चीनी प्रोजेक्ट वन-बेल्ट-वन-रोड और भारत

चीनी प्रोजेक्ट वन-बेल्ट-वन-रोड और भारत 

चीन की राजधानी पेइचिंग में 14-15 मई 2017 के दो दिवसीय ‘‘वन बेल्ट-वन रोड़’’ सम्मेलन में 29 देशों  के शासन प्रमुखों ने शिरकत की। भारत के लगभग सारे पड़ोसी देशों  जैसे पाकिस्तान, श्रीलंका, बंगला देश , मंयमार, नेपाल और अफगानिस्तान ने चीन के साथ अधोसंरचना संबंधी करीब 20 समझौतों पर हस्ताक्षर किए। भारत ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का विरोध करते हुए इस सम्मेलन का बहिष्कार किया। भारत का मत बिल्कुल स्पष्ट है कि चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा चूंकि पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है, जो भारत का अभिन्न अंग है। भारत किसी भी कीमत पर अपनी भौगोलिक सीमाओं के साथ समझौता नही कर सकता। यह बहिष्कार चीन को यह साबित करने के लिए काफी है।

          भारत अकेली ऐसी बड़ी अर्थव्यवस्था है जिसने ‘‘वन बेल्ट-वन रोड़’’ प्रयासों में भाग नही लिया, लेकिन हम इतने भी अकेले नही है। इस परियोजना को लेकर यूरोपियन युनियन को भी पर्यावरण के मुद्दों पर कुछ संदेह है। अमेरिका ने भी इस सम्मेलन में निम्न स्तरीय प्रतिनिधि  मंडल भेजकर महज खानापूर्ति की थी। अमेरिका का इस सम्मेलन में उपस्थित रहना उसकी मजबूरी थी क्योंकि उत्त्तर कोरिया को लेकर जिस तरह की परिस्थितियां निर्माण हुई है ऐसी हालत में अमेरिका चीन को नाराज नहीं  कर सकता था।

          अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का अभी तक का कार्यकाल भारत की दृष्टि से निरा करने वाला रहा है। शपथ ग्रहण करते ही ‘‘वन चाईना पॉलिसी’’ का समर्थन करना निश्चय ही आश्चर्य जनक यू-टर्न था। लेकिन अमेरिका ज्यादा देर तक दक्षिण एशिया में भारत को नजर अंदाज नही कर सकता। इसका उदाहरण है कि अमेरिका ने 2011 से ठंडे बस्ते मे पडीन्यू सिल्क रोड़औरइंडो-पैसिफिक इकानोमिक कारिडोरपरियोजना को हरी झंडी दे दी तथा इन परियोजनाओं में भारत प्रमुख सांझीदार होगा। इसके द्वारा भारत की कजाक्स्तिान, तुर्केमिनिस्तान के गैस क्षे़त्र तक पंहुच हो जाएगी। जिससे वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरी कर पाएगा और अफगानिस्तान के पूननिर्माण मे अहम भूमिका अदा कर सकता है। इसके माध्यम से चीन को भी प्रतिस्पर्धा दी जा सकती है।

          रूस के राष्ट्रपति पुनित  भी ‘‘वन बेल्ट-वन रोड़’’ सम्मेलन में उपस्थित रहे। पिछले काफी दिनों से रूस की आर्थिक हालात कमजोर बनी हुई है। भारत का प्राचीन सहयोगी होने के कारण भारत कई परियोजनाओं पर रूस के साथ सुंयुक्त रूप से कार्य कर रहा है। तमिलनाडू का कुडाकुलम परमाणु ऊर्जा संयत्र इसका उदाहरण है। प्रधानमंत्री मोदी की रूस यात्रा के दौरान कुंडाकुलम परमाणु संयंत्र दो इकाइयों संबंधी समझौता हो गया। इस समझौते से पहले जो संशय की छाया इस समझौते पर पड़ी थी वह परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत की सदस्यता की राह में रोड़ा अटकाने की चीन की प्रवृति तथा रूस के मूकदर्शक बने रहने की चेष्टा के प्रति नाराजगी थी। क्योंकि रूस की पाकिस्तान और चीन की नजदीकी बढ़ रही है। पाकिस्तान से रूस सामारिक समझौते संयुक्त युद्धाभ्यास कर रहा है।

चीन भारत की परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की सदस्यता की हर कोशिश  को विफल कर रहा है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की सदस्यता नही मिलने पर अपना स्वदेशी परमाणू ऊर्जा कार्यक्रम चलाने के अलावा और कोई विकल्प नही रह जाएगा। यह कदम अप्रत्यक्ष रूप से रूस को चीन पर दबाव डालने के लिए प्रेरित करेगा। ताकि वह (एनएसजी) के मुद्दे पर भारत की राह का रोड़ा ना बने। क्योंकि आर्थिक संकटों से घिरे रूस को भारत के साथ कुडाकुलम स्थित परमाणु संयंत्रा संबंधी समझौता राहत देने वाला होगा। रूस को यह भी पता है जब उसने अमेरिका के दबाव मे भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए क्रायोजनिक इंजिन देने से मना कर दिया था। तो भारत ने उसका स्वदेशी तकनीक से विकास कर लिया था। वैसा ही उदाहरण परमाणु ऊर्जा के क्षेत्रों में दिया जा सकता है।

          चीन ‘‘वन बेल्ट-वन रोड़’’ योजना के माध्यम से अपने छोटे-छोटे पडोसी देशों  को अर्थिक नव-उपनिवेशवाद द्वारा अपने प्रभाव मे ले रहा है। यह चीन की विस्तारवादी नीति का ही परिचायक है। पाकिस्तान, नेपाल, बांगलादेश , श्रीलंका, म्यांमार और मालद्वीप को आर्थिक मदद और निवेश के नाम पर पहले उन देशों  की अर्थव्यवस्था पर कर्ज का बोझ चढाता है और फिर कर्ज चुका पाने की स्थित में अपनी सेनाओं  के लिए इन देशों  में सुविधाएं राजनीतिक समर्थन मांगता है तथा इन देशों  की नीति निर्माण प्रक्रिया को भी प्रभावित करने की कोशिश  करता है।

          भारत भी सार्क के अपने पडोसी देशों  को साधने की कोशिश  कर रहा है। जिससे चीनी प्रभाव को कम किया जा सके। हाल ही में बांगलादेश  के साथ बिजली का गैस आपूर्ति समझौता श्रीलंका के साथ तमिल बहुल क्षेत्र त्रिंकोमाली मे तेल भंडारण संबंधी समझौता इसी दिशा में कुछ कदम है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की श्रीलंका यात्रा के कारण श्रीलंका चीन को अपने यहां से पन्नडुब्बी संचालित करने से इंकार कर चुका है। भारत ने सार्क के देशों  के लिए दक्षिण एशिया सटेलाईट का भी प्रक्षेपण किया है। पाकिस्तान को छोड़ कर सार्क के सभी देशों  को इससे सेवाएं प्रदान की जाएंगीं। यह कदम भी विदेश  नीति की सफलता मानी जाएगी।

          चीन का ध्यान में रखकर भारतीय विदेश  नीति जो अभी तक ‘‘लुक ईस्ट पॉलिसी’’ के नाम से जानी जाती थी। वर्तमान सरकार ने उसे ‘‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’’ मे परिवर्तित कर दिया है। मई में भारत ने सिंगापुर के साथ मिलकर दक्षिण चीन सागर में युद्धाभ्यास किया था। भारत और जापान मिलकर आधाभूत सरंचना सहित कई क्षेत्रों मं मिलकर कार्य कर रहे है। इसके साथ भारत को फिलिपींस, सिंगापुर, बुर्नेइ वियतनाम के साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। उस क्षेत्र के देशों  के साथ अपने संबंधों को नये स्तर तक लेकर जाना है। इरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी का दोबारा चुना जाना और अफगानिस्तान में भारतीय प्रभाव अरब सागर में चीन-पकिस्तान के प्रभाव को सिमित करने का काम करेगा। हमें चाहबार बंदरगाह के विकास को गति देनी होगी।
          चीन के लिए ‘‘वन बेल्ट-वन रोड़’’ परियोजना को कार्यान्वित करना भी एक चुनौती से कम नही है। चीन सरकार के अनुसार इसके लिए चार ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की आवष्यकता है। चीन की अर्थव्यवस्था मूलत उधार पर निर्भर है। कर्ज उसकी सकल घरेलू उत्पाद का 2.6 गुना हो चुका है। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज ने पिछले 28 सालो मे पहली बार चीन की अर्थव्यवस्था की रेटिंग को घटाया है। चीन की जीडीपी ग्रोथ भी लगातार कम हो रही है। घरेलू मोर्चे के अलावा जिन देशों  में होकर यह गुजरेगा उनकी, गृह-राजनीति, स्थानीय दबाव और विस्थापन भी पेचीदा मुद्दे है। पीछले दिनों पाकिस्तान से कबाईली इलाके बलोचिस्तान तथा पाक-अधिकृत कश्मीर के स्थानीय निवासियों ने इस योजना के विरोध में प्रर्द किये। 

ग्वादर के पास 10 कामगारों की हत्या, चीनी नागरिकों का अपहरण स्थानीय रोष का उदाहरण है। गिलगिट और बाल्टीस्तान के लोगों ने तो चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे कोरोड़ ऑफ गुलामी‘’ कहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एशिया-प्रशांत  क्षेत्र में आर्थिक सामाजिक अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन द्वारा तजाकिस्तान, पाकिस्तान और बंगलादे का उनकी जीडीपी का करीब एक चौथाई ऋण दे रहा है। जो इन कमजोर अर्थव्यवस्थाओं को ऋण जाल मे फंसाकर अपना आर्थिक उपनिवेश  स्थापित करने की कोशिश  है।

          वास्तव में चीन शक्ति संतुलन में एशिया के केंद्र में रहना चाहता है भारत की आर्थिक विकास दर और विश्व मे बढ़ती साख चीन की आंखों की किरकिरी बनी हुई है। अमेरिका के राष्ट्रपति की अविश्वसनीय विदेश  नीति, रूस की कमजोर आर्थिक स्थिति, यूरोपियन यूनियन के प्रति सदस्य देशों  में उहापोह आदि कुछ कारण हैं, जिससे चीन को विश्व रंगमंच पर अपने लिए एक नई भूमिका नज़र रही है। जिसे वह ‘‘वन बेल्ट-वन रोड़’’ के माध्यम से पूरा करना चाहता है। इसका दूसरा चरण भी उसके इसी नजरिए को परिलक्षित करता है जिसमें वह 2030 तक 100 पनडुब्बी और 400 युद्धपोतो के निर्माण का इरादा रखता है।

          चीन चाहता है कि भारत ‘‘वन बेल्ट-वन रोड़’’ में हिस्सेदारी करे क्योंकि उसको भी पता है कि भारत के विरोध के कारण दक्षिण एशिया के कई छोटे देशों में चीन के प्रति एक भय का वातावरण बनेगा और ‘‘वन बेल्ट-वन रोड़’’ को भी वह संशय की दृष्टि से देखेगा। ये ठीक है कि चीन का नेपाल, बंगालादेश , श्रीलंका और म्ंयामार पर कुछ प्रभाव जरूर है लेकिन भारत के सहमति के अपने मायने है। चीन पाकिस्तान  आर्थिक गलियारे के नाम पर चीन भारत की संसद द्वारा भारत का अभिन्न अंग कहा है। भारत का चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारों का समर्थन करना उसमें शामिल होना कश्मीर पर हमारे पूर्व के स्टैण्ड से पीछे होगा। तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारी स्थिति को कमजोर करेगा। इससे कश्मीर समस्या के बहुपक्षीय बनने का भी डर है। जिसे भारत अभी तक खारिज करता रहा है।

          पिछले महीने अफ्रीकी विकास बैंक की 52वीं वार्षिक बैठक गांधीनगर गुजरात में हुई यह अफ्रीकी देशों  के साथ भारत के मजबूत होते आर्थिक संबंधों का परिचायक है। भारत को वहां पर चीन के प्रभाव को कम करने के लिए निवेश  उपस्थिति बढ़ाने के लिए फैंसलों मे तेजी लानी होगी। इसी बैठक में भारत और जापान द्वारा मिलकर एशिया-अफ्रीका विकास कारिडोर के बारे में एक दृष्टि पत्र को पे किया गया। जिसमे अफ्रीकी देशों  में बेहतर व्यापारिक संपर्को के लिए आधारभूत संरचना तैयार की जा सके तथा चीन के समान्तर समान विचारधारा वाले राष्ट्रों को साथ लिया जा सके।

          अफ्रीकी देशों  में यह निवेश  मात्र प्राकृतिक संसाधनों को हासिल करन के लिए हो बल्कि उसमें विविधता होनी चाहिए। भारत की यह कोशिश  उसे चीन और यूरोपियन यूनियन से अलग खड़ा करेगी तथा अफ्रीका के देशों  के साथ हमारे रिश्ते प्रगाढ़ होंगे।




Post a Comment

0 Comments

कोरोना की जारी जंग को जीतने में कामयाब हुए तो यकीनन आने वाला कल हमारा होगा।