आखिर अमेरिका चाहता क्या है ?



 
आखिर अमेरिका चाहता क्या है ?
आखिर अमेरिका चाहता क्या है?

आखिर अमेरिका चाहता क्या है ?


 प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में विदेश नीति के मोर्चे पर एक कठिन परीक्षा की घड़ी खड़ी हुई है । जब से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में आए हैं तब से विश्व व्यवस्था में उठापटक का दौर चल रहा है। अभी तक चली रही इस व्यवस्था  में ट्रंप हर प्रकार से अमेरिका के हित में नवीनीकरण चाहते हैं ।

 डोनाल्ड ट्रंप चूँकि व्यापारिक पृष्ठभूमि से आते हैं इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हर रिश्ते को वे मौद्रिक तराजू में तोलते हैं | विश्व में जितनी भी संधियाँ डोनाल्ड ट्रंप के पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों ने की थी | उन सब की समीक्षा समय-समय पर ट्रंप कर चुके हैं । चाहे वह नाटो के साथ अमेरिका के रक्षा संबंधों का पुनर्मूल्यांकन हो, कनाडा और मैक्सिको के साथ आयात कर का मामला हो, ईरान के साथ परमाणु समझौता तोड़ना हो, पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका का पलायन हो या फिर चीन के साथ व्यापार युद्ध की शुरुआत आदि कुछ इसके उदाहरण हैं

प्रधानमंत्री मोदी के प्रथम कार्यकाल में अमेरिका के साथ ज्यादातर समय गर्मजोशी भरा रहा है लेकिन पिछले कुछ दिनों में ऐसी घटनाएं घटी हैं जिससे एक दूसरे के प्रति अविश्वास का नजरिया बढ़ता जा रहा है अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं | उनके कारण भारत को ईरान से अपना कच्चा तेल का आयात बंद करना पड़ा है | इसके अलावा ट्रंप प्रशासन ने पिछले कई दशकों से भारत को दी जा रही आयात में वरियता की सुविधा भी वापस ले ली है | इन मामलों में भारत ने सधी हुई प्रतिक्रिया दी है तथा कच्चे कच्चे तेल का अतिरिक्त आयात अरब के कई अन्य देशों से करके ईरान से होने वाले आयात की भरपाई कर ली है | यह अलग बात है कि ईरान भारत को जो कई प्रकार की रियायत तेल आयात के मामले में देता था | भारत अब उन से वंचित हो चुका है | वाणिज्य मंत्री पियुष गोयल ने भी  आयात में वरियता की सुविधा के मामले में कहा है कि भारत अब एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है तथा अमेरिका द्वारा इस के वापस लिए जाने से भारत के व्यापार पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ेगा |

 रूस को लेकर भी अमेरिका के मतभेद जगजाहिर हैं शीत युद्ध के दिनों में भारत अपना अपनी ज्यादातर युद्ध सामग्री और हथियार रूस से ही खरीदता था लेकिन समय के साथ साथ भारत ने रक्षा उपकरणों की खरीद कई अन्य देशों से भी की जिनमें अमेरिका भी एक महत्वपूर्ण सप्लायर रहा है | हाल ही में भारत द्वारा रूस से S-400 सुरक्षा प्रणाली खरीदी की प्रक्रिया चल रही है | मोदी सरकार का यह फैसला ट्रंप प्रशासन को नागवार गुजरा है और अमेरिका इस सौदे में टांग अडाने की कोशिश कर रहा है |

 वर्तमान में विश्व में अमेरिका को चुनौती देने वाली अर्थव्यवस्था चीन की हो चुकी है और अमेरिका इस चुनौती से व्यापार युद्ध के माध्यम से निपटना चाह रहा है | दक्षिण एशिया के क्षेत्र में चीन को साधने का प्रयास भारत के सहयोग के बिना संभव नहीं लगता इसलिए अमेरिका भारत को अपने पक्ष में करने का कोई भी प्रयास गवाना नहीं चाहता | लेकिन वर्तमान मोदी सरकार के कार्यकाल में यह भी संभव है कि हम आंख बंद कर अमेरिका की हाथों इस्तेमाल होते रहे | अमेरिका भारत की तुलना पाकिस्तान से करके यह गलती कर रहा है | जिस प्रकार पाकिस्तान को अमेरिका सोवियत संघ के जमाने में अफगानिस्तान की धरती पर सोवियत सेनाओं के खिलाफ कर रहा था | उसी प्रकार वह भारत की नीतियों को प्रभावित नहीं कर सकता है |

 अमेरिका बार-बार भारत के साथ होने वाले  व्यापार घाटे का प्रश्न उठाता है |भारती य राजनयिकों द्वारा यह कई बार स्पष्ट किया जा चुका है कि इस व्यापार घाटे को कम करने के लिए भारत अमेरिका से हथियारों की खरीद भविष्य में कर सकता है | पिछले दिनों भारत ने अमेरिका से मानवरहित ड्रोन भी खरीदने खरीदे हैं | इसके अलावा अमेरिकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन ने F-35 विमानों के निर्माण के लिए भारत में ही संयंत्र लगाने की सहमति प्रदान कर दी है |लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा सार्वजनिक रूप से भारत के विरोध में वक्तव्य जारी किया जाना एक वैश्विक शक्ति के प्रमुख को शोभा नहीं देता |


 आज का भारत विश्व की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था है | सैन्य स्तर पर भी उसकी अपनी पहचान है तथा कूटनीतिक मोर्चे पर भी मोदी सरकार अच्छा प्रदर्शन कर रही है | आज का भारत किसी भी विकसित देश का पिछलग्गू नहीं बन सकता और यह बात  अमेरिका को जितनी जल्दी समझ में जाए उतना ही अच्छा रहेगा |

वर्तमान समय चीन और अमेरिका जैसी महा शक्तियों के आर्थिक युद्ध का युग है | भारत को अपने राष्ट्रीय हितों का ध्यान रखते हुए विदेश नीति के संदर्भ में फूंक-फूंक कर कदम रखने की जरूरत है | अमेरिका का राष्ट्रपति अपने अस्थाई व्यवहार के लिए जाना जाता है तथा हमारे पड़ोस में चीन भी एक महाशक्ति बनकर उभर रहा है | जिससे हम इंकार नहीं कर सकते और ना ही उसे नजरअंदाज कर सकते हैं |

 वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिपेक्ष में यही भारत के हित में होगा कि वह किसी एक महाशक्ति का  पिछलग्गू बनकर नहीं अपितु अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लें | क्योंकि वर्तमान व्यवस्था किसी एक शक्तिशाली देश के नियंत्रण में होना विश्व के हित में भी नहीं है | अगर हमें अपनी सुरक्षा के लिए कोई रक्षा प्रणाली रूस से खरीदनी है तो उस पर अमेरिका द्वारा दबाव डालना अनैतिक होगा | आज का युद्ध परस्पर निर्भरता का युग है तथा विश्व व्यापार व्यवस्था भी एक दूसरे देश के ऊपर निर्भर है | ऐसे में भारतीय कुशल कामगारों के वीजा संबंधी प्रावधानों में अड़चन खड़ी करना स्वयं अमेरिका के भी हित में नहीं होगा |

वर्ष 2018 में अमेरिका ने भारत के स्टील और अल्मुनियम के उत्पादों के आयात पर कस्टम ड्यूटी बढ़ा दी थी | जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप भारत में भी पिछले जून माह में अमेरिकी समान पर ड्यूटी बढ़ाने का फैसला किया था |  लेकिन कुछ कारणवश इसे लगातार सात बार टालना पड़ा | आखिरकार 16 जून 2019 को भारत ने अमेरिका से आयात होने वाले 28 उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी बढ़ा दी है | इन सामानों में मुख्यतः बादाम अखरोट और दालें शामिल है | जिससे भारत सरकार को प्रतिवर्ष ₹1515 करोड़ का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होगा |

 सन 2019 का भारत इतना कमजोर नहीं है कि अमेरिका द्वारा कुछ व्यापारिक प्रावधानों को हटा लेने से उसके उत्पादों पर अतिरिक्त कर लगने से या उसकी रक्षा जरूरतों को पूरा करने में किसी दूसरे देश की सहायता ना लेने का दबाव सहन कर सकता है | इसलिए यह निर्णय अमेरिका को लेना है कि वह भारत को दक्षिण एशिया में अपने सामरिक साझेदार के रूप में साथ में लेना चाहता है या फिर व्यापारिक प्रतिद्वंदी के रूप में ? यह निर्णय अमेरिका को लेना है कि आखिर वह चाहता क्या है ?


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 विश्व के लिए खतरा है चीन