इस्लामी सांप्रदायिकता का वामपंथी नकाब

इस्लामी सांप्रदायिकता का वामपंथी नकाब

अभी हाल ही में भारतीय संसद द्वारानागरिकता संशोधन विधेयकके कानून बन जाने के बाद देश भर में इसके विरोध में कई हिंसक प्रदर्शन हुए. इन विरोध प्रदर्शनों के  तीन पहलू हैं. पहला पहलू तो उत्तर पूर्वी राज्यों के निवासियों का था, जिन्हें यह डर था कि इस विधेयक के लागू हो जाने के बाद बांग्लादेश से आए बंगाली भाषी हिंदू यहां की सांस्कृतिक विरासत, भाषा संसाधनों में असंतुलन पैदा कर सकते हैं. लेकिन प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के आश्वासन के बाद उन्होंने अपना आंदोलन वापस ले लिया.

 आंदोलन का दूसरा पहलू विपक्षी दलों द्वारा प्रायोजित था जिसे विपक्ष अपना राजनीतिक कर्मकांड समझता है. जबकि सोशल मीडिया पर वे सभी वक्तव्य उपलब्ध हैं, जिसमें कांग्रेस पार्टी अन्य विपक्षी दलों के वरिष्ठ नेताओं ने पाकिस्तान. बांग्लादेश अफ़गानिस्तान से आए हिंदुओं सिखों को नागरिकता देने संबंधी दलीलें दी थी.

 विरोध का सबसे महत्वपूर्ण चिंता पैदा करने वाला पहलू इस्लामी तथा वामपंथी गठजोड़ का था. जिसकी शुरुआत  दिल्ली के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, लखनऊ के नवादा विश्वविद्यालय से हुई. इसमें गौर करने की बात यह थी कि आंदोलन घोर सांप्रदायिक होते हुए भी इसमें संविधान और तिरंगे को प्रमुखता से दर्शाया गया. यह वामपंथी छात्र संगठनों तथा कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा के बीच गठजोड़ का ताजा उदाहरण था. जिसमें  तिरंगे जैसे राष्ट्रीय चिन्ह का उपयोग करके सांप्रदायिकता को वामपंथ के सेकुलर नकाब में ढकने की नाकाम कोशिश की गई थी.


Devpath,in 


 इस बीच एक दूसरी घटना केरल केकन्नूर विश्वविद्यालयमें आयोजितइतिहास-कांग्रेसके कार्यक्रम में हुई. वहां पर भी यही इस्लामी सांप्रदायिकता को वामपंथी नकाब में पेश किया गया. विश्वविद्यालय के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में केरल के राज्यपाल महामहिम आरिफ मोहम्मद खान द्वारा उद्घाटन सत्र में बिना किसी इजाजत तय कार्यक्रम के वामपंथी इतिहासकार इरफान हबीब द्वारा राजनीतिक भाषण देकरनागरिकता संशोधन अधिनियम”  का विरोध किया गया. लेकिन जब राज्यपाल श्रीआरिफ मोहम्मद खान ने अपना पक्ष रखना चाहा तो इरफान हबीब मंच पर चढ़कर टोका टाकी करने लगे. वहां पर भी वामपंथ की आड़ में इरफान हबीब अपना इस्लामी सांप्रदायिक कार्ड खेल रहे थे.

 सैद्धांतिक रूप से कार्ल मार्क्स के चेले वामपंथी नास्तिक होते हैं. जबकि इस्लाम धार्मिक कट्टरता में विश्वास करता हैं इसलिए  वामपंथ और इस्लामिक कट्टरवाद का कोई भी जोड़ तार्किक नहीं है. लेकिन एक कहावत है किदुश्मन का दुश्मन दोस्तहोता है. भारत में बढ़ती राष्ट्रवादी ताकतों को यह दोनों की विचारधारा सहन नहीं कर पा रही है. वामपंथियों के लिए यहबुजुर्वा-राष्ट्रवादका उदय है तो कट्टर इस्लामिक तत्वों को यहहिंदू-राष्ट्रवादका उदय लगता है.

 भारत में एक विचारधारा के रूप में वामपंथ सिकुड़ कर केवल केरल कुछ विश्वविद्यालयों तक सीमित रह गया है. उसकी ताकत निरंतर कमजोर होती जा रही है. पहले उसने जाति-प्रथा,अंबेडकरवाद शोषण का ढिंढोरा पीटकर अनुसूचित जाति जनजातियों को हिंदू समाज से अलग करने की कुचेष्टा की. लेकिन उसमें वामपंथ को आंशिक सफलता ही प्राप्त हुई. केवलभीम-सेनाके नाम परचंद्रशेखर रावणजैसे कुछ गुर्गे ही उनकी कठपुतली बन सके. अब वामपंथियों की नजर 18 करोड़ मुसलमानों पर है जिन्हें मोदी सरकार तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम पर डरा कर वामपंथी अपना उल्लू सीधा करना चाह रहे हैं.

जब से पश्चिम एशिया में वहाबी विचारधारा का प्रभाव बढ़ा है. तब से विश्व के मुसलमानों में धार्मिक कट्टरता बढ़ती जा रही है. भारत का मुसलमान भी इससे अछूता नहीं रहा है. दक्षिण भारत से कई युवकों के इस्लामिक स्टेट के आतंकी संगठन में शामिल होने के कई उदाहरण हमारे सामने हैं. इस वामपंथी-इस्लामी गठजोड़ की सुविधा यह होती है कि जब तीन तलाक जैसा मुद्दा आता है तो  वे सरिया और हदीस  कोआगे सरका देते हैं. लेकिन जब बात नागरिकता संशोधन विधेयक तथा राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर की बात आती है, तो संविधान तथा धर्मनिरपेक्षता की दुहाई  देने लगते है. इरफान हबीब और जावेद अख्तर जैसे कई व्यक्ति वामपंथ की आड़ में अपना इस्लामी एजेंडा भी आगे बढ़ाते हैं और सेकुलर भी बने रहते हैं.

 कांग्रेस पार्टी भी शुरू से ही मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए बहुसंख्यक हिंदू-हितों की उपेक्षा करती आई है. यह विचारधारा वामपंथ को भी सुविधाजनक लगती है. यह वैचारिक गठबंधन बहुत पुराना है. इसलिए आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू ने वामपंथियों को शैक्षिक तथा संस्थागत समर्थन दिया. शिक्षण संस्थानों और इतिहास के नाम पर रिसर्च के लिए केवल उन्हीं पर योजनाओं को मान्यता दी जाती थी. जो वामपंथी विचारधारा के नाम पर धर्मनिरपेक्षता को पोषित करते थे.  रामसेतु तथा सरस्वती नदी जैसी भारतीय जनमानस से जुड़ी परियोजनाओं को नकार दिया जाता था.

 धर्मनिरपेक्षता की आड़ में नेहरू द्वारा हिंदू-हितों की अनदेखी की गई. आजादी के बाद जब सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया तो तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद उसका उद्घाटन करना चाहते थे. लेकिन  जवाहरलाल नेहरू ने  धर्मनिरपेक्षता के नाम पर उन्हें उद्घाटन समारोह में जाने से रोकने की कोशिश की थी.  20 सितंबर 1953 को जवाहरलाल नेहरू ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा था कि वे सेना तथा अन्य सिविल सेवाओं की नौकरियों में मुसलमानों की संख्या बढ़ाई जाए, इससे संप्रदायिक ताकते कमजोर होंगी. यहां यह समझना कठिन नहीं है कि उनकी नजरों में सांप्रदायिक ताकते कौन थी.

 इसी प्रकार 05 दिसंबर 1954 को कांग्रेस पार्टी के सदस्यों को लिखे पत्र में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि अगर अल्पसंख्यक संगठित होते हैं, तो उनकी समस्या सुलझाने के हजारों रास्ते हैं. लेकिन अगर बहुसंख्यक समुदाय धार्मिक आधार पर संगठित हो गया तो उसके खतरे बहुत ज्यादा हैं. कांग्रेस पार्टी को भी लगता है कि कथित धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई में कम्युनिस्टों को साथ लेना जरूरी है. इसका ताजा उदाहरण है कि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधीटुकड़े-टुकड़े गैंगको समर्थन देने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पहुंच गए थे.

 कांग्रेस, वामपंथी और कट्टर इस्लामिक संगठन मिलकर बहुसंख्यक राष्ट्रवादी ताकतों के खिलाफ धार्मिक सांप्रदायिकता की लड़ाई लड़ रहे हैं. यह अलग बात है कि उन्होंने वामपंथ धर्मनिरपेक्षता का नकाब पहना हुआ है. 





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