रामकुमार आत्रेय : साहित्य को हवा,पानी, और धूप समझने वाला साहित्यकार


रामकुमार आत्रेय: साहित्य को हवा ,पानी, और धूप समझने वाला साहित्यकार

      हरियाणा साहित्य अकादमी के बालमुकुन्द गुप्त पुरस्कार से सम्मानित मूर्धन्य साहित्यकार रामकुमार आत्रेय आज हमारे बीच नहीं रहे। उनका जाना साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति है। उनके लिए साहित्य हवा, पानी और धूप रहा। वे स्वयं कहा करते थे-साहित्य मेरे लिए हवा भी है,पानी भी है, और धूप भी। इन्हें पाने और सहेजने के लिए मैं अक्सर भटका भी हूँ और अटका भी। इसी राह पर आगे बढ़ते रहने पर मैंने झटका भी खाया है और पटका भी। इस प्रक्रिया के दौरान मेरे तन-मन पर गहरे निशान जन्म लेते रहे हैं। तन पर पड़े निशान तो समय पाकर क्रमानुसार मिटते रहे और फीके पड़ते रहे। परन्तु मन पर पड़े निशान निरन्तर सालते रहे हैं। उनका फीका पड़ना, मिटना, मेरे वश में कभी नहीं रहा। निशान पड़ने की यह प्रक्रिया आज भी जारी है। लगता है जब तक जिंदा रहूँगा तब तक जारी ही रहेगी।’’

उसी साहित्यिक-साधना के बल पर आत्रेय जी ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। देश की ऐसी कोई पत्र-पत्रिका नहीं रही ,जिसमें उनकी रचनाएं ससम्मान प्रकाशित हुईं हों।  बहुत-सी रचनाओं के अनुवाद अंग्रेजी, उडिया, पंजाबी, मराठी, गुजराती, डोगरी, तथा उर्दू भाषाओं में हुए। आत्रेय जी को अनेक पुरस्कारों से अलंकृत भी किया गया। 
          आत्रेय जी का जन्म कैथल जिले के करोड़ा गांव में नेकी राम शर्मा और माता राज देवी के घर 01फरवरी 1944 को हुआ। उन्होंने दसवीं तक की शिक्षा अपने गाँव के विद्यालय से प्राप्त की। उसके बाद प्राथमिक अध्यापक का प्रशिक्षण प्राप्त कर अध्यापक नियुक्त हो गए। प्रभाकर करने के उपरांत हिंदी अध्यापक के पद पर पदोन्नत हुए।  सेवाकाल के दौरान अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए प्राचार्य पद तक जा पहुंँचे। इसके बावजूद वे खुद को साक्षर मात्र मानते थे। यह उनका बडप्पन ही कहा जायेगा। 
          उनकी जिंदगी में झांक कर देखंे तो सुख कभी ढंग से उनके जीवन में ताल मिला सका। यदि हम उनके पास मिले पत्रों का जिक्र करें तो 1985 के आसपास से शुरू होकर अंत समय तक दुखों ने उन्हें किसी किसी रूप में घेरे रखा। विष्णुप्रभाकर, रमेशचन्द्र गुप्त, सुभाष रस्तोगी, नरेश कुमार उदास, शशिभूषण बडोनी और भी जाने कितने ही साहित्यकार मित्रों के पत्रों को पढ़ने से पता चलता है कि वे समय-समय पर उनके दुखों एवं स्वास्थ्य बारे चर्चा करते रहते थे। बताना चाहूंगा 6 वर्ष की आयु में उनके पिता का निधन हो गया। आगे चलकर 30 वर्ष की आयु में एक बीमारी में धर्मपत्नी छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर इस लौकिक संसार से विदा हो गई। और उनके जाते ही वे भी भयंकर बीमारी की चपेट में गए। फिर ढलती आयु में नेत्र ज्योति साथ छोड़ गई। पर उनका जीवट इतने कमाल का था कि उन दुखों से कभी हार नहीं मानी। इसके बावजूद वे अपने दुखों को भूलकर आम आदमी की पीड़ा को शब्दों में पिरोकर समाज को एक नई राह दिखाने का प्रयास करने लगे थे। 
यदि उनके साहित्य की बात करें तो  वे स्वयं को मूलतः कवि मानते थे।  वे बताते थे- मैंने शुरूआती दिनों में ही विष्णु प्रभाकर और रामधारी सिंह दिनकर का साहित्य पढ़ा। मुझे विष्णु प्रभाकर के नाटकों में और  रामधारी सिंह दिनकर की कविताओं में बड़ा आनन्द आता था और दिनकर की कविताओं से पे्ररित हो  मेरे मन में काव्य के अंकुर फूटने लगे। वैसे ये अंकुर बचपन में ही फूटने लगे थे
उसके बादबुझी मशालों का जुलूसबूढ़ी होती बच्ची’, ‘आंधियों के खिलाफ’, ‘रास्ता बदलता ईश्वरऔरनींद में एक घरेलू स्त्रीकाव्य-संग्रह प्रकाशित हुए। इनकी कविताएँ बिना किसी आडम्बर के सीधी-सरल भाषा में लिखी गई हंै।  उन पर सपाट-बयानी का आरोप लग सकता है पर आत्रेय जी का मानना है कि मात्र कला के नाम पर लिखी गई कविताओं में भाषा की जटिलता और सर्वथा अप्रचलित बिम्बों की बोझिलता एक गुण हो सकती है, लेकिन दुःख-दर्द की भाषा किसी आडम्बर की मुहताज नहीं होती। फिर मैं तो उस कविता को कविता नहीं मानता जो पाठक के दण्ड पेलने पर भी उसकी समझ में आए।
वे साहित्य में वास्तविक जीवन और जीवन में साहित्य की उपस्थिति को जरूरी मानते हैं। इनकी कहानियों में यह सब स्वतः स्पष्ट होता चला जाता है। अब तक आत्रेय जी के तीन कहानी संग्रहपिलूरे तथा अन्य कहानियाँ’, ‘आग, फूल और पानीऔर सिर्फ कहानी नहींप्रकाशित हो चुके हैं। इनकी कहानियाँ पाठक को अन्याय के विरूद्ध एक हथियार थमाती हैं। इनकी कहानियां समझ पैदा करती हैं कि जुर्म करना पाप है तो जुर्म सहना भी पाप है। 
आत्रेय जी की लगभग 250 लघुकथाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। इनके चार लघुकथा संग्रह- ‘इक्कीस जूते’ (1993), ‘आँखों वाले अंधे’(1999) ‘छोटी-सी बात’ (2006) और (2012) में बिन शीशों का चश्माप्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लघुकथाओं में समकालीन समाज की चिंताए  तीक्ष्ण और यथार्थपरक ढंग से  पाठकों के सामने उपस्थिति दर्ज करवाती हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र योगेश कुमार ने कथादेश पत्रिका मेंअखिल भारतीय कथादेश लघुकथा प्रतियोगितामें पुरस्कृत लघुकथाएकलव्य की विडम्बनाको इलाहबाद की गलियों में स्ट्रªीट प्ले के रूप में प्रस्तुत किया है। स्मरण रहे इससे पूर्व भी कथादेश द्वारा आयोजित लघुकथा प्रतियोगिता में पुरस्कृत लघुकथाबिन शीशो का चश्माका भी  नाट्य स्पांतरण करके इंदौर की एक संस्था ने उसका मंचन किया था। 
          उनकी रचनाओं में हरियाणा की माटी की खुशबू बड़ी शिद्दत से महसूस की जा सकती है।  उनका हरियाणवी भाषा में  एक दोहा संग्रहसच्चाई कड़वी घणीऔर माटी की आवाजप्रकाशित हो चुके हंै। माट्टी की आवाजसे संबंधित एक विशेष घटना का उल्लेख करते हुए आत्रेय जी बताते थे- बात बीसवीं शताब्दी के आठवें दशक के प्रारम्भ की है। हरियाणा साहित्य ने हिंदी दिवस के उपलक्ष्य पर एक राज्य स्तरीय सम्मेलन का आयोजन किया था। मैं भी उसमें आमंत्रित था। लंच के वक्त मैं सबसे अलग एक ओर घास पर बैठा था। तभी डाॅ पृथ्वीराज कालिया मेरे समीप आए और मेरी बांह पकड़ कर एक कमरे में बैठे विशेष अतिथि डाॅ. नामवर सिंह के पास ले गए। उनके समक्ष मुझे खड़ा करते हुए कालिया जी ने नामवर जी से कहा-‘‘यह वह रचनाकार है जिनकी रचनाओं में हरियाणवी की माटी की गंध मौजूद है। इनका नाम रामकुमार आत्रेय है। इनकी रचनाओं की गंध  इतनी प्रखर हैकि आप उसे माटी की आवाज भी कह सकते हैं।’’ स्मरण रहे डाॅ पृथ्वीराज कालिया स्वयं एक सशक्त कवि थे और तब साहित्य अकादमी के निदेशक के पद पर कार्यरत थे।
आत्रेय जी लगातार तीन वर्षों तक दैनिक ट्रिब्यून के लिएखरी-खोटीनामक स्तम्भ लेख लिखते रहे थे। जिसमें वे समसामयिक विषयों को आधार बनाकर व्यंग्यात्मक शैली में आम जन की बात कहते थे। और उसके अंत में उसी से मिलता-जुलता एक हरियाणवी  बोली में एक चुटकला भी देते थे।
इस प्रकार इनका व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों समान रूप से अनुकरणीय रहे। नेत्रज्योति साथ छोड़ जाने के बाद भी आत्रेय जी का एक तपस्वी की भाॅति लेखन से जुड़े रहे और 14 सितम्बर 2019 को घरौंडा करनाल में वीएचसीए के सौजन्य से करवाए जा रहे हिंदी दिवस समारोह में भाग लेकर अरूण कुमार के साथ वापस लौट रहे थे। अरूण जी उन्हें एक स्थान पर छोड़कर वापस चले गए ता उनका पोता विकास उन्हें  आजाद नगर कुरूक्षेत्र में घर की ओर लेकर जा रहा था कि  कि एक कार चालक उन्हें टक्कर मारकर भाग गया। अस्पताल में दाखिल हुए। वहां उनका इलाज चलता रहा और लगभग ठीक होकर घर चले गए थे।  पर घर जाने के बाद फिर से दर्द ने घेर लिया।  उनका पुत्र पवन उन्हें पंचकूला चैक करवाकर लाया। डाक्टरी रिर्पोट में सब नार्मल आता पर दर्द रुकने का नाम लेता था। और 29 सितम्बर 2019 को साहित्य का वो तारा डूब गया। लेकिन हमें विश्वास है वह सितारा आसमान  में घू्रव तारा बनकर हमेशा चमकता रहेगा। 
जैसे ही यह खबर साहित्यकार मित्रों को पता चली कि शोक की एक लहर फैलती चलती गई। बलराम अग्रवाल, अशोक भाटिया, अमृतलाल मदान, दिनेश दधीचि, मधुकांत, मधुदीप, सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, कमल चोपड़ा, कांता राय, रूपदेवगुण, शील कौशिक, नरेश कुमार उदास, श्याम सुन्दर अग्रवाल, श्याम सुन्दर दीप्ति, सतीशराज पुष्करणा, मुकेश शर्मा, अशोक जैन, कुमुद बंसल, मार्टिन जाॅन, उमेश महादोषी, नीरज शर्मा, भगीरथ परिहार, डाॅ मुकेश अग्रवाल, सुभाष शर्मा, कृष्ण भक्त, शशिभूषण बड़ोनी, पंकज शर्मा, विजय कुमार, नरेन्द्र कुमार गौड, कमलेश चैधरी, हरपाल, अरूण कुमार के साथ अनेक साहित्यकार साथियों  ने अपने-अपने ढंग से श्रद्धांजलि दी। डाॅ अशोक भाटिया ने आत्रेय जी के उदा त्त गुणों को देखते हुए उन्हेंदेवताके रूप में व्यक्त किया। औरदेवतानाम से लघुकथा लिखी। रामेश्वर काम्बोज ने कहा-आत्रेय जी बहुत ही विनम्र, वरिष्ठ होते हुए भी सबको प्रोत्साहित करने वाले, पढ़ी गई हर अच्छी रचना पर फोन करके लेखकों का मनोबल बढ़ाने वाले साहित्यकार थे।
सुकेश  साहनी ने लिखा है -बड़े भाई जैसा ,सच्चा ,सहृदय, साहित्यकार मित्र चला गया। इस रिक्तता को भर पाना मुश्किल है। अंत में इतना ही कहा जा सकता है कि उनका साहित्य उनका स्थान लेगा, और हमें प्रेरित करता रहेगा। इनके अतिरिक्त  अनेक साहित्यकार साथियों के शोक संदेश आए। 
सम्पर्कः-
राधेश्याम भारतीय
नसीब विहार कालोनी
घरौंडा करनाल 132114
मो. 9315382236
Email-rbhartiya74@gmail.com

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