किसान पर कविता


प्रश्न-चिन्ह (कविता)

वह जिसे हमने अन्नदाता कहा 
वह जो वक्त से पहले बूढा होता रहा
वह जिसका चेहरा झुर्रियों का पर्याय रहा
वह जो उगाता रहा अन्न मगर भूखा रहा

वह जो केवल विपक्ष का ही प्यारा रहा
वह जिसके कारण था बाजार, पर वह बाहरी रहा 
 जिसके लिए सरकार थी परेशान, वह अनजान रहा
वह जिसका मकान तीन पीढ़ी बाद भी अधूरा रहा

वह जिसे महाजन का ब्याज सदा सताता रहा
वह जिसके सपनों को हर वर्ष पाला मार जाता रहा
वह जिस की फसल को बिचोलिया हजम करता रहा
 जिसकी गरीबी का जिक्र हर कोई नेता करता रहा

आखिर कल रात वह टूट गया
अर्थ और व्यवस्था पर प्रश्न-चिन्ह लगा कर
वह फंदे पर झूल गया.

© दुलीचंद कालीरमन

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