उत्तर-पूर्वी भारत और चीन की नज़र


North-East States
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उत्तर-पूर्वी भारत
का रणनीतिक महत्व 

पिछले कुछ समय से उत्तर-पूर्वी भारत और इसको जोड़ने वाले ‘सिलिगुडी गलियारे’ का क्षेत्र सबके आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। पश्चिम बंगाल के उत्तर में स्थित दार्जिलिंग जिला पं-बंगाल सरकार के आदेश को लेकर उग्र हो गया। इस आदेश में ममता सरकार ने पहली से दसवीं कक्षा तक बंगाली भाषा को अनिवार्य बना दिया। पहाड़ों और चाय बागानों का शहर दार्जिलिंग व उसके आस-पास के नेपाली बहुत क्षेत्रों के निवासी हिंसक आंदोलन पर उतारू हो गये। यह क्षेत्र अपनी पहचान के मुद्दे पर वर्षो से बंगाल से अलग राज्य गोरखालैंड के लिए प्रयासरत है। पूर्व मे सुभाष घिषिंग के नेतृत्व में तथा अब गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता विमल गुरंग ने भाषा के मुद्दे को लेकर गोरखलैंड की मांग फिर से जिन्दा कर दी। ये अलग आत है कि बाद में ममता सरकार ने इस आदेश  को वापिस ले लिया तथा बंगाली भाषा को ऐच्छिक बना दिया।
               लेकिन इस दौरान सिलिगुड़ी से गंगटोक को जोड़ने वाला एक मात्र मार्ग एन एच-10 कई दिनों तक प्रभावित रहा तथा इस दौरान सिक्किम शेष भारत के कटा रहा। खाद्य सामग्री, तेल आपूर्ति भी बाधित रही जिसके कारण आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान को छूने लगे थे। जिसके परिणामस्वरूप सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग ने ब्यान दिया कि सिक्किम का भारत में विलय चीन और बंगाल के बीच ‘सँडविच’ बनने के लिए नही हुआ था।
               सिलिगुड़ी गलियारा’ जिसे रणनीतिक भाषा मे ‘चिकननेक’ भी कहा जाता है, वह उत्तर-पूर्वी भारत को मुख्य भारतीय भू-भाग से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण क्षेत्र है। एक जगह पर तो यह मात्रा 27 कि.मी. चौड़ा रह जाता है। जिसके कारण इसका रणनीतिक महत्व बढ़ जाता है। चीन की कुदृष्टि भी इस क्षेत्र पर लगातार रही है। वर्तमान में डोकलाम का इलाका जहां भारत और चीन की सेनाओं के बीच गतिरोध जारी है यहां से ज्यादा दूर नही हो डोकलाम के मुद्दे के बाद चीन ने सिक्किम के भारत में विलय पर भी सवाल उठाने शुरू कर दिये। इसलिए उत्तर-पूर्व को जोड़ने वाला यह ‘गलियारा’ अति संवेदनशील हो गया है। इसलिए यहा के अस्थिर हालात व सीमा पर तनाव की स्थिति राष्ट्रविरोधी ताकतों को उकसावा दे सकती है।

उत्तर - पूर्वी भारत पर चीन की नज़र 

चीन उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में तनाव के नये-नये बहाने ढूँढकर भारत तथा अन्य पड़ोसी देशों पर दबाव बनाने की रणनीति पर कार्य कर रहा है। अप्रैल माह में बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा की अरूणाचल यात्रा का भी चीन ने विरोध किया था लेकिन भारत के अपने निर्णय पर अढ़िग रहने के बाद चीन ने अरूणाचल के पांच स्थानों का नाम चीनी तिब्बती भाषा में नामकरण कर दिया। अरूणाचल के निवासियों के लिए ‘नत्थी वीजा’ का मामला भी संबंधो में पेचीदगी पैदा करता है| उत्तर-पूर्व के क्षेत्र में घुसपैठ एक राजनीतिकरणनीतिक व सामाजिक मुद्दा रहा है। पूर्व की केन्द्र सरकारों ने एक तरफ प्रर्याप्त ध्यान नहीं दिया। इसी कारण कई क्षेत्रों में जनसाख्यिकी समीकरण बिगड़ गये है। असम के उग्रवादी संगठन ‘उल्फा’ के संघर्ष का एक मुख्य मुद्दा यह भी था। म्यंमार के रोहिंग्या मुसलमान और बंगलादेषी घुसपैठ इस क्षेत्र के भारतीय नागरिकों के लिए असुरक्षा की भावना का कारण बन रहे है।वर्तमान में एन. आर. सी. का मुद्दा भी इस क्षेत्र में गर्म है तथा कुछ क्षेत्रीय दल इस संवेदनशील मामले में भी राजनीति कर रहे है जो राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है |

उतर-पूर्वी भारत की सामाजिक संरचना 

        इस क्षेत्र में जनजाति आधारित समाज है। जातीय अस्मिता समाज में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। अक्सर मामूली सी बातों पर जनजातियों के बीच खुनी संघर्ष हो जाता है। हाँलाकि वर्तमान में इसमें काफी कमी आई है। लेकिन सरकारो को इस राख में दबी आग से चौकन्ना रहना चाहिए। पूर्वोत्तर क्षेत्र पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण यहां कानून-व्यवस्था भी एक मुद्दा है। जनजाति व क्षेत्र आधारित अतिवादी संगठन यहाँ से गुजरने वाले व्यवसायिक वाहनो से अवैध वसूली भी करते है। पूर्व में चाय बागानों से भी इस प्रकार की वसूली की खबरे आती रहती थी। जिनसे इन अतिवादी संगठनों की अर्थव्यवस्था चलती है। इस संगठनों को काबू में करने के लिए इस क्षेत्र में सेनाओं को कुछ इलाकों में शस्त्रसेना विशेष कानून (आफ्शा) का अधिकार दिया गया है। इस कानून के विरोध मे कई राज्यों में कई संगठन इसे खत्म करने की मांग करते रहते है। मणीपुर की इरोम शर्मिला इसी मुद्दे पर पिछले 16 सालों से अनशन पर थी जो 9 अगस्त 2016 को तोड़ दिया गया। प्रशासन और सरकारों को समय-समय पर स्थिति का आंकलन करते रहना होगा। सेना को विश्वास में लेकर जहाँ पर आफ्शा गैर-वाजिब महसूस होता है उसे वहां से अस्थायी रूप से हटा दिया जा सकता है। इससे स्थानीय जनजाति आबादी मे प्रशासन के प्रति विश्वास की बहाली हो सकेगी। विश्वास बहाली की राह में एक रोड़ा उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ देश के अन्य हिस्सों में होने वाला परायेपन का व्यवहार भी हैं। इस क्षेत्र के नागरिकों का चेहरा, रहन-सहन, स्वछंद जीवन शैली शेष भारतीयों से कुछ अलग है। जिससे वे भारतीय समाज में अलग से दिखाई देते है। वैसे तो भारत देश  विभिन्नताओं में एकता का देश है। लेकिन उत्तर और दक्षिण भारत में कभी-कभी उत्तर-पूर्व के लोगों से परायेपन का व्यवहार किया जाता है तथा उन्हें अजनबी नजरों से देखा जाता है। इसका एक कारण उस क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर होने वाला धर्मातंरण भी है जिससे संस्कृति और राष्ट्र के प्रति जुड़ाव में परिवर्तन आता है।

उत्तर-पूर्व भारत और मीडिया की भूमिका

हमारा राष्ट्रीय मीडिया मुख्यतः दिल्ली की गलियों तक सिमटा रहता है। दूरदर्शन के दिनों में भी उत्तर-पूर्वी राज्यों से संबंधित सांस्कृतिक नृत्य और जनजातीय खान-पान, रहन-सहन के कुछ कार्यक्रम दिखाकर इतिश्री कर ली जाती थी।आज भी उत्तर-पूर्व को मीडिया तभी तवज्जो देता है जब वहां कोई राजनीतिक उठापटक होती है या हिंसक आंदोलन और नाकाबंदी। पूर्वोतर में विकास का मुद्दा भी अहम् है तथा इसी से जुड़ा मुद्दा है रोजगार। इस क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र की एक-दो बड़ी औद्योगिक इकाईयाँ है। निजी क्षेत्र अभी भी इस क्षेत्र में अपनी इकाईयाँ स्थापित करने से कतराता है। जिसके कारण बेरोजगारी एक विकराल समस्या बन गई है। इस समस्या के कारण युवाओं के अतिवादी संगठनों की तरफ आकर्षित होने की संभावना बनी रहती है। इस क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव राजनैतिक तौर पर हुआ है। हाल के दिनों में अरूणाचल प्रदेश, मणीपुर, आसाम, त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें बनी है। अभी तक इस क्षेत्र में क्षेत्रिय दलों या कांग्रेस पार्टी की सरकारें होती थी। शिक्षा के स्तर में विकास के साथ-साथ संचार के साधनों तक सुलभ पहुँच के कारण इस क्षेत्र में राष्ट्रीयता का विकास हुआ है। क्षेत्रीय दलों की अस्थिरता और कांग्रेस पार्टी के कमज़ोर नेतृत्व के कारण भारतीय जनता पार्टी की दक्षिण पंथी विचारधारा इस क्षेत्र में अपना प्रभाव जमा रही है। पूर्व में यह क्षेत्र अतिवादी वाम संगठनों और विदेशी खासकर चीन द्वारा प्रायोजित विचाराधारा से प्रेरित संगठनों का गढ़ रहा है। ढोकलाम में चीन के साथ सीमा पर संघर्ष के कारण चीन अप्रत्यक्ष युद्ध के तरीके अपनाकर इस क्षेत्र को अस्थिर करने की कोशिश कर सकता है जिसके लिए हमारी सुरक्षा एजेसियों को सर्तक होने की जरूरत है। ताकि किसी किसी भी दुस्साहस का समय रहते पता लगाया जा सके तथा उससे समय रहते प्रभावी ढंग से निपटा जा सके। पड़ोसी देशों में चल रही उठापटक का भी उत्तर-पूर्वी के क्षेत्र पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। एक समय में बंगला देश से होने वाली घुसपैठ का असम की जनता पर व्यापक असर पड़ा था। कई इलाकों में जनसांख्यिकी आकड़ो में भारी परिवर्तन हो गया था। लेकिन घुसपैठ की समस्या में अब कुछ कमी आयी है तथा बंगला देष के साथ तिस्ता नदी के पानी को लेकर विरोधाभास को छोड़कर कई अन्य मुद्दे सुलझा लिये गये है। पड़ोसी देश नेपाल में राजशाही खत्म होने के बाद वामपंथी विचारधारा वाली सरकारो ने चीन के साथ संबंधों को तरजीह देकर भारत के हितों को नजर अंदाज किया है। जिससे भारतीय सीमाओं पर चौकसी बढ़ाने का समय आ गया है। क्योंकि एक तरफ चीन डोकलाम के बहाने भारत पर दबाव डालने का प्रयास कर रहा है वही दूसरी तरफ चीन भारत के अन्य पड़ोसी देशों को हवा दे रहा है।

केंद्र सरकार का दायित्व 

उत्तर-पूर्व में केन्द्रीय सरकार को अपनी सक्रियता बढ़ानी होगी ताकि इस क्षेत्र में विकास कार्यो के साथ-साथ सुरक्षा संबंधी आधारभूत ढाँचा सदृृढ़ किया जा सके। हम चीन से कैसे निपटते है यह तथ्य पाकिस्तान के साथ हमारी रणनीति की दिशा तय करेगा। क्योंकि वर्तमान में चीन-पाकिस्तान एक ही सिक्के के दो पहलु हो चुके है।



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