भारतीय मुस्लिम अल्पसंख्यकों में अविश्वास के खतरे

भारतीय मुस्लिम अल्पसंख्यकों में अविश्वास के खतरे
भारतीय मुस्लिम अल्पसंख्यकों में अविश्वास के खतरे
यह  एक  कड़वी सच्चाई है कि भारत का बंटवारा धार्मिक आधार पर हुआ था. मुस्लिम लीग ने आजादी मिलने  से पहले ही धार्मिक आधार पर मुसलमानों के लिए एक अलग देश की मांग को अपना एक सूत्रीय एजेंडा बना लिया था. उस समय के प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस ने शुरू में तो  पाकिस्तान की मांग  से अपनी असहमति प्रकट की तथा महात्मा गांधी भी इस विचार के खिलाफ थे. लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना इसटू नेशन थ्योरीको त्यागने तथा इस मसले को आजादी के बाद सुलझाने के विचार पर सहमत नहीं थे. उस समय भी मोहम्मद अली जिन्ना का यह अविश्वास ही था कि उन्होंने मुसलमानों कोडायरेक्ट एक्शनकरने के लिए उकसाया ताकि विभाजन का मुद्दा आजादी से पहले ही तय हो जाए. जिन्ना को लगता था कि आजादी के बाद नया भारत मुसलमानों की एक अलग देश की मांग को सिरे से नकार देगा. मुस्लिम लीग द्वारा डायरेक्ट एक्शन में हिंदुओं के कत्लेआम के बाद गांधी जी को भी बेमन से इस विभाजन को स्वीकार करना पड़ा था.

आजादी के बाद तार्किक रूप से हिंदू बहुल जनसंख्या होने के कारण भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए था. लेकिन जवाहरलाल नेहरू के समाजवादी दृष्टिकोण की वजह से ऐसा संभव हो सका. इस कारण बहुत से मुसलमान भारत में ही रह गए. कांग्रेस पार्टी ने लंबे समय तक अल्पसंख्यक मुसलमान आबादी के अविश्वास को जिंदा रखा तथा तुष्टीकरण की राजनीति करती रही. इसी का परिणाम थी कि श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान की प्रस्तावना मेंधर्मनिरपेक्षशब्द जोड़ दिया. धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बहुसंख्यक हिंदुओं के अधिकारों को सीमित करने का षडयंत्र रचा गया. अल्पसंख्यकों के नाम पर मुसलमानों  को तुष्टीकरण हेतु विशेष सुविधाएं दी गई. शाहबानो मामले में यह षड्यंत्र खुलकर सामने गया. जब मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को सीमित करके वोट बैंक की चिंता ज्यादा की गई.

 भारत में मुसलमान, सिख, पारसी, यहूदी, बौद्ध, जैन तथा ईसाई धार्मिक अल्पसंख्यक रहते हैं, लेकिन असुरक्षा की भावना सबसे ज्यादा मुसलमानों में दिखाई देती है, इसका मूल कारण यह है कि भारतीय मुसलमान धर्म और संस्कृति के बीच चुनाव नहीं कर पा रहा है, धार्मिक रूप से वह अरब से प्रेरणा लेता है, जहां कट्टरपंथ का बोलबाला है जबकि वह रहता भारतीय संस्कृति में है जहां सर्व-धर्म समाज के लोग शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के साथ जीवन यापन करते हैं, मुसलमानों को बाकी सब काफिर नजर आते हैं जिन्हें उनके धर्म की हिदायतो के अनुसार जिहाद के माध्यम से हराया जाना चाहिए. 

दुनिया भर में जैसे-जैसे मुसलमानों में कट्टरता बढ़ती गई और आतंकवादी घटनाओं में मुसलमानों की संलिप्ता पाई गई. इससे दुनिया में मुसलमानों के प्रति अविश्वास भी  बढ़ा है. इसका असर भारतीय समाज पर भी पड़ा. कश्मीर में कश्मीरी पंडितों का उत्पीड़न, मुंबई बम ब्लास्ट तथा संसद पर आतंकवादी हमला जैसी घटनाओं से भारत में मुसलमानों के प्रति अविश्वास बढ़ा है.  अयोध्या में राम मंदिर को लेकर जिस प्रकार से मुसलमानों ने आखिरी वक्त तक भगवान राम के अस्तित्व को न्यायालय में चुनौती दी. उससे भी हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंची है. वर्तमान काल में भी जबहम क्या चाहते आजादी,” “भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाल्लाह-इंशाल्लाहजैसे अलगाववाद से प्रेरित नारे लगते हैं तो उससे समाज में प्रतिक्रिया स्वरूप मुसलमानों को शक की दृष्टि से देखा जाता है. उसके बाद मुसलमान भी शिकायत करते हैं कि उनकी देशभक्ति पर शक किया जा रहा है.

जबसे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार केंद्र में आई है. तभी से विपक्षी दल मुसलमानों के इसी  अविश्वास को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं. भारत की भौगोलिक एकता को मजबूत करने के लिए सरकार द्वाराअनुच्छेद-370” को समाप्त करने, मुस्लिम समाज मेंतीन तलाककी प्रथा की समाप्ति, सर्वोच्च न्यायालय द्वाराराम मंदिर का फैसलाहोने के बाद इस अविश्वास को और भी हवा दी जा रही है. 

समय के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी ने अपने अपरिपक्व नेतृत्व और तुष्टिकरण की नीतियों के कारण अपना जनाधार खो दिया. अन्य राजनीतिक दलों में देश की 18 करोड़ मुस्लिम आबादी को वोट बैंक के रूप में पाने की होड़ लगी हुई है. वामपंथ जिसका जनाधार विश्व तथा भारत में वैचारिक रूप से सिमट रहा है, वह मुसलमानों के अविश्वास की फसल काटने को आतुर है, अभी हाल ही में संसद द्वारा पास किए गएनागरिकता संशोधन विधेयकको लेकर इन संगठनों ने मुसलमानों में डर का माहौल पैदा किया. देश की राजधानी दिल्ली में वामपंथी छात्र संगठनों ने तथा कुछ राजनीतिक दलों ने मुसलमानों के अविश्वास तथा अनभिज्ञता को अराजकता में बदलने का प्रयास किया. उत्तर प्रदेश के कई अन्य शहरों में भी सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं हुई  जिनसे प्रशासन ने सख्ती सख्ती से निपटा.

यह सच है कि अल्पसंख्यकों में अविश्वास होता है, लेकिन मुसलमानों में यह विश्वास बहुत ज्यादा है, शहरों तथा कस्बों में वे एक ही इलाके या क्षेत्र में रहना पसंद करते हैं, इसके दुष्परिणाम भी सामने आते हैं जब वे उस क्षेत्र या इलाके में वे बहुसंख्यक हो जाते हैं तो अन्य अल्पसंख्यकों के सामान्य जीवन में बाधा बनकर उनका जीना मुहाल कर देते हैं. भारतीय अल्पसंख्यकों में सबसे ज्यादा अशिक्षा मुसलमानों में है. अशिक्षा से पिछड़ापन आता है. जो प्रगतिवादी नजरिए में बाधा बनता है. इस कारण वे अपने हितों को पहचान नहीं पाते तथा राजनीतिक दलों की कठपुतली बन जाते हैं.

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