आलोक कौशिक की गजल




आलोक कौशिक


मानव ही मानवता को शर्मसार करता है। 
सांप डसने से क्या कभी इंकार करता है॥


उसको भी सज़ा दो गुनहगार तो वह भी है, 
जो ज़ुबां और आंखों से बलात्कार करता है।


तू ग़ैर है मत देख मेरी बर्बादी के सपने
ऐसा काम सिर्फ़ मेरा रिश्तेदार करता है।


देखकर जो नज़रें चुराता था कल तलक
वो भी छुपकर आज मेरा दीदार करता है।


दे जाता है दर्द इस दिल को अक़्सर वही
अपना मान जिसपर ऐतबार करता है।


मुझको मिटाना तो चाहता है मेरा दुश्मन
लेकिन मेरी ग़ज़लों से वो प्यार करता है।


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संक्षिप्त परिचय:-

आलोक कौशिक
शिक्षा- स्नातकोत्तर (अंग्रेजी साहित्य)
पेशा- पत्रकारिता एवं स्वतंत्र लेखन
प्रमुख राष्ट्रीय समाचारपत्रों एवं साहित्यिक पत्रिकाओं में दर्जनों रचनाएं प्रकाशित
पता:- मनीषा मैन्शन, जिला- बेगूसराय, राज्य- बिहार, 851101,
अणुडाक- devraajkaushik1989@gmail.com

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