भारत भूषण वर्मा द्वारा तांटक छंद में रचित कविता - "भारतीय संस्कृति"


भारत भूषण वर्मा द्वारा तांटक छंद में रचित कविता-"भारतीय संस्कृति"


 भारत भूषण वर्मा


मैं भारत-संस्कृति नायक हूं ,
संस्कृति-शंख बजाऊँ मैं ।
शंखनाद की प्रतिध्वनियों से
विकृतियों को मिटाऊँ मैं ।।
भरतवंश का परिचायक हूं ,
इसके गीत सुनाऊँ मैं । 
संस्कारों के संरक्षण से 
सुंदर भुवन सजाऊँ मैं ।।

धन्या भारत-संस्कृति जिसमें
अद्भुत वेद-ऋचाएँ हैं ।
ज्ञानकोश-रत्नाकर जिसमें ,
इसके गर्भ समाए हैं ।।
शिव-शंकर का तांडव जिसमें ,
लास्य मां पार्वती का है ।
रूप चतुर्दश-विद्या जिसमें ,
वर यह सरस्वती का है  ।।

महाकाव्य रामायण जिसमें ,
प्रभु राम और सीता हैं ।
जिनके पावन अवतरणों से 
संस्कृति परम् पुनीता है ।।
व्यासमुनि की महाभारत में
संघर्षों की ज्वाला है ।
सच्चा सुख मिले धर्मार्थ से ,
यह निष्कर्ष निकाला है ।।

अर्जुन का विषाद है जिसमें ,
मधुसूदन की गीता है ।
कर्मयोग, अध्यात्म-चित्त से ,
हारे मन को जीता है ।।
कितने वैरी-दल आए थे ,
चले गए फिर आएंगे ।
हमें मिटाने जो आए थे ,
कहां गए ? मिट जाएंगे ।।

संस्कृतियों के अंश समाए
जैसे गंगा-माता है ।
पावनता के तट पर लाए ,
विश्व-प्रेम से नाता है ।।
अपनी संस्कृति के चंदन से ,
'भूषण' तिलक करें सारे ।
भारत-माता के वंदन से ,
दानवता को संहारे ।।

 भारत भूषण वर्मा

Post a Comment

0 Comments

 विश्व के लिए खतरा है चीन