जैविक खेती और किसान का भविष्य

जैविक खेती और किसान का भविष्य
जैविक खेती और किसान का भविष्य 

हम सभी ने बचपन में एक कहानी सुनी होगी। सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की कहानी। लालच में जिसे उसके मालिक ने ही मार दिया था। हरित क्रांति के कारण भी यही सब हुआ था। अधिक से अधिक उत्पादन के लिए हमने अपनी जमीन को उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से जहरीला बना दिया।

आज ज्यादा से ज्यादा उर्वरक डालना किसान की मजबूरी बन गई है। क्योंकि जमीन की उर्वरा शक्ति खत्म हो चुकी है। हम उर्वरकों के बल पर उससे उपज लेनें की कोशिश कर रहे है। यह कुछ-कुछ इंजैक्सन लगाकर भैस का दुध निकालने के समान है। हरित क्रांति का दुसरा दुष्प्रभाव भूमिगत जल के स्तर के खतरनाक तरीके से खिसकने के रूप में आया है। धान की अत्यधिक रौपाई से भूमिगत जल का अत्यधिक खिचाव हुआ है। अगर इसी प्रकार हम भूमिगत जल का दोहन करते रहे तो अगले 15-20 साल में खतरनाक स्थिति बन सकती है।

उर्वरक, बीज, दवाई आदि इतने महॅगे होते चले गए कि हमारी कृषि का लागत मूल्य बढता चला गया। खेती को उद्योग का दर्जा तो मिला नही जिससे हम अपनी फसल का बाजार मूल्य तय कर सके। सरकार की नीतियों और जनता के आय के स्तर को देखकर न्यूनतम सर्मयन मूल्य को तय किया जाता है कि किसान के लागत मूल्य को और उसकी आर्थिक दशा को।

किसान कोई संत महात्मा नही है उसका भी परिवार है। उसको भी अपने बच्चे अच्छे विद्यालय में पढाने है। उनकी शादियां करनी है। वस्त्र, वाहन और संचार के साधन उपलब्ध कराने है। जिसके कारण खेती की आमदनी पर्याप्त नही रह गई है। फलस्वरूप किसान कर्ज के बोझ दबता चला जा रहा है।

पिछले तीस-चालीस वर्ष पहले किसान या जमींदार शब्द सुनकर एक खुशहाल दृश्य ऑखों के सामने होता है। लेकिन आज दीन-हीन आकाश की तरफ निहारता झुर्रियों वाला चेहरा में जेहन में आता है। इस दृश्य को बदलने की जरूरत है। दुनिया में 21वीं सदी के इतिहास में नजर डालें तो पता चलता है कि दुनियां में कृषि अनुसंधान के  प्रकाशित अधिकतर वैज्ञानिक लेख रासायनिक (कैमिकल) आधारित ही रहे हैं।  हाल ही में 2-3 दशकों से इनमें जेनिटिक इंजीनियरिंग (जीएम) का भी समावेश हो गया।  जिससे किसान जैविक खेती और प्राकृतिक कृषि को नजरअंदाज करते गए।  उदाहरण के लिय इंगलैड ने एक र्सवें के अनुसार पाया गया की सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त 26 अनुसन्धान के प्रोजेक्ट जी एम् फसलो पर आधारित थे जबकि जैविक खेती पर केवल एक।

किसान को जैविक खेती एक बेहतर भविष्य दे सकती है हरित क्रांति और जी.एम. बीजों के कारण जहॉ हमारे देशी बीज की किस्में लुप्त होती जा रही है। वही जींद क्षेत्र के किसानों ने मित्र कीटों को पहचानकर उनका सरंक्षण करके पेस्टीसाईड का कम से कम प्रयोग करने के बाद अच्छी फसल ले रहे है।

सन 1980 में संसार मे कृषक ओर उपभोक्ता समुहो ने रासायनिक कृषि के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभावों को मध्य नजर रखते हुए अपनी सरकारो पर जैविक खेती के नियम कायदें बनाने के लिस दबाव डालना शुरू किया। जिसके कारण सन 1990 तक जैविक उत्पादो को प्रमाणित करने के लिय कानून बनने लगे। विकसित देशों मे इन उत्पादो के लिय बाजार भी उपलब्ध हुए। इन देशो मे आज जैविक खादय प्रर्दाथों के उपभोक्ता सालाना 20 प्रतिशत की दर से बढ़ रहे है।

जैविक खेती को अगर दोबारा से खडा करना है तो सरकारी प्रयासों के साथ साथ किसानों को भी इस दिशा में प्रशिक्षण लेकर सहकारिता के माडल पर आगे बढने की जरूरत है। 80 प्रतिशत किसान छोटी खेती वाले किसान है। समावेशी विकास की अवधारणा को सहकारिता के माध्यम से सरकार द्वारा प्रशिक्षण देने, वाहन बाजार उपलब्ध कराने आदि सेवाओं के माध्यम से जैविक क्रांति को आगे ले जाया सकता है। इसके अलावा खाद्य प्रंससकरण संबन्धी उद्योग भी ग्रामीण इलाको में ही स्थापित किए जाने चाहिए। ताकि ग्रामीण आबादी को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जा सके।

खाद्य सुरक्षा के नाम पर हरित क्रांति के दौरान विभिन्न उत्पादों को उपजाने की बजाय सिर्फ गेंहू तथा धान तक ही सीमित होकर रह जाये। देश खाद्य के मामले आत्मनिर्भर तो हुआ लेकिन भूमिगत जलस्तर पाताल में पहुँच गया। मोनोब्लाक पम्प से हम सब्मर्सीबल तक पहुँच चुके है।

जी.एम. फसलों के प़क्ष में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के द्वारा लाबिंग की जा रही है । उसी के फलस्वरूप देश के कई बडे हिस्से में जी.एम. फसलों की खेती की जाने लगी है । दावे किये जा रहे थे कि इससे किसी प्रकार के हानिकारक कीटो का दुष्प्रभाव नही पडेगा। अभी पिछले दिनों कपास की इसी बी.टी.कॉटन की फसल में सफेद मक्खी के कारण किसानों को करोडो रूपये का नुकसान हो गया था। अभी कुछ दिन पहले भी बी.टी. बेंगन की फसल हरियाणा के फतेहाबाद जिले में उगाई गई थी जिसकी मान्यता अभी तक भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने नहीं दी है | ये कंपनियां पैसे के दम पर ऐसे गैर-कानूनी कार्य भी करती है | अभी तक मनुष्यों पर ऐसी फसलों के प्रभावों का आकलन भी नहीं हुआ है |

सवाल इस बात का है कि अगर इसी तरीके से खेती होती रहेगी तो क्या यही सतत् विकास कायम रह पायेगा ? क्या हम अपनी आने वाली पीढियों के लिए एक बडा रेगिस्तान छोडकर जाने की तैयारी कर रहे है ?

हमें भविष्य में आने वाली पीढियों को ध्यान में रखकर ऐसे खेती के माडल विकास माडल को अपनाना चाहिए जिसमें सतत् विकास सुनिश्चित हो सके। जिसका रास्ता जैविक खेती की पगडंडी से जाता है।
                                                                               
                                                                                                                                                                          

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