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संयुक्त राष्ट्र संघ पर उठते सवाल



संयुक्त राष्ट्र संघ पर उठते सवाल
संयुक्त राष्ट्र संघ पर उठते सवाल 


चीन ने लगातार चौथी बार पाकिस्तानी आंतकवादी मौलाना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र संघ में अंतर्राष्ट्रीय आंतकी घोषित होने से बचा लिया | ये वही आंतकी सरगना है जिसके आंतकी संगठन “जैश-ऐ-मुहम्मद” ने पुलवामा में हुए आंतकी हमले की जिम्मेदारी ली थी | जिसका बाद भारतीय वायु सेना ने पकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक कर आंतकी देश को चेताने की कोशिश की थी | दुनियाभर में भारत ने कुटनीतिक प्रयासों के माध्यम से पाकिस्तान को अलग-थलग करने के प्रयास किये जिसमे भारत सफल भी रहा | इसी का नतीजा रहा कि अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन द्वारा पाकिस्तानी आंतकवादी मौलाना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र संघ में अंतर्राष्ट्रीय आंतकी घोषित करने के लिए प्रस्ताव पेश किया जिसे चीन ने आखिरी समय में वीटो शक्ति का प्रयोग करके बचा लिया | जैश के सरगना पर संयुक्त राष्ट्र में भारत पहले भी तीन बार प्रस्ताव ला चुका है जिसमे चीन ने हर बार अपनी टांग अडाई है लेकिन अबकी बार प्रस्ताव अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन द्वारा लाया गया था जिस पर वीटो का अनैतिक प्रयोग चीन द्वारा किया गया |


चीन के लिए पाकिस्तान मजबूरी बन गया है | पाकिस्तान में चीन द्वारा 27 अरब डालर का निवेश किया गया है | इसके अलावा चीन के पांच-छ लाख नागरिक ओबोर, ग्वादर बंदरगाह तथा वहा चीनी कंपनियों द्वारा स्थापित बिजली संयंत्रों में कार्यरत है | चीन द्वारा पाकिस्तान में अपने निवेश और नागरिकों की सुरक्षा के लिए चीन पाकिस्तानी आंतकी संगठनों से टकराव नहीं चाहता | इसका दूसरा कारण चीन के शिनजियांग प्रांत में मुस्लिम उईगर चरमपंथियों को काबू में रखना चाहता है | एक तीसरा कारण अफगानिस्तान का मामला भी है | चीन ग्वादर और ओबोर को अफगानिस्तान में प्रवेश का माध्यम बनाना चाहता है | इसके लिए उसे पाकिस्तान और तालिबान दोनों की जरुरत है | इससे स्पस्ट है कि चीन अपने आर्थिक हितों के लिए वैश्विक प्रतिबध्ताओं को ठेंगा दिखा रहा है |


चीन भारत के साथ ब्रिक्स (BRICS) और रिक (RIC) जैसे मंचों पर साथ खड़ा होने का मात्र दिखावा करता है | अगर उसे भारत और पाकिस्तान में से एक चुनना पड़े तो वह पाकिस्तान के साथ खड़ा मिलेगा | चीन के  भारत के साथ क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और कुटनीतिक स्तर पर हित टकराते है | भारत की बढती आर्थिक और सैनिक शक्ति को लेकर चीन चिंतित है | इसलिए वह “परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह” में भारत की सदस्यता को भी रोकने का प्रयास लगातार करता रहा है |


भारत को आंतक के मुद्दे पर अपने ही भरोसे निपटना होगा | मसूद को घेरने के कई और भी रास्ते हो सकते है | असलियत में मसूद तो एक चेहरा है | हमें चीन की काट तैयार करनी होगी | जिसमे सरकार के साथ-साथ आम नागरिक की भी भूमिका होगी | यह सर्वविधित है कि वर्तमान में अमेरिका और चीन में “व्यापार युद्ध” चल रहा है | अमेरिका ने जिस प्रकार अपने आर्थिक हितों और बाज़ार के उपयोग पर चीन को कड़ा सन्देश दिया है, क्या भारत की सरकार और आम नागरिक एक अभियान के तहत चीनी सामान के खिलाफ एक अभियान चला कर चीन के आर्थिक हितों को चोट पहुंचा सकते है ? अगर सरकार पुलवामा की घटना के बाद पाकिस्तान के सामानों पर 200 प्रतिशत ड्यूटी लगा सकती है तो यह चीन के खिलाफ भी किया जा सकता है | चीन के साथ तो हमारा व्यापार घाटा 60 अरब डालर तक पहुँच गया है जो अपने दुश्मन को ताकत देने का काम कर रहा है | चीन की अपनी चुनोतियाँ भी है | उसकी अर्थव्यवस्था में पिछले कई सालों से कमजोरी बनी हुई है | उसकी जनसँख्या बूढी हो रही है | चीन को आर्थिक चोट पहुंचाई जानी चाहिए क्योंकि चीन यही भाषा समझाता है |  





इस मुद्दे ने आंतकवाद के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधारों की जरुरत की एक नई बहस छेड़ दी है | वर्तमान में यह वैश्विक संस्था महज कुछ विकसित देशों की कठपुतली बनकर रह गई है| जिसे ये देश अपनी सुविधानुसार प्रयोग करते है | 24 अक्टूबर 1945 को जब संयुक्त राष्ट्र संघ की सथापना हुई और आज के विश्व में जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है | भारत और अफ्रीका के बहुत से देश तब उपनिवेश थे | भारत स्थाई सदस्यता के मुद्दे को कई बार संयुक्त राष्ट्र संघ में उठा चुका है कि भारत की 130 करोड़ जनसंख्या और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत को इस संस्था से बाहर रखकर एक बराबरी पर आधारित विश्व व्यवस्था का सपना नहीं देखा जा सकता | संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधारों की मांग केवल भारत द्वारा ही नहीं उठाई जा रही बल्कि जर्मनी, जापान और ब्राज़ील जैसे देश भी इसकी संरचना में सुधार चाहते है | इन विकासशील देशों के अलावा अफ्रीका महाद्वीप के देशों को उचित प्रतिनिधित्व दिए बिना संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी विश्वसनीयता खो देगा | भारत की सुरक्षा परिषद् में सुधार हेतु अपने कुटनीतिक प्रयास जारी रखने होंगे ताकि इस विश्व संस्था को प्रासंगिक बनाया जा सके | आज यह सच्चाई है कि दुनिया की महाशक्तियां अपने हितों को ध्यान में रखकर आंतकवाद को अच्छे आंतकवाद या बुरे आंतकवाद के रूप में देखती है | जबकि यह सच्चाई है कि आंतकवाद विश्व व्यवस्था और मानवता के लिए खतरा है |


भारत के राजनीतिक दलों को भी विदेश और सुरक्षा सम्बंधित मामलों में सवेंदनशीलता दिखानी होगी | डोकलाम के समय विपक्षी पार्टी का अध्यक्ष चुपचाप चीन के राजदूत से मिलता है और मसूद अजहर के मुद्दे पर चीन द्वारा वीटो के प्रयोग से भारत के विपक्षी दल का नेता खुश होता है तो यह राजनीतिक गंभीरता की कमी को दिखलाता है जिससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को धक्का लगता है | देश का मतलब सिर्फ सरकार ही नहीं होती बल्कि विपक्ष और सारी जनता भी होती है और हमें एक स्वर में आंतकवाद और चीन के खिलाफ खड़े होना होगा |   






                                      

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