घुसपैठ सुरक्षा का मुद्दा है धार्मिक नहीं

घुसपैठ सुरक्षा का मुद्दा है धार्मिक नहीं
घुसपैठ सुरक्षा का मुद्दा है धार्मिक नहीं

नागरिकता संशोधन विधेयक 10 जनवरी को गजट प्रकाशित होने के बाद लागू हो गया. इस विधेयक को 10 दिसंबर को लोकसभा तथा अगले ही दिन राज्यसभा में पारित किया गया. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद 12 दिसंबर को इसने कानूनी कानूनी रूप ले लिया था. इस विधेयक से पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक प्रताड़ना का शिकार रहे हिंदू, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और यहूदी अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है .इस कानून को लेकर देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. वहीं इसके समर्थन में भी बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर आए हैं.

 कुछ राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारों ने इसे लागू करने की घोषणा कर दी है. राज्य सरकारों का यह कदम अलोकतांत्रिक तथा असंविधानिक है. संविधान में यह स्पष्ट उल्लेख है कि केंद्रीय सूची के विषयों में संसद द्वारा पारित कानून का पालन करना राज्य सरकारों का संवैधानिक दायित्व है. अगर राज्य सरकार ऐसा करने में विफल रहती है तो संबंधित राज्यपाल राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकता है.

 घुसपैठ का मुद्दा सबसे पहले असम मे 1979  में चर्चा में आया जब घुसपैठियों के खिलाफ छात्र आंदोलन खड़ा हो गया. 6 साल लंबे आंदोलन के बाद 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी तथा छात्र संगठनों में असम समझौता हुआ. जिसके तहत 24 मार्च 1971 के बाद आसाम में आए सभी घुसपैठियों को पहचान कर उन्हें वापिस बांग्लादेश भेजने पर सहमति बनी. बाद के वर्षों में अवैध घुसपैठियों को पहचानने की दिशा में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई. क्योंकि उस समय की सरकारों में इस मुद्दे पर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी  थी. कुछ राजनीतिक पार्टियों को अपने वोट बैंक की चिंता भी होने लगी थी. 

 जब दशकों बाद भी घुसपैठियों को चिन्हित करने में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई तो सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 में  स्वयं एनआरसी को मॉनिटर करना शुरू कर दिया. इसी का परिणाम था कि 31 अगस्त 2019 को प्रकाशित असम के नागरिकों की सूची में 19 लाख नागरिक अवैध पाए गए. इनमें से काफी संख्या में बांग्लादेशी हिंदू भी थे जो 90 के दशक में बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतों के द्वारा प्रताड़ित किए गए थे. जो किसी तरह जान बचाकर भारत में शरण के लिए आए थे. विपक्ष जिस तरह से संविधान  और धर्मनिरपेक्षता का नारा देकर मुसलमानों को बरगला रहा है. उसे यह समझना चाहिए कि बांग्लादेश, पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान में बहुसंख्यक वर्ग इस्लाम को मानता है. उपरोक्त तीनों देश धर्मनिरपेक्ष नहीं अपितु इस्लामी देश हैं. इसलिए भारत सरकार ने यह फैसला किया कि हम केवल इन तीनों देशों के अल्पसंख्यक वर्ग को ही नागरिकता दे सकते हैं क्योंकि उनके पास भारत के सिवा शिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं है. 

 विपक्ष  नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध  में मुसलमानों को भ्रमित कर रहा है.  यही विपक्षी दल छात्र संगठनों को अपनी राजनीति का मोहरा बनाकर उन्हें बलि का बकरा बना रहे हैं.  कांग्रेस पार्टी जब असम में सत्ता में थी तो उसने घुसपैठ की समस्या को लगातार नजरअंदाज किया क्योंकि वह घुसपैठियों में अपना वोट बैंक देखती थी. यह कड़वी सच्चाई है कि शरणार्थी और घुसपैठियों को एक ही तराजू में नहीं तोला जा सकता. लेकिन आज का विपक्ष इसी आग से खेल रहा है.

 पश्चिम बंगाल की तत्कालीन वामपंथी सरकारों ने भी घुसपैठ को बढ़ावा दिया. जिसके कारण पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में जनसांख्यिकी में भारी परिवर्तन हो गया. यही कारण है कि इन जिलों में अपराधिक गतिविधियां बढ़ गई. जब राहुल गांधी असम में जाकर कहते हैं कि असम को नागपुर से नहीं चलने देंगे तो वह उसी अराजक स्थिति को बढ़ावा दे रहे हैं जिससे यथास्थिति बनी रहे तथा घुसपैठ की समस्या पर कोई निर्णायक कदम नहीं उठाया जा सके.

 राजनीतिक दलों को यह समझना पड़ेगा कि देश की सुरक्षा सर्वोपरि है. ऐसी समस्याएं जो राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती देती हैं. उन्हें राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए. बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ देश की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है जिसे धार्मिक नजरिए से  ना देखा जाना चाहिए. 

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