राष्ट्रीय प्रतीकों की आड़ में कुटिल चाल

राष्ट्रीय प्रतीकों की आड़ में कुटिल चाल

 एक संप्रभु राष्ट्र के प्रति उसके नागरिकों के दिल में श्रद्धा प्रेम होता है. यह राष्ट्र-प्रेम के कारण ही संभव है कि देश के सामने मुसीबत के समय नागरिक हर कष्ट उठाने और अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हो जाते हैं. एक सैनिक युद्ध के मोर्चे पर अपने खून के आखिरी कतरे और आखिरी सांस तक लड़ता है. देश एक विशाल भूभाग में विस्तारित होता है. उसे एक मूर्त रूप में देखा नहीं जा सकता. इसलिए हम कुछ राष्ट्रीय महत्व के प्रतीक तय कर लेते हैं. भारत में संविधान, तिरंगा-ध्वज, राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान ऐसे ही प्रतीक है. जिनके प्रति हर नागरिक अगाध श्रद्धा रखता है. आम नागरिक इसे देश प्रेम का पैमाना भी मानता है. 

 जब से संसद द्वारानागरिकता संशोधन विधेयकपारित किया गया है. उसी समय से एक विशेष समुदाय द्वारा विरोध के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जा रहा है.  देश के कुछ चुनिंदा विश्वविद्यालयों (जामिया मिलिया इस्लामिया, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जादवपुर विश्वविद्यालय) में विरोध प्रदर्शन हुए. दिल्ली के शाहीन बाग में मुख्य सड़क को जाम कर दिया गया. इन सब विरोध प्रदर्शनों में एक बात मुख्य रूप से गौर करने वाली थी कि प्रदर्शनकारियों के हाथों में धर्म विशेष या पार्टी विशेष के झंडे नहीं होकर केवल तिरंगा ही था. कुछ प्रदर्शनकारियों ने अपने हाथों में जो बैनर ले रखे थे, उन पर भारत के संविधान का चित्र या डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के चित्र थे. कुछ पंडालों में शहीद भगत सिंह, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद और बिस्मिल के चित्र भी लगाए गए थे, लेकिन वहां इन राष्ट्रीय प्रतीकों की आड़ में देश को महजबी अलगाववाद की आग  मैं झोंकने की कोशिश की जा रही थी. केवल मीडिया के माध्यम से देश की आंखों में धूल झोंकने के लिए तिरंगे, संविधान तथा शहीदों के चित्रों का उपयोग अपने पापों को ढकने के लिए हो रहा था. 

नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में आंदोलन से हमें यह भी मालूम होता है कि एक झूठ को कितने दिनों तक डर के लबादे में रखकर एक कौम को गुमराह किया जा सकता है. हमें यह भी देखना होगा कि क्या यह डर के कारण सामूहिकीकरण था या सामूहिकीकरण से डराने की एक असफकोशिश. एक सामान्य पढ़े लिखे व्यक्ति को भी पता है कि नागरिकता संशोधन विधेयक में किसी भी भारतीय की नागरिकता छीनने का प्रावधान नहीं है. इसमें महज तीन इस्लामी देशों (पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान) में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का प्रावधान है. जब चीजें इतनी स्पष्ट है, तो इतनी अज्ञानता दिखाने और डर का माहौल बनाने के पीछे गहरी साजिश है.

 इन विरोध प्रदर्शनों के चेहरे पर राष्ट्रीय चिन्हों का नकाब लगाने की कोशिश के पीछे का कारण भी जानना जरूरी है. संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी के बाद उसकी बरसी पर कुछ विश्वविद्यालयों में देश विरोधी नारे लगे. कुछ वामपंथी छात्र नेता भी कश्मीर के अलगाववादियों के साथ खड़े नजर आए. जिससे देशभर मेंटुकड़े-टुकड़े गैंगके प्रति नफरत का माहौल बन गया. अपने आंदोलन को टुकड़े-टुकड़े गैंग से अलग दिखाने के लिए राष्ट्रीय प्रतीकों का सहारा लेना पड़ा. लेकिन इन प्रतीकों की आड में भी उनके आंदोलन का अलगाववादी चेहरा नहीं छुप सका. 

यह विरोध प्रदर्शन तार्किक रूप से केवल तीन इस्लामी देशों में प्रताड़ित हिंदुओं, सिखों,पारसियों, जैनों, बौद्ध और ईसाइयों को नागरिकता देने के विरोध में है. इसी कारण देश के बहुसंख्यक हिंदुओं की आंखों पर धर्मनिरपेक्षता की पट्टी बांधने के लिए संविधान के प्रतीक को आंदोलन में ढाल बनाया गया. दलितों को साथ में लेने के लिए डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का चित्र लगाया गया. कोई देश विरोधी कह दे, इसलिए तिरंगे का प्रयोग किसी गहरी साजिश के तहत किया गया.  दिल्ली में मीडिया आसानी से उपलब्ध है. मीडिया को खबरें चाहिए. खबरों में थोड़ी भावना का तड़का लगाना जरूरी था ताकि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की भी नजर पड़ जाए  इसलिए शाहीन बाग में महिलाओं और बच्चों को धरने में शामिल किया जाता है. 

अक्सर आंदोलन में कुछ और निकले या ना निकले, नेता जरूर निकलते है.  नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोधी आंदोलन से भी कोईइमामनिकलेगा. जो अपनी अलग राह बनाएगा या फिर किसी राजनीतिक वृक्ष पर जाकर बैठ जाएगा. आपअन्ना-आंदोलनका अंजाम याद कर सकते हैं. अन्ना हजारे  के जनलोकपाल आंदोलन के समय दिल्ली सहित सारे देश की जनता में एक विशेष चेतना की जागृति हुई थी. इस नई चेतना से जन-लोकपाल नहीं बल्कि केजरीवाल निकला था. 

 लोकतंत्र में सभी को अपनी बात कहने का हक है. लेकिन संविधान बचाने की जो बेचैनी दिखाई जा रही है. उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि संसद भी संविधान के अनुसार ही कार्य करती है. क्या किसी देश में लोकतांत्रिक प्रणाली में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार द्वारा पारित किसी कानून का हिंसक विरोध संविधान की आड़ लेकर सही कैसे हो सकता है.

जब हम महात्मा गांधी की 125वीं सालगिरह मनाने की तैयारी में है. मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा बनाने का कार्य उनके जीवन-पर्यंत आंदोलनों ने ही किया था. क्या हम भारत के लोग किसी विरोध अथवा आंदोलन का एक नीतिशास्त्र महात्मा गांधी को समर्पित  नहीं कर सकते? जिसमें किसी भी नागरिक को हाथ में तिरंगा और संविधान का चित्र लेकर भी विरोध या आंदोलन के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने हक नहीं हो. हमें राष्ट्रीय प्रतीकों की आड में कुटिल चालों को बेनकाब करना होगा.

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