'अभिव्यक्ति और माध्यम' के प्रायोगिक आयाम

अभिव्यक्ति और माध्यम के प्रायोगिक आयाम
अभिव्यक्ति और माध्यम के प्रायोगिक आयाम
कक्षा ग्यारहवीं एवं बारहवीं  के हिंदी पाठ्यक्रम के अंतर्गत शैक्षणिक सामग्री कोआरोह’,’ वितान’, ‘व्याकरणतथाअभिव्यक्ति और माध्यमआदि खंडों में विभाजित किया गया है.  ‘आरोहऔरवितानमें विद्यार्थियों को साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कविता, कहानी, संस्मरण, यात्रा-वृतांत, उपन्यास-अंश, नाटक, एकांकी, जीवनी, आत्मकथा तथा रेखाचित्र इत्यादि की जानकारी दी जाती है. इसमें विद्यार्थी विभिन्न प्रसिद्ध कवियों और लेखकों की रचनाएं पढ़कर हिंदी साहित्य का रसास्वादन करते हैं. पाठ्यक्रम काअभिव्यक्ति और माध्यमऐसा खंड है जिसमें विद्यार्थियों को विभिन्न माध्यमों के लिए लेखन’, पत्रकारिता लेखन’, नए और अप्रत्याशित विषयों पर लेखन’, कैसे बनती है कविता’, नाटक लिखने का व्याकरण’ और कैसे लिखे कहानी’ आदि अध्यायों के माध्यम से विद्यार्थियों में रचनात्मक लेखन के बीज बोने का प्रयास किया जाता है.

एक दिन कक्षा-कक्ष में अध्यापन के दौरान एक विद्यार्थी ने पूछा कि इस कवि के जीवन-परिचय में जन्मतिथि तो लिखी है परंतु मृत्यु की तिथि नहीं लिखी. मैंने उसको बताया कि यह कवि सौभाग्य से अभी भी जिंदा है. जरूरी नहीं कि सभी के कवि-परिचय में उसके मृत्यु की तारीख भी लिखी हो. आप जैसे विद्यार्थी भी काव्य रचना कर सकते हैं आप  में से ही भविष्य के साहित्यकार होंगे. उस दिन विद्यार्थियों ने इस संभावना को गंभीरता से नहीं लिया. 

फिर एक दिन जब मैंअभिव्यक्ति और माध्यमके अंतर्गतकैसे बनती है कविताअध्याय को पढ़ा रहा था तो मैंने विद्यार्थियों को स्वयं कविता रचना के लिए फिर प्रेरित किया. मैंने कहा आप सभी के अंदर एक कवि विद्यमान हैं. आप भी कविता रचना कर सकते हैं. शुरू में विद्यार्थियों ने इसे हल्के में लिया लेकिन अध्याय को पूरे मनोयोग से पढ़ाने के बाद मैंने विद्यार्थियों को कहा कि भोजनावकाश के दौरान जब वह कक्षा-कक्ष से बाहर जाएं तो खेल प्रांगण में चारों तरफ पेड़-पौधों, फूलों और पक्षियों का  गहराई से अवलोकन करें तथा उन पर कुछ लिखने का प्रयास करें. कविता बन रही है या नहीं इसकी चिंता मत करना.

 उस दिन विद्यालय की छुट्टी के बाद  उस कक्षा के सभी बच्चे कक्षा-कक्ष में ही बैठे रहे.  मैं अन्य कक्षा में पढ़ा रहा था . बच्चे मुझे अपने कक्षा-कक्ष में बुलाकर ले गए. सभी की रचना मुझे दिखाने के लिए उत्साहित थे.मैंने सभी रचनाओं  को ध्यान से पढ़ा तो मैं आश्चर्यचकित था. क्योंकि बच्चों से इतनी अच्छी रचनाओं की अपेक्षा मैंने भी नहीं की थी.

 अगले दिन रविवार था. मैंने बच्चों को सूर्योदय सूर्यास्त को ध्यान से देखने तथा प्रकृति में हो रहे बदलावों को निहारते हुए कविता रचना के लिए प्रेरित किया. कक्षा के कई विद्यार्थी इस विषय पर भी काव्य-रचना करके लाए. अगले दो-तीन दिन मैंने उनकी रचनाओं पर अपने सुझाव मार्गदर्शन दिया. कुछ विद्यार्थियों ने स्वयं भी अपनी रचनाओं में काट-छांट की. कक्षा-कक्ष में ही चयनित विद्यार्थियों ने अपने सहपाठियों के समक्ष  कविता-वाचन का अभ्यास किया.

 आगामी शनिवार को प्रार्थना-सभा के दौरान सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों के सामने उन विद्यार्थियों ने मंच से अपनी काव्य-प्रस्तुति दी तो उनका आत्मविश्वास चरम सीमा पर था. प्रधानाचार्य महोदय ने डायरी एवं पेन देकर उन विद्यार्थियों को सम्मानित किया. बाकी बच्चों में भी इससे रचनात्मक लेखन में रुचि का निर्माण हुआ. इसी का परिणाम है कि जब भी कालांश समाप्त होने पर मैं एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जाता हूं तो विद्यार्थी अपनी रचना को लेकर कई  बार बरामदे में ही में ही मुझे रचना पढ़ने को विवश कर देते हैं. मुझे भी लगता है एक दिन ये लघु-पुष्प साहित्य-संसार में अपनी खुशबू बिखेरेगे.

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