अदनान सामी: कैसे-कैसो को दिया है

अदनान सामी: कैसे-कैसो  को दिया है

अदनान सामी कोपदमश्रीमिलने के हो-हल्ले के बाद अब सोचता हूं कि अच्छा हुआ मुझ जैसे नाचीज को जीवन में कोई पुरस्कार नहीं मिला. मुझे तो यह भी पहली बार पता चला कि पुरस्कार मिलते ही व्यक्ति की वंशावली  खगाली जाती है.

 25 जनवरी के दिन जब टेलीविजन में पुरस्कारों को लेकर ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी. उस वक्त भी हम नीचे समाचारों की चलती पट्टी में अपना नाम ढूंढ रहे थे. हमने मायूस होकर पत्नी की तरफ देखा तो उसने भी मुंह बना लिया. बड़-बड़ाते हुए बोली, सारा दिन कलम घिसते रहते हो, कभी माथा भी घिस लिया करो, शायद किस्मत चमक जाए,

 आज जब पुरस्कार मिलने वालों  के पिता  का पुराण वाचन हो रहा है. तो सोचता हूं कि अगर मेरा नाम भी पुरस्कार प्राप्त महानुभावों में होता तो क्या होता? जब यह पता कर लिया गया है कि नए- नए भारतीय नागरिक बने अदनान सामी के पिता पाकिस्तानी सेना में सिपाही थे. सोनिया गांधी के पिता हिटलर की नाजी सेना में सिपाही थे. ऐसे में अगर मेरा भी  पदमश्री पक्का हो जाता तो शायद अपने  स्वर्गवासी बाबूजी के नाम का जिक्र भी टी.वी. डिबेट में हो जाता. टेलीविजन पर बैठकर जबज्ञानी-ध्यानीउनकी चर्चा करते तो मेरे स्वर्गवासी बाबूजी को कितना सुकून मिलता. शायद  मोहल्ले में मेरे रुतबे के साथ उनका  स्वर्ग में भी रुतबा बढ़ जाता. कभी-कभी मुझे लगता है कि टीवी वाले विद्वान मेरे बाबूजी का जिक्र नहीं करेंगे क्योंकि एक अनपढ़ गरीब किसान का जिक्र उनकी टी.वी. की टी.आर.पी. का बूस्टर डोज नहीं बन सकता. 

अपने शहर में भी कई कलम घिसने वाले हैं. उन्होंने भी अपने-अपने साहित्यिक अड्डे बना रखे हैं. सभी अपने-अपनों को पुरस्कृत करते रहते हैं. जिस गति से तथाकथित साहित्यकार पुरस्कृत किए जा रहे हैं, उस हिसाब से तो अपना नंबर भी आने ही वाला है,

 लेकिन जब से पुरस्कार मिलते ही यह वंशावली पुराण शुरू हुआ है. अपना तो पुरस्कारों से मन ही खट्टा हो गया है. खैर किन्हीबड़े-लोगोंकी असीम-कृपा से अगर पुरस्कार मिल भी गया तो वह अपने पास रहना नहीं, यह पक्का है. क्या पता कौन बुद्धिजीवी-नुमा साहित्यकार सरकार से नाराज हो जाए.अवार्ड/ सम्मान वापसी गैंगबनाकर मुफ्त में मुझे भी उस का सदस्य बना ले. पहले ही इतने अवार्ड/सम्मान वापस हो चुके हैं कि अब तो कम ही बचे होंगे. इसलिए अवार्ड/सम्मान वापसी में भी मेरा नंबर पहले आएगा.

 संतो ने कहा है कि असली शांति त्याग में है. मैं सारे नफा-नुकसान का गणित लगाकर उस सम्मान को हृदय से त्याग रहा हूं, जो मुझे मिला ही नहीं. मैं अपने स्वर्गवासी बाबू जी की भी चिर-निद्रा में विघ्न पैदा नहीं करना चाहता.

 फिर भी आज सुबह से ही अदनान सामी का ही गाना गुनगुना रहा हूंकैसे-कैसो  को दिया है.” 


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1 Comments

  1. ऐसे वैसों को दिया है, मुझको भी तो लिफ्ट करादे।😊😊😊
    बेहतरीन व्यंग्यात्मक प्रस्तुति। व्यंग्य विधा में प्रवेश लेने पर हार्दिक शुभकामनाएं। यह दौर रुके नहीं अब, सादर

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