खेती से मोहभंग,विदेश जाने की उमंग

खेती से मोहभंग,विदेश जाने की उमंग

 कृषि क्षेत्र में लगातार बिगड़ते हालात और रोजगार के संकुचित होते अवसरों को देखकर पंजाब तथा हरियाणा का युवा विदेश में बसने का सपना आंखों में पाल रहा है. खेती-बाड़ी से उसका मोहभंग हो चुका है.  वह विदेश जाने की उमंग में जमीन बेचकर भी विदेश जाने की टिकट पक्की करना चाहता है. पंजाब के नागरिकों का विदेशों में बसने का पुराना इतिहास रहा है, लेकिन आज के हालात थोड़े अलग हैं.


 पिछले दिनों पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला के प्रोफेसर कमलजीत सिंह तथा डॉक्टर रकसिंदर कौर ने विभिन्न केंद्रों पर आईलेट्स की पढ़ाई कर रहे अनेक विद्यार्थियों पर अपना अध्ययन किया. जिसमें कुछ चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए.  इस अध्ययन में पाया गया कि विदेश में पढ़ने की इच्छा रखने वाले बच्चों में से 70% बच्चे किसान परिवारों से संबद्ध है. यह युवक अपनी खेती-बाड़ी के व्यवसाय को करीब से देख चुके हैं. इन्हें अब कृषि में अपना भविष्य नजर नहीं आता. इसलिए वे एक बेहतर भविष्य की तलाश में विभिन्न शहरों में आईलेट्स केंद्रों पर अंग्रेजी सीख रहे हैं.


 इस अध्ययन में यह भी उजागर हुआ कि विदेश जाने की चाह रखने वाले 79% युवा ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं. इनमें से ज्यादातर युवकों  के माता-पिता मझौली या छोटी जोत वाले किसान हैं. 56% युवाओं के परिवार के पास 5 एकड़ से कम कृषि भूमि तथा 24% परिवारों के पास 10 एकड़ से कम कृषि भूमि है. प्रोफेसर कमलजीत के अनुसार ज्यादातर माता-पिता अपने सीमित संसाधनों के कारण बच्चों को विदेश भेज रहे हैं. जबकि बड़े किसान अपने सामाजिक रुतबे के लिए ऐसा कर रहे हैं. पहले केवल सरकारी कर्मचारियों के बच्चे ही विदेशों में शिक्षा ग्रहण करने जाते थे. अब यह रुझान बदल चुका है. 70% बच्चे किसानों के जा रहे हैं. जबकि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों का प्रतिशत 16.5 रह गया है. किसानों व सीमित आय वाले परिवार अपनी जमीन बेचकर या उधार लेकर बच्चों को विदेश भेज रहे हैं.


 ज्यादातर बच्चे उन देशों को वरीयता दे रहे हैं. जहां पर जाकर नागरिकता की संभावना बन सकती है. उत्तर भारत के 78% बच्चे कनाडा, 13% बच्चे ऑस्ट्रेलिया, 2% अमेरिका, 1.5% न्यूजीलैंड और 0.5% ब्रिटेन जा रहे हैं. 17% बच्चों ने यह भी माना कि उनके माता-पिता उनको विदेश भेजने के लिए अपनी जमीन या अन्य कोई संपत्ति बेचेंगे. 37% बच्चे कर्ज लेकर विदेश जा रहे हैं. जबकि 10% ऐसे बच्चे भी थे, जिनके रिश्तेदार पहले से ही विदेशों में बसे हुए हैं. 


 एक चौंकाने वाला रुझान यह भी सामने आया कि चाहे पंजाब और हरियाणा कन्या भ्रूण हत्या तथा कम लिंगानुपात के लिए बदनाम है. लेकिन विदेश पढ़ने की चाह में लड़कियां लड़कों से आगे हैं. आईलेट्स केंद्रों पर अंग्रेजी सीख रहे विद्यार्थियों में 58% लड़कियां तथा केवल 42% लड़के हैं. कई विजा कंसलटेंट तथा आईलेट्स केंद्रों के संचालकों ने बताया कि पहले विद्यार्थी विदेश ज्यादातर पोस्टग्रेजुएट कोर्स के लिए ही जाते थे. लेकिन वर्तमान में उत्तर भारत विशेषकर पंजाब व हरियाणा में अंडर ग्रेजुएट विद्यार्थियों के विदेश में पढ़ने में काफी वृद्धि हुई है. दक्षिण भारत में अभी भी विदेश जाने की वाले विद्यार्थियों में पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स वाले विद्यार्थियों की संख्या ज्यादा रहती है.


इस अध्ययन का एक अन्य सामाजिक और जातिगत पहलू भी है.  विदेश जाने की चाह रखने वाले 90% बच्चे सामान्य वर्ग के थे. 8% पिछड़े वर्ग से तथा केवल 2% अनुसूचित जाति वर्ग से थे. इससे स्पष्ट है कि उत्तर भारत में कृषि योग्य जोत लगातार कम हो रही है. गला काट प्रतियोगिता के इस युग में सरकारी नौकरियों के आंकड़े निरंतर सिकुड़ रहे हैं. निजी क्षेत्र में भी नौकरियां नहीं बढ़ रही हैं. भारत में जातिगत उच्चता के कारण अन्य रोजगार के साधन भी सामान्य वर्ग के लिए सीमित हो गए.


 समय के साथ-साथ विदेश में पढ़ाई या नौकरी के प्रति नजरिए में भी परिवर्तन आया है. वर्षों पहले इसको “ब्रेन ड्रेन” कहा जाता था. क्योंकि भारत का युवा यहां के महंगे मेडिकल, इंजीनियरिंग कॉलेजों  और आईआईटी में पढ़ कर विदेशों में नौकरी करने चला जाता था. सरकार और समाज इसे अच्छी दृष्टि से नहीं देखते थे. लेकिन आज विदेश में पढ़ाई करने से ब्रेन ड्रेन का तमगा हट चुका है. आज सरकार इसे विदेशी मुद्रा के स्त्रोत के रूप में देखती है. अनिवासी भारतीय  प्रति वर्ष लगभग 80 बिलियन डॉलर (5.6 लाख करोड़ रुपए) भारत में भेजते हैं. विदेशों से आया यह पैसा डॉलर की मुद्रा में होता है. जिससे भारत में विदेशी मुद्रा भंडार की सेहत अच्छी बनी रहती है. 


विदेश गमन की इस उमंग के कुछ समाजिक प्रभाव भी हैं. हरियाणा और पंजाब के कुछ ग्रामीण इलाकों में  आर्थिक समृद्धि तो आई है. लेकिन बच्चों के विदेश चले जाने के बाद माता-पिता में एक अकेलेपन की भावना देखी जा रही है. आकस्मिक परिस्थितियों के बारे में सोचकर वृद्धावस्था में असुरक्षा की भावना बनी रहती है. फिर भी हर मां-बाप अपने बच्चे को बेहतर भविष्य के लिए विदेश भेजने के लिए तैयार हो जाता है. 

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