रंगोली : जीवन के विविध रंग





पुस्तक  : रंगोली (काव्य-संग्रह)
कवि    : अजय गुप्ता
प्रकाशक : अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली
मुल्य   : 200/- मात्र




अजय गुप्ता जी का प्रथम काव्य संग्रह रंगोलीप्राप्त हुआ है | इस काव्य संग्रह में अजय जी ने अपनी 84 कविताओं को 10 खंडों में विभाजित किया है | इन 10 खंडों में जीवन की विविधताओं के रंगो को संजो कर एक रंगोली के रूप में सजाने का प्रयास किया है | अजय जी इस प्रयास में सफल भी रहे हैं|

 हरियाणा साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित रंगोलीकाव्य-संग्रह की भुमिका  वरिष्ठ साहित्यकार और सुप्रसिद्ध लघुकथाकार डॉ अशोक भाटिया जी ने लिखी है जिसमें युवा कवि की सतरंगी कविताओं के रंगो को उलटने-पलटने और फिर संजोने की चाहत का विश्लेषण किया है | प्रस्तुत काव्य संग्रह में अजय जी ने पुरातन सत्य को उजागर करने के साथ साथ नवीनता को भी स्थान दिया है प्रथम खंड में पुराणों के रंग के अंतर्गत शिव, द्रौपदी, भीष्म आदि पात्रों के माध्यम से आदि सत्य  को उजागर करने का काम किया है | भीष्म का साक्षात्कार कविता में कवि प्रश्न करता है कि -

नारी थी वो/ धृत में दांव पर लगी/

तुमने कुछ ना किया क्यों/
क्या अपेक्षा थी/
कुलवधू का चीर हरण तुम/
निशब्द देखते रहे /
क्या जिज्ञासा थी/
           

 कवि सदा ही अपने अंतर्मन के द्वंदों से जूझता रहता है | आत्मा, हृदय, इच्छा-मृत्यु, पुनर्जन्म आदि कविताओं के माध्यम से कवि विज्ञान और धर्म के द्वंद को रेखांकित करता है | प्रकृति के विभिन्न रूपों चाहे वह रेगिस्तान हो या हिम-सौंदर्य या फिर रात का सौंदर्य कवि को दुल्हन जैसा लगता है रचनाकार नदियों के जीवन पर आए संकट को भी रेखांकित करता है | इच्छा-मृत्यु अंतर्द्वंद कविता में इसी प्रकार का एक अंतर्द्वंद दिखाई पड़ता है-


जिजीविषा और इच्छा-मृत्यु के बीच/
एक अंतर्द्वंद है/ 
एक चुनाव का/

मिट्टी का रंग कविता में कवि आधुनिक जीवन शैली को  कुछ पल के लिए छोड़कर प्रकृति की गोद में जाने के लिए बेताब दिखाई पड़ता है-

आओ जरा दूर शहर से/
और अपनी लग्जरी कार के/                  
शीशे उतार कर देखो/
देखो मिट्टी के रंग /
आज भी धूसर है/


 रिश्तो के रंग और समाज के रंगों को कोई भी रचनाकार दरकिनार नहीं कर सकता | यह रिश्ते ही कभी इतने अजीज होते हैं कि इनके बिना जीवन अधूरा लगता है और यही रिश्ते समय के साथ-साथ रद्दी अखबार की तरह भी हो जाते हैं | जिनको अनाथ आश्रम और वृद्ध आश्रम में जगह मिलती है | अजय जी किसान की नियति को भी वर्तमान संदर्भ में उजागर करते हैं -

निचोड़ लिया तुमने /

मुझसे मेरा हर सार /
और आज कह रहे/
मुझे एक रद्दी अखबार/

अनाथआश्रम-वृद्धाश्रम कविता में समाज की सच्चाई उजागर होती है-

वक्त के ऐसे सिलसिले मिले/

अनाथ आश्रम में बच्चे/
गरीबों के दिखे/
वृद्धाश्रम में बुजुर्ग/
अमीरों के मिले/


 जीवन के रंग खंड में कभी व्यक्ति का जीवन लैंप पोस्ट की भांति एकांकी लगता है | जिसका जलना ही उसकी नियति बन जाता है जीवन की राहें इतनी आसान नहीं है और पग पग पर यह जिंदगी हमें कुरुक्षेत्र लगने लगती है | जिसका जीवन गणित उलझा रहता है | सांसे टिक-टिक-टिक चलती रहती हैं और एक-एक कदम उस परम सत्य की ओर बढ़ते चले जाते हैं |

हम बंद /

अलग-अलग को कोष्ठकों  में /
बुनते रहते समीकरण/
लगाते रहते गुणा भाग/
जबकि अंतिम-सत्य शून्य/


 आधुनिक युग का कोई भी कवि तकनीक और उसके प्रभाव से कटकर रचना-कर्म में नहीं रह सकता | आज के मोबाइल युग में अविश्वास की खाई परिवार के बीच रिश्तो में खटास का कारण बनती जा रही है | अजय जी ने अपनी कविता नवीनता के रंग खंड के अंतर्गत हाईटेक विश्वास कविता में इसी प्रकार की भावनाओं को व्यक्त किया है |

कहीं पैटर्न लॉक बनाकर/

तिरछी रेखाओं में उलझ गया हूं/
कहीं पासवर्ड बनकर/
सितारों के पीछे छुप गया हूं/
मैं विश्वास हूं/
मैं अब हाईटेक हो गया हूं/

 अजय जी कविता के साथ साथ ग़ज़ल में भी हाथ आजमाते रहते हैं | उनके कई उम्दा शेर इस संग्रह की गजलों में भी देखे जा सकते हैं | छोटी बहर की गजलें भी अजय जी बखूबी लिख लेते हैं और गीतों पर भी अपनी पकड़ रखते है | उनकी गजलों में कहीं-कहीं कबीर की वह खुद्दारी नजर आती है जिसमें वह कहते हैं कि:-

काबा में काशी में इबादत की जरूरत है /
बसर में ही मगर तुमने खुदा देखा हुआ होगा /

 देश के रंग खंड के अंतर्गत भारत, तिरंगा और कश्मीर और वहां तैनात जवानों के बारे में भी अपनी रचना-धर्मिता निभाई है | भोपाल गैस त्रासदी औद्योगिकरण की सच्चाई है और भोपाल 31 साल बाद इस कविता के माध्यम से उस विभीषिका को एक नई नजर से देखा है

कहां है जिंदगी/

कहां थे हुक्मरान/
हत्यारे चले गए/
सियासत छोड़ गए /
अपने लड़ते/
सिर्फ अपने लिए/

खंड 10  में विविधता के रंग शब्द, आहट, चौराहा के माध्यम से विभिन्न रंगों की कविताओं को संकलित करने का कार्य किया है | कवि इतवार मनाते हैं, समय की हंसी, मरहम पट्टी, शब्द और आहट आदि कविताओं के माध्यम से अपनी बात को कहने में सफल हुए है | आखिरी कवितामैं विचार हूंके माध्यम से यही कहा जा सकता है कि कविता भी एक विचार है जिसे समाज में हमेशा से एक मुकाम हासिल था लेकिन आज कविता अपने तमाम अंतर्विरोधों और आधुनिकता के साथ साथ तकनीक के साथ भी अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही है -

विषाद में/

और हर्ष में /
खटास में/ संघर्ष में /
विजय और पराजय में /
मन के समस्त भावनाओं का/
मैं आधार हूं /
मैं विचार हूं/


 एक कवि के रूप में अजय जी ने जीवन के सभी मुद्दों पर अपने विचार रखने का कार्य बड़ी शिद्दत से किया है | मैं अजय जी को उनके प्रथम कविता संग्रहरंगोली के प्रकाशन पर साधुवाद देता हूँ और उनकी रचना-धर्मिता की निरंतरता के लिए कामना करता हूं |

पुस्तक  : रंगोली (काव्य-संग्रह)
कवि    : अजय गुप्ता
प्रकाशक : अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली
मुल्य   : 200/- मात्र






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3 Comments

  1. इस गंभीर और गहरे विश्लेषण के लिए बहुत बहुत आभार रमन जी। आप ने प्रत्येक खंड को उठाया और कविताओं को शीर्षकों को बख़ूबी अपने वाक्यों में पहुंचाया। इस विन्यास ने मन मोह लिया।
    हाँ, आपसे सुधारात्मक पक्ष पर और विस्तार से सुनने की अपेक्षा थी जिसपर आप मौन धर गए। विश्वास कीजिये न मैं हताश होता और न ही बुरा मानता। :))
    पुनः आपका बहुत बहुत शुक्रिया

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  2. वास्तव में अजय जी ने रंगोली में जीवन के विविध रंगों को इतनी बखूबी तथा संयोजनात्मक ढंग से उकेरा है कि समीक्षक हो या पाठक , सभी उनकी इस सृजनात्मक कृति और लेखन शैली से अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते ।
    रंगोली काव्य संग्रह में अजय गुप्ता ने समाज व जीवन के विविध रंगों को खुली आ्ँखों से देखने व दिखाने का सफल प्रयास किया है....यूं तो इस संग्रह की हर कविता कुछ खास है ..लेकिन अंत में “ इतवार मनाते है " कविता के माध्यम से कवि ने आज की भागमभाग जिंदगी से कुछ पल अपने लिए चुराने पर जोर दिया है ...

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  3. अजय जी , मैंने आलोचनात्मक नही अपितु एक पाठकीय समीक्षा करने का प्रयास किया है। आपकी आने वाली अगली कृति की आलोचनात्मक समीक्षा जरूर करूँगा। उसका इंतजार रहेगा।

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