कर्मयोग (लघुकथा)

कर्मयोग (लघुकथा)
कर्मयोग (लघुकथा)


पांडेजी ऑफिस में आज भी लेट आये थे। एक सज्जन जो उनका काफी देर से इन्तजार कर रहे थे! उसने कुछ प्रार्थना-भरे अन्दाज में कहा-

"सर, मैं राशनकार्ड के लिए आया हूँ। आपने आज आने के लिए कहा था।"


"अरे भाई, कहीं आग थोड़े लगी है। पहले ठीक से साँस तो ले लूँ। देखते नहीं बाहर कितनी गर्मी से आ रहा हूँ।"

पांडेजी ने झुँझलाकर कहा। फिर आराम से सिगरेट सुलगाकर दो-तीन कश मारे। देखा, बगल की कुर्सी पर श्रीवास्तव जी अपनी फाइलों में मस्त थे।

 पांडेजी उनकी तरफ कुर्सी सरकाते हुए बोले, "श्रीवास्तवजी कल गाँधी मैदान के सत्संग में गए थे क्या?"


"नहीं तो!" श्रीवास्तवजी ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया।


"अरे श्रीवास्तवजी! कितने महान सन्त हैं वे। कल कर्मयोग के बारे में उनकी व्याख्या सुनकर मेरी तो आँखें ही खुल गईं।" पांडेजी लम्बी हाँक रहे थे मगर उनकी सिगरेट से निकलता धुआँ पंखे से टकराकर उनके कर्मयोग को कमरे में फैला रहा था और बाहर कतार बढ़ रही थी |

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