भारतीय विदेश नीति के विविध आयाम

भारतीय विदेश नीति के विविध आयाम
भारतीय विदेश नीति के विविध आयाम 



          भारत ने 15 अगस्त 1947 को जब आज़ाद परिवेश  में आंखे खोली तो द्वितीय विश्व  युद्ध के बादल छटे नहीं थे। वैश्विक स्तर पर युद्ध की खुमारी मे दुनिया के लगभग सारे देश दो धड़ो में बंटे थे। एक तरफ पूंजीवादी देश अमेरिका के पीछे लामबंद थे तो समाजवादी विचारधारा वाले देश सोवियत संघ के साथ खड़े थे। कुछ ऐसे देश भी थे जो विश्व  युद्ध से बदली हुई परिस्थितियों में तय नहीं कर पा रहे थे कि आखिर आगे की राह क्या होगी। नयी-नयी आज़ादी के वातावरण में भारत की विदेश नीति का सारा दारोमदार तत्कालिन प्रधानमंत्री नेहरू के पास ही था क्योंकि प्रधानमंत्री के साथ-साथ विदेश मंत्रालय का कार्यभार भी उन्ही के पास था। नेहरू खुद समाजवादी विचारों से प्रेरित थे लेकिन सोवियत संघ के धड़े में जाकर खुलेआम अमेरिका उसके मित्र देशों की नाराजगी मोल लेने की स्थिति में नही थे। इसी कारण गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव पड़ी और नेहरू द्वारा पंचशील का सिद्दांत दिया गया। उस समय विदेश नीति वैश्विक निरस्त्रीकरण की भावना पर केन्द्रित थी क्योंकि दुनिया अमेरिका द्वारा हिरोशीमा और नागासाकी पर परमाणु हमलों के कारण सदमें में थी। इसी कारण भारत की विदेश नीति नपी तुली लचीली रही। भारत ने वैश्विक संस्थाओं में चीन के प्रवेश में मदद की लेकिन बाद के दिनों मेंहिन्दी-चीनी भाई-भाईका हश्र भी सबने देखा जब 1962 मे चीन ने हम पर युद्ध थोप दिया और अक्साई चीन का  37 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हथिया लिया।

          इंदिरा गांधी के काल में विदेश नीति में कुछ गर्मी आनी शुरू हुई जिसके कारण बांगलादेश का जन्म हुआ, भारत ने पहला परमाणु परीक्षण किया। गुट निरपेक्ष आंदोलन को भी थोड़ी प्राण वायु मिली। लेकिन उनके बाद के दिनों में राजीव गांधी जैसे अपरिपक्व प्रधानमंत्री ने तमिल मुद्दे पर अपने प्राणों से ही हाथ धोना पड़ा। उसके बाद के दौर में केन्द्र में गठबंधन की कमज़ोर सरकारे अपनी कुर्सी बचाने के चक्कर में विदेशी मामलों को ज्यादा तरजीह नही दे पायी। आर्थिक दषा उतरोत्तर कमज़ोर होती चली गई। देवगौड़ा, चन्द्रशेखर और गुजराल में से सिर्फ इन्द्र कुमार गुजराल ने हीगुजराल सिद्धांतके रूप में कुछ कदम चलने की कोशिश  की लेकिन ने लंबी दूरी तय नहीं कर पाये।




          1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार के दौरान जब मुक्त अर्थव्यवस्था को अपनाया गया तो ज्यादा से ज्यादा निवेश  आकर्षित करने के लिए पश्चिमी देशों को महत्व दिया जाने लगा। इस दौरान पूर्वी देशों को नज़र अंदाज कर दिया गया क्योंकि ज्यादातर पूर्वी देश आर्थिक रूप से इतने सुदृढ़ नही थे कि भारत में निवेश  के मामले में कोई मदद कर पाते। ठीक इसी समय चीन ने इस स्थिति का लाभ उठाया और इस क्षेत्र में क्षेत्रिय शक्ति के रूप में अपने पैर पसारने शुरू कर दिये। जिसके कारण भारत के रणनीतिकारों के कान खड़े होने शुरू हो गये औरलुक ईस्ट पॉलिसीके तहत इंडोनेशिया, वियतनाम, मलेशिया, जापान, कोरिया, आस्ट्रेलिया तथा सिंगापुर के साथ संबंधो को तवज्जो देने की कोशिश की गई। लेकिन तब तक ब्रहापुत्र में काफी पानी बह चुका था।

          अटल बिहारी वाजपेई के कार्यकाल में विदेश नीति ने फिर करवट ली जब लाहौर बस यात्रा के माध्यम से पाकिस्तान को दोस्ती का पैगाम देने की कोशिश की गई। लेकिन बदले में कारगिल मिला। बाद के दिनों में पोखरण में दूसरे दौर के परमाणु परीक्षण किये गये और अमरीकी प्रतिबन्धों का सफलतापूर्वक सामना किया गया। डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल को विदेश नीति के मामले मेंअदृश्य दशकही कहा जायेगा। प्रधानमंत्री अच्छे अर्थषास्त्री तो थे परन्तु एक राजनेता के रूप में अपनी छाप नहीं छोड़ पाये। फिर भीभारत-अमेरिका नागरिक परमाणु समझौताउनके कार्यकाल की एक उपलिब्ध मानी जायेगी।

          मई 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार ने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान सहित सार्क के सभी राष्ट्राध्यक्षों  को आमन्त्रित कर सबको चौका दिया तथा यह दिखाने की कोशिश  की थी कि भारत ठहरे हुए संबंधों को गति देना चाहता है। लेकिन पड़ोसी पाकिस्तान की नापाक हरकते जारी रहने सेसर्जिकल स्ट्राईकजैसे कठोर कदम भी उठाये गये। गौरतलब है कि मौजूदा दौर में विश्व  पटल पर नये शक्ति संतुलन उभर रहे है। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस ने उस परियाटी को संभालने की असफल कोशिश  की लेकिन वह अमेरिका के सामने टिक नहीं सका तथा आर्थिक रूप से कमज़ोर होकर समाजवाद का झड़ा छोड़ने पर मजबूर हो गया।

          इधर एशिया में आर्थिक मोर्च पर चीन का उदय हो रहा है। अपनी आक्रामक आर्थिक और व्यापारिक नीतियों से वह विश्व  व्यापार पर कब्जा करना चाहता है। पश्चिम के जो देश कभी विश्व  व्यवस्था को तय करते थे आज आपसी खींचतान में ही  उलझे है। अमेरिका में राष्ट्रपति ऐनाल्ड ट्रम्प का चुना जाना दुनिया के राजनीतिक पंड़ितो के लिए एक नया अध्याय है। चुने जाने के बाद ट्रम्प ने जिस तरह से विश्व -व्यवस्था से अपने हाथ खीचने आरम्भ कर दिये उसके दूरगामी परिणाम होंगे। नाटो गठबंधन के सदस्य देशों को उनके द्वारा कम अंशदान का उलाहना देना। पेरिस जलवायु समझौते से पलायन कर जाना। ब्रिटेन का यूरोपियन यूनियन से अलग हो जाना। ये कुछ ऐसे मुद्दे है जिनसे चीन को विश्व  शक्ति के रूप में अपना आगाज करने का मौका दे दिया।

          केन्द्र की मोदी सरकार से पूर्व की सरकारों ने भारत के पड़ोसी देशों एशिया-प्रशांत  क्षेत्र में बढ़ती दखलंदाजी के प्रति लापरवाही भरा नजरिया अपनाया। चीन ने नेपाल, मंयामार, बंगालादेश, मालदीव, श्री लंका मे अपने प्रभाव को बढ़ाकर लगातार भारतीय हितो पर कुठाराघात किया है और पाकिस्तान तो बचपन से ही चीन की गोद में खेलता आया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्थिति संभालने की कोशिश  में पूर्व सरकारों द्वारा प्रतिपादितलुक ईस्ट पॉलिसीके स्थान परएक्ट ईस्ट पॉलिसीद्वारा इस क्षेत्र के देशों के साथ चीन के समानांतर रिश्ते बनाने की कोशिश  की जाने लगी है चाहे दक्षिण चीन सागर मे तार्रवान के साथ तेल की खोज हो या वियतनाम को हथियारो का निर्यात। हाल ही में 17 सालों के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने नेपाल की यात्रा की है। बागलादेश के साथ 41 सालों से चला रहा भूमि-विवाद सुलझाया गया है।

          वर्तमान में हमारी विदेश नीति एक तरफा होकर संतुलनकारी है। यद्यपि अमेरिका से नजदिकीयाँ बढ़ रही है तो रूस से भी हमारा मेल-जोल जारी है योग का अतंराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता भारतीय विदेश नीति का महत्त्वपूर्ण आयाम है। पाकिस्तान के साथ जटिल रिश्तों के बावजूद खाड़ी के अन्य इस्लामीक देशों के साथ भारत के सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध है। पुलवामा आंतकी हमले के बाद इस्लामिक देशों के संगठन में भारतीय विदेश मंत्री को बुलाया जाना और पकिस्तान के विरोध को खारिज कर देना भारतीय विदेश नीति की बड़ी जीत है|  अफ्रीका के देश भी भारत की ओर आशा भरी नज़रों से देख रहे है।  हाल ही में भारत नेसंघाई सहयोग संगठनकी सदस्यता ली है। जिसमें चीन भी सदस्य है। इसके अलावाब्रिक्समें भी हम साथ-साथ कार्य कर रहे है। लेकिन जब ठोस निर्णय अपने हितो की रक्षा की बात हो तो हम चीन की महत्वकांक्षी परियोजनावन बेल्ट-वन रोड़का विरोध भी करते है।

चीन के साथ भूटान के डोकलाम पठार के इलाके मे भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच तनातनी चली थी चीन भारत को 1962 के युद्ध की याद दिलाता है तो चीन को यह सच्चाई जितनी जल्दी समझ में जाये उतना ही अच्छा है कि 1962 आज के भारत में बहुत अंतर है। यही कारण है कि भारत अपनेनो फ्रस्ट युजके परमाणु सिद्वांत में भी परिस्थितियों के अनुसार कुछ परिवर्तन का मन बना चुका है। डोकलाम का मुद्दा चीन द्वारा जानबुझकर डकसावे के लिए उठाया गया है। चीन ने अपनी आर्थिक और विस्तारवादी नीतियों के माध्यम से भारत के सभी पड़ोसियों को साधने की कोशिश  की है। चूकिं भूटान की रक्षा, विदेश नीति तथा कुछ हद तक अर्थव्यवस्था की जिम्मेदारी भारत की है। इसलिए चीन भारत और भूटान दोनों पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालने की कोशिश  कर रहा है। क्योंकिवन बेल्ट-वन रोड़का भारत द्वारा विरोध चीन के गले नहीं उतर रहा। चीन को डर है कि उसके अन्य विरोधी देश भारत के नेतृत्व में चीन के खिलाफ लामबंध हो जाये। चीन के कान हाल ही में हिन्द माध्यम में आयोजित भारत, अमेरिका और जापान द्वारा नौसैनिक युद्वाभ्यासमालाबार-2017से भी खड़े हो गये है। जिससे हिन्द महासागर में बढ़ती चीन की गतिविधियों पर एक सांकेतिक दबाव पड़ेगा।

          लीक से हटकर 70 सालों मे पहली बार भारत के प्रधानमंत्री ने इजराईल की यात्रा की है। दोनों समान परिस्थितियों के कारण सहयोग के कई क्षेत्रों में एक-दूसरे की विषेषज्ञता का लाभ उठा सकते है। भारत की विदेश नीति में आमूल चूल परिवर्तन के इस दौर में हमें राष्ट्रीय हितो को ध्यान में रखकर और इतिहास से सबक लेकर हर संभावना को टटोलना होगा। बदलती विश्व -व्यवस्था और शक्ति संतुलन इस दौर में भविष्य की राह फूक-फूक कर कदम रखने की है। 
         




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