असंतुलित आर्थिक विकास और पूंजीवाद की सीमाएं

असंतुलित आर्थिक विकास और पूंजीवाद की सीमाएं
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने कहा था किसमता काल्पनिक जगत की वस्तु है”. जब से ही संसार की उत्पत्ति हुई है तभी से हर मनुष्य का स्तरीकरण प्रकृति-प्रदत है, हमें संसार में हर कहीं लैंगिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, भौगोलिक असमानता देखने को मिल जाती. लेकिन इन असमानताओ में आर्थिक असमानता ने विचारको का ध्यान अपनी ओर ज्यादा आकर्षित किया.  कार्ल मार्क्स ने भी आर्थिक असमानता को लेकर-कैपिटलनामक पुस्तक लिखी. जिसमें उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि जीवन के हर पहलू का निर्धारण उसका आर्थिक पक्ष करता है. इससे भी आगे जाकर उन्होंने मानव जाति के इतिहास को आर्थिक आधार पर विवेचन किया. जिसमें उत्पादन के साधनों पर अधिकारों को तथ्य मानकर सिर्फ दो समूहों में विश्व को बांट दिया. पहला बुजुर्वा और दूसरा सर्वहारा. एक राजनीतिक दर्शन के रूप में समानता का सपना लेकर चला मार्क्सवाद कुछ समय बाद स्वयं ही समाप्त हो गया. 

साम्यवाद के खात्मे के बाद पूंजीवाद का घोड़ा विश्व में सरपट दौड़ लगा रहा है. पूंजीवाद की नजर में दुनिया एक बाजार है. बाजार क्रूर होता है. जहां भावनाएं नहीं पूंजी महत्वपूर्ण होती है. पूंजी का प्रवाह बाजार में तो है लेकिन वह आखिर में कुछ ही घरानों तक जाकर सिमट जाती है. पूंजीवाद की शुरुआत में ही इसकी विडंबना सामने आने लगी थी. इसके लिए विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, जैसी संस्थाएं बनाई गई जो पूंजीवाद का लगातार स्वास्थ्य परीक्षण करती रहती हैं. ताकि व्यवस्था में किसी बड़ी बीमारी का लक्षण समय रहते पहचाना जा सके और उसका निदान किया जा सके .

 इसी परिपेक्ष मेंविश्व आर्थिक मंच” (World Economic Forum) की सालाना बैठक स्विट्ज़रलैंड के शहर दावोस में होती है. इस बैठक में विश्व के सभी देशों के अरबपति, उद्योगपति,अर्थशास्त्री और नीति नियामक संस्थाओं के पदाधिकारी भाग लेते हैं. बाजार अर्थव्यवस्था तथा पूंजी के प्रवाह  का आकलन करते हैं तथा आगे की रणनीति बनाते हैं. विश्व आर्थिक मंच की 50 में बैठक में मानवाधिकारवादी संगठन  ऑक्सफेम  ने  टाइम टू केयरनामक रिपोर्ट जारी की है. जिसके अनुसार दुनिया में 2153 अरबपतियों के पास दुनिया की निम्न आय वाले 60% आबादी (460 करोड) की संपत्ति से भी अधिक संपत्ति है. यह रिपोर्ट वर्ष 2019 के आंकड़ों पर आधारित है.  इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में भी 63 अरबपतियों के पास देश के कुल बजट से भी अधिक संपत्ति है. काबिले गौर है कि वर्ष 2018-19 में भारत का बजट 24लाख 42 हजार 200 करोड रुपए था. आर्थिक असमानता के धरातल पर भारत भी इससे जुदा नहीं है. भारत के 01 प्रतिशत अरबपतियों के पास देश की 70% गरीब आबादी (95.3 करोड़) की कुल संपत्ति से 4 गुना धन है.

ऑक्सफेम इंडिया के सीईओ अमिताभ बेहर के अनुसारअसमानता को दूर करने की मजबूत नीतियों के बिना अमीर-गरीब की खाई को पाटा नहीं जा सकता है. इस असमानता को दूर करने के लिए सरकारों को गरीबों के लिए विशेष नीति अमल में लानी होगी”. उन्होंने कहा कि हमारी अक्षम अर्थव्यवस्थाएं आम लोगों की कीमत पर अरबपतियों और बड़ी कंपनियों की जेबें भर रही है. इस रिपोर्ट के अनुसार यदि अमीर वर्ग अपनी संपत्ति पर सिर्फ 0.5 प्रतिशत की दर से अगले 10 साल के लिए अतिरिक्त टैक्स का भुगतान करें तो यह बुजुर्गों और बच्चों के लालन-पालन शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में 11.7 करोड़ नौकरियां पैदा करने के लिए आवश्यक निवेश के बराबर होगा. यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि दुनिया के विभिन्न देशों की सरकारें अमीरों और कंपनियों से बेहद कम दर से टैक्स वसूल रही हैं. आर्थिक विकास के नाम पर बड़े-बड़े पूंजीपति और कंपनियां पर्यावरण को निरंतर नुकसान पहुंचा रहे हैं तथा ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं जिनका पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. उसके बाद विभिन्न देशों की सरकारें बाद में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर नागरिकों से इकट्ठा किया गया कर-राजस्व इन्हीं कंपनियों को पर्यावरण संरक्षण के ठेके के नाम पर दे देती है.

 ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार लैंगिक असमानता भी आर्थिक निर्धारण में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है. इस रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर के 22 धनी व्यक्तियों के पास अफ्रीका महाद्वीप की सारी महिलाओं की संपत्ति से ज्यादा पूंजी है. दुनिया भर की महिलाएं मिलकर रोज 326 करोड घंटे बिना किसी पैसे के पारिवारिक देखभाल का कार्य करती हैं. एक अनुमान के मुताबिक उनके इस काम का योगदान विश्व की अर्थव्यवस्था में 19 लाख करोड रुपए का है. 

 उपरोक्त रिपोर्ट के अनुसार विश्व में बढ़ती आर्थिक असमानता पूंजीवाद के दमन चक्र को दिखाती है. कोई भी व्यवस्था तब तक चिरस्थाई नहीं हो सकती जब तक वह ज्यादातर व्यक्तियों की पक्षधर ना हो. वर्तमान समय में विश्व की आर्थिक व्यवस्था मंदी की चपेट में है. ऐसे में विश्व आर्थिक मंच में इकट्ठे हुए अर्थशास्त्रियों, नीति निर्माताओं, शीर्षस्थ उद्योगपतियों तथा राष्ट्राध्यक्षों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे भविष्य की ऐसी आर्थिक नीतियों का  निर्धारण करें ताकि विश्व में समानता का सपना केवल सपना रहे.  विश्व को यदि आपसी द्वेष, आतंकवाद, हिंसा आदि विकारों से मुक्ति पानी है तो इसके सिवाय दूसरा कोई रास्ता नहीं है.


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