हैसियत में दाम

हैसियत में दाम

रामखिलावन आज खेत से आते वक्त कटहल तोड़ लाया था. कई दिनों से नजर में था, सोचा आज रामरती से कटहल बनवा लूंगा. उसके हाथ में बड़ा स्वाद है.

 गांव के नुक्कड़ पर रिसाला, देवदत्त और गिरधर बैठे हुक्का पी रहे थे. रामखिलावन को भी ललक हुई, वहीं बैठ गया.हुक्के की घूंट के साथ-साथ प्याज के भाव पर चर्चा हो रही थी, जिसकी कीमत अब सो रुपए किलो के पार चली गई थी रामखिलावन याद करने लगा, अभी दो-तीन महीने पहले ही तो उसकी एक बीघा प्याज का कोई खरीददार नहीं मिल रहा था. थक हार कर कौड़ियों के दाम बेचनी पड़ी थी और अब दाम सो…...|

 उसका मन उदास सा हो गया.  हुक्के का स्वाद भी अच्छा नहीं लगा.  उठकर घर की राह ली.

 रामरती पशुओं की सानी करके अभी निपटी ही थी.  सामने से आते रामखिलावन का चेहरा उतरा सा देखकर कारण जानना चाहा. रामखिलावन ने एक भद्दी सी गाली प्याज, बिचौलियों और सरकार को देकर रामरती को प्याज के दाम के बारे में बता दिया था.

 “वह तो अच्छा हुआ मैंने दो धड़ी प्याज घर पर रख लिया था, नहीं तो इस दाम पर कैसे खरीदते. शुक्र है अभी तीन-चार सेर रखा है”  रामरती के स्वर में थोड़ी तसल्ली थी.  

इसे अभी क्यों तोड़ लाए, इसमें प्याज बहुत लगता हैरामरती कटहल देखकर बोली.

अभी दो-चार सेर तो है घर पररामखिलावन ने याद दिलाया.

 “रखे तो है पर इतने महंगे प्याज खाने को मन नहीं मानता. दाम थोड़ा हैसियत में जाएंगे तब कटहल भी बना दूंगी”  कहते- कहते रामरती का चेहरा भी उतर गया था.


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