गिद्ध दृष्टि (लघुकथा)


इस बार बाढ़ सही समय पर आई थी, नहीं तो पिछले साल कई साल सूखे में कटे थे | यमुना नदी में पत्थरों की रोक लगाने का टेंडर जिसको दिया जाता  था वहीं बाद में कमीशन के नाम पर हाथ हिला जाता था |

पत्थरों की रोक बाढ़ के अभाव में जस की तस खड़ी रहती थी | क्वालिटी में उन्नीस-बीस की इंक्वायरी अलग से, अब ऐसे मौसम में कमीशन मिले भी तो कैसे ?

 बाढ़ के पानी को पंपों से निकालने का प्रबंध सरकार ने चाक-चौबंद किया था | लेकिन बाढ़ के बिना उन्हें चलाने  का मौका ही नहीं मिला | डीजल के बिल बने नहीं, तो हिस्सा कैसा ? स्टॉक में जितनी भी तिरपालें थी, उन सब का स्टॉक साल में कई बार चेक हुआ | अब इधर उधर करें भी तो कैसे ?

पर अब की बार भगवान की कृपा है | बाढ़ आई है और समय पर आई है | पत्थरों की रोक बह चुकी है | डीजल पंपसेट दिन रात चल रहे हैं | तिरपालें बांटी जा रही हैं | नई खरीददारी के ऑर्डर भी जारी हो चुके हैं |

बाढ़ राहत विभाग के क्लर्क की आखों में चमक थी |  शायद इस बार पत्नी के कंगन बन ही जाएं | इस बार बाढ़ समय पर जो आई है |

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