कोरोना से आर्थिक मोर्चे पर भी लड़ रही हैं सरकारे


कोरोना से आर्थिक मोर्चे पर भी लड़ रही हैं सरकारे


कोरोना से आर्थिक मोर्चे पर भी लड़ रही हैं सरकारे 


दुलीचंद कालीरमन



विश्व में कोरोना वायरस  का कहर जारी है। विश्व का शायद ही कोई देश बचा हो जहां इस बीमारी ने अपने पैर न पसारे हो। इसका एक कारण यह भी है कि आज विश्व एक ग्लोबल विलेज की अवधारणा पर विकसित हो चुका है। अब वैश्विक नागरिक की अवधारणा पर चर्चा होने लगी है। हर देश का नागरिक विश्व के हर कोने में मिल जाएगा। यह सब सूचना तकनीक तथा यातायात के आधुनिक साधनों के कारण संभव हुआ है। हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। इससे वैश्विक आत्मनिर्भरता तो बढी है लेकिन कोरोना जैसी महामारी को वैश्विक स्तर पर फैलाने का एक कारण यह वैश्विक नागरिकता भी है।  हर दिन विश्व में मौतों का आंकड़ा बढ़ रहा है। विश्व की 80% जनसंख्या अपने घरों में कैद है। अभी तक इसके बचाव का सिर्फ यही एक कारगर उपाय है। अमेरिका, इटली, स्पेन, फ्रांस व इंग्लैंड जैसे विकसित देशों में नागरिकों की मौतों तथा संक्रमित आंकड़ा मरीजों का आंकड़ा दिल दहलाने वाला है।

भारत में भी 25 मार्च से 14 अप्रैल तक लॉकडाउन चल रहा है। आंकड़ों के अनुसार लॉक डाउन से संक्रमण की बढ़त में कुछ कमी आई है। लेकिन केंद्र तथा राज्यों की सरकारें कोरोना के साथ-साथ आर्थिक मोर्चे पर भी जूझना पड़ रहा है। आर्थिक गतिविधियां बंद हैं। सरकारी राजकोष में राजस्व की आवक निरंतर कम होती जा रही है। देश के दिहाड़ीदार मजदूर व किसानों के जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए केंद्र व राज्य सरकारें आर्थिक मदद दे रही हैं लेकिन इसमें कुछ विसंगतियां भी है।

 इक्कीस  दिन लंबे लॉकडाउन के कारण दिल्ली तथा पंजाब से मजदूरों की जो भीड़ अपने अपने घरों को निकली, वह ग्रामीण भारतीय जनता की आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति को रेखांकित करती है। तस्वीरों से स्पष्ट होता है कि ग्रामीण क्षेत्र में बेरोजगारी की दर बहुत ज्यादा है, इसलिए कोई अकेला तो कोई परिवार सहित दिल्ली, फरीदाबाद व लुधियाना के औद्योगिक क्षेत्रों में जीवन यापन के लिए आते हैं। लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह लंबे समय तक शहर में रहकर बिना आमदनी के जीवन यापन कर सकें।

 केंद्र सरकार ने स्थिति से निबटने के लिए आर्थिक मोर्चे पर कई कदम उठाए हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक लाख सतर हज़ार करोड रुपए के राहत पैकेज की घोषणा की है। जिसमें दिव्यांगों, विधवाओं तथा वृद्ध व्यक्तियों के लिए अतिरिक्त तथा अग्रिम पेंशन की घोषणा की गई है। किसानों को भी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के माध्यम से किसान सम्मान निधि का प्रावधान किया गया है। संकट की इस घड़ी में रिजर्व बैंक ने भी आर्थिक स्थिति को गंभीरता से समझते हुए रेपो रेट में 75 बेसिस प्वाइंट तथा रिवर्स रेपो रेट में 90 बेसिस प्वाइंट की कमी की है। कैश रिजर्व रेशों में भी 1% की कमी की गई ताकि बैंकों के पास पर्याप्त मात्रा में धन उपलब्ध रहें जिससे बैंक  आकस्मिक व संकटकालीन ऋण दे सकें।

 अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रमुख क्रिस्टलीना गेओर्गिएवा ने भी  विश्वव्यापी आर्थिक मंदी आने की आशंका व्यक्त की है। भारतीय अर्थव्यवस्था पहले से ही दबाव में थी। लेकिन कोरोना महामारी के कारण सकल घरेलू उत्पाद में और भी कमी आने की आशंका है। अमेरिका ने भी दो ट्रिलियन डॉलर के राहत पैकेज की घोषणा की है। आस्ट्रेलिया तथा इंग्लैंड ने भी अपने नागरिकों को बेरोजगारी भत्ता देने की घोषणा की है, जिस पर भारी धनराशि खर्च की जाएगी।

 भारतीय समाज में मुसीबत के समय दान की एक प्राचीन परंपरा रही है। उद्योग, सिनेमा, खेल क्षेत्र की हस्तियों ने अपने सामर्थ्य अनुसार प्रधानमंत्री तथा राज्यों के मुख्यमंत्री राहत कोष में काफी मात्रा में धन दिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सिख समाज के गुरुद्वारा के सेवादार तथा अन्य सामाजिक व धार्मिक संस्थाएं निरंतर अभावग्रस्त लोगों की मदद के लिए आगे आ रही हैं।

 भारत जिस प्रकार 2008-09 की आर्थिक मंदी से सबसे पहले उभरा था, वर्तमान आर्थिक मंदी से भी भारत ही सबसे पहले उभरेगा। चीन कोरोना के कारण वैश्विक स्तर पर बदनाम हो चुका है। सभी आर्थिक गतिविधियां पूरे विश्व में थम सी गई हैं। चीन का निर्यात बंद तो नहीं हुआ अपितु बहुत कम हो गया है। भारत के मामले में जो सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू यह है कि हमारा सबसे बड़ा आयात बिल कच्चे तेल का था। कच्चे तेल की कीमतों में भारी कमी होने से सरकार अपना राजस्व घाटा पूरा कर लेगी। मौजूदा महामारी के दौरान देश की ज़्यादातर आबादी के खातों में नगद सहायता राशि पहुंची है। जिससे मांग बढ़ेगी तथा इस मांग को जारी रखने में हमारे हमारे घरेलू खपत भी बड़ा योगदान करेगी।

 अप्रैल महीने में रबी की फसल तैयार होगी। अगर सरकार किसानों की फसल को समुचित ढंग से एमएसपी की दर से मंडियों के माध्यम से खरीदने में सफल हो जाती है तो इससे ग्रामीण भारत में मुद्रा प्रवाह बढ़ेगा। कोरोना की समस्या के कारण बहुत सारे असंगठित क्षेत्र के मजदूर शहरों से गांव में पलायन कर चुके हैं। इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा। इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि रबी के सीजन में गांव में मजदूरों की कमी नहीं रहेगी। पंजाब तथा हरियाणा के गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में कटाई का ज्यादातर कार्य मशीनों के माध्यम से होता है। इस दौरान मजदूरों की कमी से ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा।

 अभी कोरोना के  जो आंकड़े आ रहे हैं , उनसे यह आशा है कि इस संकट की घड़ी में भारत बिना ज्यादा नुकसान के निकलने में सफल  होगा।  आर्थिक मोर्चे पर भी सरकार प्रभावी कदम उठा रही है । आर्थिक मंदी की आहट से भी भारत को ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है बल्कि सधे हुए कदमों के साथ त्वरित निर्णय लिए जाने की दरकार है। जो वर्तमान सरकार ले भी रही है।



दुलीचंद कालीरमन
करनाल
9468409948

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