लोकतंत्र में नागरिक-समाज का दायित्व

लोकतंत्र में नागरिक-समाज का दायित्व 
अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की बहुत प्रसिद्ध उक्ति है कि लोकतंत्रलोगों का, लोगों द्वारा और लोगों के लिएशासन है. अगर इस उक्ति के विस्तार में जाए तो हम केवल हर चुनाव में अपना वोट देकर अपने संवैधानिक दायित्वों की पूर्ति मान लेते हैं, चुनावों में जिस राजनीतिक पार्टी को बहुमत प्राप्त होता है, वह अगले पांच साल के कार्यकाल तक सरकार के माध्यम से देश की नीतियां तय करती है.  इसके बाद मतदाता की भूमिका निष्क्रिय हो जाती है तथा सरकार की भूमिका सक्रिय. लेकिन हमें यह देखना होगा कि एक मतदाता के रूप में हमारा दायित्व कुछ समय के लिए जरूर पूरा हो जाता है लेकिन देश के नागरिक के रूप में हमारा दायित्व हर पल हमसे सचेत रहने की अपेक्षा करता है. 

 आजादी से पहले भारत वर्ष 565 रजवाड़ों/रियासतों में बंटा हुआ था. इन रियासतों के राजा या नवाब विभिन्न धर्मों और जातियों थे. एक राष्ट्र के रूप में आम नागरिक का चिंतन नहीं था. नागरिक समाज का राष्ट्रीय-चिंतन महात्मा गांधी के देश भर में जन-जागरण के दौरान ही हुआ. उससे पहले हमारे सोचने का दायरा धर्म, जाति, क्षेत्र तक  ही सीमित था.  कभी-कभी यह  किसी एक भाषाई-क्षेत्र तक सीमित था. यह  संकीर्ण संस्कार लोकतंत्र की स्थापना तथा आजादी के बाद तक रहे. यही कारण था कि केंद्र में राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक पार्टी के सत्ता में होते हुए भी अनेक धार्मिक, भाषाई, क्षेत्रीय तथा जातियों पर आधारित  राजनीतिक दलों का वजूद सामने आया.

 इन दलों के वजूद में आने का यही कारण था कि उनकी पारंपरिक राजनीतिक अपेक्षाओं को नजरअंदाज किया गया. यह कड़वी सच्चाई है कि आज भी लोकतांत्रिक चुनाव राजनीति में क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद तथा धार्मिकता का बोलबाला है, भारतीय मतदाता अभी  इतना जागरूक नहीं हुआ है कि वह इन सब  संकीर्णताओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों के आधार पर अपना वोट दें.

 विश्व की वर्तमान परिस्थितियों में कोई भी देशएकला-चलोकी नीति नहीं अपना सकता. नीति-निर्धारण तथा भविष्य  की दिशा को तय करने में कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व व्यापार संगठन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी तथा क्षेत्रीय सहयोग संगठन वजूद में आए हैं. आज के दौर में हमें वैश्विक परिपेक्ष में सोचना पड़ता है. अंतरराष्ट्रीय मसलों जैसे आतंकवाद, जलवायु-परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय-व्यापार जैसे मसलों पर मिल-जुलकर फैसले करने पड़ते हैं.

 भारत की सरकार का यह दायित्व है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने के साथ-साथ घरेलू मोर्चे पर सबको साथ लेकर चलने का प्रयास करें. जिससे कोई भी धर्म, क्षेत्र, जाति तथा धर्म के आधार पर  खुद को उपेक्षित महसूस करें.

 भारत को विविधताओं में एकता वाले देश के रूप में जाना जाता है. भौगोलिक, जनजातीय, धार्मिक विभिन्नता यहां की सच्चाई है. लेकिन बढ़ती शैक्षिक स्तर के साथ-साथ मतदाता और नागरिक समाज का सोचने का दायरा वैश्विक होता जा रहा है. इसका असर घरेलू राजनीति पर भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है. कभी क्षेत्रीय-दल केंद्र की सत्ता का निर्धारण करते थे. लेकिन आज जाति, क्षेत्र-आधारित दलों का केंद्रीय राजनीति में हस्तक्षेप पूरी तरह खत्म तो नहीं हुआ है अपितु कम जरूर हुआ है.

 एक जागरूक नागरिक-समाज के रूप में जब हम कोई सरकार चुनते हैं तो उसके राजनीतिक विरोधी भी अपने राजनीतिक वजूद को बचाने के लिए अनेक प्रकार की दुश्वारियां  तथा षड्यंत्र करने का प्रयास करते हैं. क्षेत्रीय, जातीय-समीकरण, भाषाई-धार्मिक शक्तियां चुनी हुई सरकारों को  अस्थिर करने का प्रयास करती हैं. एक जागरूक नागरिक-समाज से ऐसे समय भी अपेक्षा की जाती है कि वह विपक्षी शक्तियों के दुष्प्रचार का मुकाबला करने के लिए चुनी हुई सरकार के साथ खड़ा दिखाई दे. केवल मूकदर्शक बने रहकर हम अपने दायित्वों की पूर्ति नहीं कर रहे होते. कई बार नागरिक-समाज का मौन रहना आपकी चुनी सरकार के कदमों को कमजोर कर सकता है.

Post a Comment

0 Comments

चीन-भारत संघर्ष के तात्कालिन कारण