भारतीय राजनीति में समसामयिक मुद्दे



पुस्तक    : भारतीय राजनीति में समसामयिक मुद्दे
लेखक     : आशीष रावत 
प्रकाशक : सत्यम पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड , नई दिल्ली 

आशीष रावत मेरे मित्र है | देश भर में विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में उनके लेख छपते रहते है | प्रस्तुत समीक्षा पुस्तक उनके लेखों का संग्रह है | आशीष ने कम उम्र में भी उन सब मुद्दों पर अपनी कलम चलाई है जिनसे एक जागरूक नागरिक सदा अपने आस-पास घटित हो रहे घटनाक्रम, सवालों एवं मुद्दों के प्रति संवेदनशील रहता है। हम इन मुद्दों और सवालों से दो-चार होते हुए अपना एक पक्ष बना लेते है। जो हमारे वैचारिक धरातल को सुविधाजनक लगता है। लेकिन भारत जैसे बहुसांस्कृतिक, बहु-भाषी एवं बहु-धर्मी समाज के मुद्दे भी बहु आयामी होते है। कुछ व्यक्ति इन मुद्दों से बचकर निकलने की कोशिश करते है ताकि असुविधाजनक सच्चाई तथा अपनी वैचारिक जमीन के बीच एक सुरक्षित दूरी बनी रहे लेकिन आशीष रावत ने अपनी  इस पुस्तक के विभिन्न लेखों में सुरक्षित दूरी की परवाह न करते हुए उन सभी मुद्दों को टटोलने की कोशिश की है जिनसे देश एवं समाज और राजनीति को वर्तमान दौर में दो-चार होना पड़ रहा है।

       पिछले दिनों माननीय सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा तीन तलाक के मसले पर इस प्रथा के खिलाफ निर्णय को लेकर समान नागरिक संहिता और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर देशभर में एक नई बहस शुरू हो गई है। मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड व दूसरे मुस्लिम धार्मिक संगठन भी इस मुद्दे पर बंटे हुए है। हमें यह स्वीकार करना ही पड़ेगा कि किसी भी नागरिक को किसी भी धर्म का अनुयायी होने के कारण उसके नागरिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। जब हमारे देश का संविधान एक है तो समान नागरिक संहिता की दिशा में एक-एक कदम देश की अखंण्डता को मजबूती देने वाला होगा।

       काश्मीर की समस्या की मूल जड़ भी काश्मीर में लागू दोहरे संविधान में ही है। इंडोनेशिया के बाद भारत में सबसे ज्यादा मुसलमान है। धर्म के नाम पर देश का बंटवारा पहले हो चुका है। जिसकी एक बड़ी कीमत देश की जनता ने चुकायी है। विभाजन के समय पाकिस्तान से पलायन करके आये शरणार्थियों की आप-बीती सुनते है तो कलेजा हाथ को आ जाता है। कुछ-कुछ यही हाल कश्मीरी पंड़ितों का भी हुआ जिन्हें रातो-रात अपनी जड़े छोड़कर दिल्ली, जम्मू और देश के दूसरे भागों में नारकीय जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है। काश्मीर में अलगाववाद अब जेहादी शक्ल लेता जा रहा है। जिसे किसी भी कीमत पर सफल नहीं होने देना चाहिए। सरकार इस मुद्दे पर पाकिस्तान को भी अलग-थलग करने में सफल होती नज़र आ रही है। अलगाववादी हुर्रियत नेता भी आंतकवादी फंड़िग के मामलों में NIA के रेडार पर है। सरकार को आंतकवाद पर नकेल कसने के साथ-साथ बातचीत के रास्ते भी खुले रखने होंगे।

       प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में NDA सरकार के भी पांच साल पुरे हो चुके है। किसी भी सरकार के कार्यो का मूल्यांकन करने के लिए पांच साल का कार्यकाल कम नहीं होता इस दौरान काफी कुछ बदलाव शासन में दिखाई देता है। पूर्व की सरकारों से एक सकारात्मक बदलाव तो यह दिखाई देता है कि इस दौरान भ्रष्टाचार का कोई गंभीर आरोप सरकार के माथे पर नहीं है। वितिय अनुशासन लागु करने के लिए नोटबंदी जैसा कठोर कदम प्रधानमंत्री की मजबूत इच्छाशक्ति को दिखाता है। विमुद्रीकरण से संबंधित रिजर्व बैंक के आंकड़े आने के बाद नोटबंदी की सफलता पर बहस हो सकती है। लेकिन नोटबंदी को असफल नहीं कहा जा सकता क्योंकि आयकर विभाग को इस दौरान वित्तिय लेन-देन संबंधी जो आंकड़े मिले है वे भविष्य में राजस्व बढ़ाने में सहायक होंगे।

       राजनीतिक दलों द्वारा चंदे को लेकर भी पारदर्शिता के मामले में विभिन्न सामाजिक संगठनों का दबाव रहता है। इस दिशा में कुछ कदम उठाये गये है। लेकिन यह भी सच्चाई है कि आज भी सतारूढ़ दल व मुख्य विपक्षी दल को मिले चंदे के 80 प्रतिशत स्त्रोत अज्ञात है। इस दिशा में नीतियों में और ज्यादा पारदर्शिता की जरूरत है इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आम नागरिक का विश्वास बढ़ेगा। इसी से जुड़ा मुद्दा है “ONE NATIONONE ELECTION”  इस मुद्दे पर यह बहस हो सकती है क्योंकि इतने विशाल देश में चुनावों पर आसीमित संसाधन खर्च होते है। इससे बार-बार आदर्श आचार संहिता के नाम पर विकास कार्यो को भी ब्रेक लग जाता है। इस दिशा में कदम उठाते समय लोकतांत्रिक मूल्यों को सर्वोपरि रखने की जरूरत है न कि अपने राजनीतिक हित।

       बात चाहे राम मंदिर की हो या गौ-हत्या संबंधी कानून की। ये दोनों मुद्दे बहुसंख्यक हिन्दू आबादी से जुड़े मुद्दे है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार के सत्ता में आने पर यह मुद्दे विमर्श के केन्द्र में आ जाते है। इस दौरान एक सकारात्मक कदम यह उठा है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों को बातचीत करने के लिए प्रेरित किया है। कुछ मुस्लिम धर्मगुरु भी राम मंदिर के पक्ष में अपने ब्यान दे चुके है। गौ-हत्या बहुसंख्यक हिन्दुओं की भावनाओं के खिलाफ है। लेकिन गौ रक्षा के नाम पर गुंडागर्दी को भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। 


वर्तमान में देश के विभिन्न हिस्सों में आरक्षण का जिन्न एक बार फिर बाहर आ गया है। हरियाणा में जाट, राजस्थान में गुर्जर, गुजरात में पाटीदार, महाराष्ट्र में मराठे आंदोलनरत है ये वे जातियां है जो कृषक समुदाय में आती है लेकिन वर्तमान में खेती-किसानी घाटे का सौदा हो चुकी है। भूमि की जोत लगातार घट रही है। इस दौरान एक स्वर यह भी उठने लगा है कि क्यों न जाति आधारित आरक्षण को खत्म करके आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाये।

       पिछले दिनों जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय गाहे.बगाहेए सुर्खियों में रहा। वाम राजनीति की पौध तैयार करने वाले इस विश्वविद्यालय को वामपंथियों का आखिरी किला भी कहा जा रहा है। वहां  पर अफजल गुरु के समर्थन में देश विरोधी नारे भी लगाये गये। फिर से यह बहस शुरु हो गई है कि विश्वविद्यालय को राजनीति का अखाड़ा बनाना कहां तक जायज है| इसका शैक्षणिक माहौल पर इसका क्या असर पड़ता है| युवाओं से ही जुड़ा किशोर अपराध का मामला है। जिसका ग्राफ दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। नव-धनाड़य परिवारों के संयुक्त परिवार के संस्कारों से वंचित युवा जरा सी बात को जीवन-मरण का प्रशन बना लेते है। परिवार के सभी सदस्यों के बीच परस्पर वर्तालाप व विचारों का आदान-प्रदान इस समस्या में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है।

       आशीष रावत चूँकि देवभूमि उतराखंड से जुडे़ है। वहाँ से रोजगार की तलाश में पलायन एक विकराल समस्या है। पहाड़ी संस्कृति पर भी इसका विपरित प्रभाव पड़ता है। शेखर जोशी की एक कहानी पढ़ी थी ‘दाजू’ पलायन के बाद बदलते सामाजिक यथार्थ को यह कहानी रेखांकित करती है। कुछ इसी प्रकार का पलायन आधुनिक निजी विद्यालयों में पढ़ने वाली नई पीढ़ी हिन्दी से भी कर रही है। हिन्दी भाषा वर्तमान में बाजार की भाषा तो बन चुकी है लेकिन हर आम और खास की भाषा, अदालत की भाषा, प्रसाशन की भाषा बनने में इसे अभी और रास्ता तय करना होगा।

       आशीष रावत इन सभी सवालों के प्रति संवेदनशील है एवं उनसे जुझते है और सबसे बड़ी बात यह है कि कोई उनसे असहमत हो सकता है इस डर से वे समसामयिक मुद्दों से पलायन नहीं करते।

शुभकामनाओं सहित |
दुलीचंद कालीरमन


पुस्तक    : भारतीय राजनीति में समसामयिक मुद्दे
लेखक     : आशीष रावत 
प्रकाशक : सत्यम पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड , नई दिल्ली 

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