मंहगा पड़ा चीन को डोकलाम


भारत -चीन सीमा 


भारत-भूटान और चीन की सीमा पर स्थित चुम्बी घाटी के पठार डोकलाम में पिछले 16 जून 2017 से भारत और चीन की सेना में आमने-सामने जमी है। हल्की झड़पो की तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी आ चुकी हें | बात दरअसल जून के प्रथम सप्ताह में शुरू हुई थी जब चीनी सेना ने भूटानी सेना के दो बंकरों को बुल्डोजर की मदद से ढ़हा दिया और उस क्षेत्र में सड़क निर्माण का कार्य करना आरंभ कर दिया। डोकलाम में अभी तक भारत-चीन-भूटान के बीच सीमाओं का निर्धारण नहीं हुआ है। 2012 की संधि के अनुसार कोई भी एक देश  सीमा निर्धारण का कार्य एक पक्षीय नहीं कर सकता। चीन इस क्षेत्र में निर्माण कर इस संधि का उल्लघंन कर रहा है।


भारत और चीन की सेनाओं के बीच जारी तनातनी के बीच सीमा पर स्थित नाथूला दर्रे से होकर जाने वाले कैलाश मानसरोवर यात्रियों को भी चीन ने रोक दिया। वर्तमान में दोनों सेनायें अपनी स्थिति को मजबूत करने की दिशा में कार्य कर रही है।


डोकलाम का क्षेत्र भारत के लिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वहां चीन की उपस्थिति भारत की सुरक्षा व अखंड़ता के लिए खतरा बन सकती है। डोकलाम का क्षेत्र ”सिलिगुड़ी-गलियारे“ से ज्यादा दूर नहीं है जो उत्तर-पूर्व के राज्यों को भारतीय मुख्य भू-भाग से जोड़ता है। जिसे मीडिया की भाषा में ‘चिकन नेक’ भी कहा जाता है। 


डोकलाम का क्षेत्र सैन्य दृष्टि से भी भारत के पक्ष में है इसके एक तरफ सिक्किम में भारतीय सेनायें तैनात है तो दूसरी तरफ भूटान में भूटानी शाही सेना की ट्रेनिंग  के लिए ‘हो’ में स्थित भारतीय सेना की ‘IMTRAT’ बिग्रेड। इन दोनों के बीच चीन कुछ क्षेत्र पर अपना अधिकार जताता है। किसी भी युद्व या टकराव की स्थिति में भारतीय सेनायें चीनी सेनाओं पर दो तरफा वार कर चीनी सेना का आपूर्ति मार्ग बंद कर सकती है। चीन इस स्थिति को भांपकर वहां अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए सड़क निर्माण का कार्य करना चाहता है और यही वर्तमान संघर्ष की जड़ है।  

डोकलाम के बहाने आखिर चीन चाहता क्या है?


चीन की रणनीति अपने पड़ोसी देशों  पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रही है। भारत और भूटान के साथ भी वह यही खेल, खेल रहा है। पिछले करीब दो सालों के चीनी रिश्तों नज़र डाले तो उसकी इस मंशा को समझा जा सकता है। मौलाना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से अंतराष्ट्रीय आंतकवादी घोषित करवाने की भारत की कोशिशों के खिलाफ वीटो का इस्तेमाल करना, भारत की ”परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह“ में सदस्यता में रोडा अटकाना, दलाईलामा की अरूणाचल प्रदेश की यात्रा का विरोध करना, नत्थी वीजा का मामला हो या भारत का ताईवान के साथ मिलकर दक्षिणी चीन सागर में तेल उत्खनन का विरोध।

चीन ने भारत के लगभग सभी पड़ोसी देशों  पर निवेश के नाम पर डोरे डालकर अपने प्रभाव में लेने की कोशिश  की है। वह कुछ हद तक सफल भी हुआ है। उसने बंगलादेश  के चिटगांव बंदरगाह, म्यांमार के कोको द्वीप पर, श्रीलंका की हब्बबटोटा बदंरगाह तथा पाकिस्तान की ग्वादर बंदरगाह के माध्यम से अपनी सैनिक गतिविधियाँ भारतीय जल क्षेत्र के आस-पास बढ़ा दी है। नेपाल में वह माओवाद के नाम पर वहां के सत्ता प्रतिष्ठान को अपना हितैषी बना चुका है।


चीन के साथ भूटान के राजनीतिक संबंध नहीं है। भूटान की विदेष नीति, रक्षा और कुछ हद तक अर्थव्यवस्था भी भारत की जिम्मेदारी है। शायद इसी कारण वह भूटान के बहाने भारत के साथ टकराव की स्थिति पैदा कर रहा है। भारत के पिछले दिनों चीन की महत्त्वकांक्षी (OBOR) ओबोर परियोजना के अतंर्गत पाकिस्तान आधिकृत कश्मीर से होकर बनने वाले ”चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे“ का विरोध किया था। चीन की अर्थव्यवस्था मुख्यता निर्यात आधारित है। निर्यात बढ़ाने के लिए ओबोर परियोजना को सफल बनाना चीन के लिए चुनौती बन चुका है। चीन की आर्थिक विकास दर लगातार कम हो रही है। तथा ऋण बढ़ रहा है। बढ़ती बेरोजगारी से जूझ रहे चीन को ओबोर परियोजना आशा की आखिरी किरण नज़र आ रही है। ओबोर के जवाब मे भारत ने दक्षिण एशिया  के देशों जैसे भूटान, नेपाल, बांग्लादेश , म्यांमार को सड़क मार्ग से जोड़कर एक आर्थिक गलियारे की व्यूह रचना प्रांरभ कर दी है। चीन को डर है कि कहीं उसके अन्य पड़ोसी देश  जिनसे चीन के अच्छे रिश्ते  नहीं है वे भारत की अगुवाई में लाभबंद्व न हो जाये। इसी कारण चीन कभी कश्मीर में भारत-पाक के बीच मध्यस्थता का सपना देखता है तो कभी सिक्किम के भारत में विलय के इतिहास को पलटना चाहता है।

चीनी अति उत्साह के कारणः-


भारत की पूर्व की सरकारो ने चीन के प्रति सदा ही नर्मी दिखाई है। ”हिन्दी चीनी-भाई भाई“ से लेकर ‘पंचशील’ के ढकोसलों और ख्याली पुलावो को हमेशा चीन ने तोड़ा है। चीनी सीमा पर लगातार बढ़ती घुसपैठ और अतिक्रमण के सामने हमेशा  ही आत्मसमर्पण किया गया तथा चीनी सरकार की अनुचित मांगों को मानकर सीमा पर शांति के नाम पर सुरक्षा बलों को पीछे हटने को मजबूर किया गया। भारतीय विदेश नीति के कर्णधारो ने हमेशा ही पश्चिम के देशों को तरजीह दी तथा हमारे पूर्व के देशों को नज़रअंदाज कर दिया गया। ठीक इसी समय चीन आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा था तथा उसने इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया। ”लुक ईस्ट पालिसी“ के नाम पर इंडोनेशिया , वियतनाम, जापान, दक्षिणी कोरिया, सिंगापूर, ब्रुर्नेई के साथ विदेश  संबंधों को तव्वजों देने की कोशिश की गई मगर तब तक ब्रहमपुत्र  में काफी पानी बह चुका था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्थिति संभालने की कोशिश में पूर्व सरकारों द्वारा प्रतिपादित ”लुक ईस्ट पालिसी“ के स्थान पर ”एक्ट ईस्ट पालिसी“ द्वारा इस क्षेत्र के देशों  के साथ चीन के समानांतर रिश्ते बनाने शुरू कर दिये है। चाहे दक्षिणी चीन-सागर में ताईवान के साथ तेल की खोज हो या वियतनाम को मध्यम दूरी की ‘आकाश ’ मिसाईलों का निर्यात। हाल ही में 17 सालों के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने नेपाल की यात्रा की है तथा बंगलादेश  के साथ 41 सालों से चला आ रहा भूमि-विवाद सुलझाया है। चीन के कान हाल ही में हिन्द महासागर में  आयोजित  भारत, अमेरिका और जापान द्वारा नौसैनिक युद्वभ्यास “मालाबार-2017“ से भी खड़े हो गये हैं। जिससे हिन्द महासागर मे चीन की बढ़ती गतिविधियों पर एक सांकेतिक दबाव पड़ेगा। इसके साथ-साथ भारतीय सीमाओं की सुरक्षा के लिए सरकार ने अपने परमाणु सिद्वांत के “पहले प्रयोग नही” के सिद्वांत में भी परिवर्तन का मन बना लिया है।

चीनी माल की उल्टी गिनती शुरूः-


देश  का हर नागरिक चीन के प्रति सचेत होता जा रहा है। पिछली दीवाली पर जिस प्रकार से चीनी सामान के बहिष्कार की एक मुहिम स्वेच्छा से देश  भर मे चली थी उसका व्यापक असर देखा गया। स्वदेशी जागरण मंच भी ”राष्ट्रीय स्वदेशी  सुरक्षा अभियान“ के माध्यम से देश भर में चीन विरोध का जनजागरण अभियान चला रहा है। डोकलाम के मामले  ने आग में घी का काम किया है। आज देश का हर नागरिक विभिन्न प्रचार माध्यमों के द्वारा चीन के विरोध में खड़ा है लेकिन इस बीच नागपुर मैट्रो के लिए एक चीनी कम्पनी को ठेका दिया जाना जनभावनाओं के खिलाफ है अगर चीन के मोर्च पर सरकार और आमजन के स्वर में एकता होगी तो चीन की हार निश्चित  है।.डोकलाम सचमुच चीन के लिए सचमुच बहुत मंहगा पड़ने वाला है। 


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 विश्व के लिए खतरा है चीन