बैनर महिमा (लघुकथा)




बैनर महिमा
 (लघुकथा )


आज भी सूरज पूर्व से ही निकला था। समय भी वही सवा छः के करीब रोज की तरह। टाउन-पार्क के सामने वाले होर्डिग पर खुद को हाथ जोडे टंगा देखकर राकेश उर्फ राका खुद को जमीन से कुछ उपर महसूस कर रहा था। करे भी क्यों नहीं ? आज मंत्री मुसद्दी लाल की फोटो की बगल में खड़े होकर दीपावली और भैया दूज की शुभकामनाओं के साथ वह सामान्य जन से 10 फीट ऊँचा हो गया था। वह होर्डिग पर खुद को देखकर अपने शरीर मे असामान्य रक्त-संचार महसूस कर रहा था।


आज पार्क में हर कोई उसे शीश झुकाता सा लगा। अरोड़ा व शर्मा जी, जो उसे ज्यादा भाव नहीं देते थे, उसे लगा वे आज उसकी ही चर्चा कर रहे होंगे। कई जानने वालों के फोन आने शुरू हो गये थे। सिर्फ 5 हजार के बैनर ने उसके ठहरे से जीवन का गियर बदल दिया था। 


घर पहुँचकर जब वह पूजा करने बैठा तो उसके मन-मस्तिष्क में 10×12 का वो बैनर पेस्ट हो गया था। उसने अनमने से मंदिर में सिर झुकाया, घंटी बजाई, आरती पढ़ी और शयन कक्ष के आदम कद आईने के सामने जाकर खड़ा हो गया। खुद को आईने में निहारा तो लगा जैसे वह बुत में बदल रहा है। वह बड़ा हो रहा है। सभी उसके सामने झुक रहे हैं। बुत परस्ती के संस्कार जो कहीं गहरे दफन थे आज वे नये संस्करण में सामने आ रहे थे। मंदिर और टाउन-पार्क का होर्डिग उसे आज मिला-जुला सा लगा। वह मंदिर के किसी कोने में अपने लिए जगह तलाश कर रहा था।

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