों एवं पक्षियों की उपलब्धता सुनिश्चित करायी जा रही है और वहां पर पौधे भी लगाए जा रहे हैं ताकि मनुष्य स्वच्छ वातावरण में रह सकें और अन्य जीव जंतुओं के साथ सहभागिता भी उसकी बनी रहे। कृषि भूमि में रासायनिक खाद, कीट पतंग, फफूंद एवं खरपतवार नाशक दवाई उपयोग करने से कृषि भूमि की मृदा शक्ति को कमजोर बना रहे हैं। इन सब चीजों को ध्यान में रखते हुए जल-जीवन-हरियाली अभियान में मौसम के अनुकूल फसलचक्र अपनाने के साथ-साथ फसल अवशेष को जलाए जाने को रोकना भी शामिल है। राज्य सरकार जैविक खेती को बढ़ावा दे रही है।

अवैध खनन, पेड़ पौधे नष्ट करना, जीवों का नाश, पराली जलाने से होने वाले नुकसान से जैव संसाधन नष्ट हुए हैं। जैव विविधता के साथ जैविक जंतु संरक्षण करना भी जरुरी है। सभी के लिए सतर्क होने का समय है क्योंकि कोरोना खतरे की आहट है। हमें पर्यावरण का संरक्षण और महत्ता को गंभीरता से लेना ही होगा।

लेखक
मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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