भारतीय रक्षा परिदृश्य और मेक-इन-इंडिया

भारतीय रक्षा परिदृश्य और मेक-इन-इंडिया
अर्जुन बैटल टैंक 


विश्व में भारत की सामरिक शक्ति 


भारतीय सेना विश्व  की तीसरी सबसे बडी सेना है। वायु सेना का स्थान विश्व  में चौथा है तो नौसेना विश्व  में सातवें स्थान पर है। विश्व  में सैन्य साजो-सामान व हथियारों के आयात में हम विश्व  में दूसरे स्थान पर है।2018-19 के बजट में सरकार ने 3 लाख करोड़ का प्रावधान किया है वर्तमान में हम अपनी जी.डी.पी. का 1.5 प्रतिशत रक्षा पर खर्च करते है। कुल रक्षा बजट का 40 प्रतिशत रक्षा खरीद पर खर्च करते है। हम अपनी रक्षा जरूरतों का 70 प्रतिशत विदेशों से आयात करते है। महज 30 प्रतिशत ही घरेलू उद्योगों में तैयार किया जाता है। रक्षा क्षेत्र में भारत के इतने विशाल बाजार को देखते हुए वैश्विक आयुद्ध सामग्री निर्माताओं के साथ-साथ घरेलू निर्माताओं के लिए भी असीम संभावनाऐं है।

रूस पर बढती निर्भरता के खतरे 


रक्षा क्षेत्र मे भारत का आयात अभी तक मुख्यतः रूस पर ही निर्भर रहा है। जिससे हम कुल आयात का 70 प्रतिशत आयात करते है। दूसरे स्थान पर अमेरिका है जिसमें 7 प्रतिशत आयात करते है। यू.के., जर्मनी, इजराईल, व इटली अन्य देश है। जहाँ से हमारा आयात होता है। पाकिस्तान अपने हथियारों व अन्य रक्षा खरीद का 51 प्रतिशत चीन से आयात करता है। अभी हाल के दिनों में रूस द्वारा पाकिस्तान के साथ सैन्य युद्ध अभ्यास तथा चीन से उसकी बढ़ती मित्रता के कारण भारत को सचेत होने की आवश्यकता है। विश्व  में समय समय पर बदलते मिजाज को देखते हुए किसी एक देश पर निर्भरता खतरे से खाली नही है। हमने विमान वाहक पोत एंडमिरल गोर्सकोव के मामले मे भी देखा है जिसे भारतीय नौसेना के बेडे मे आई.एन.एस. विक्रमादित्य के नाम से शामिल  किया गया है। रूस ने उसके दामों में नित नई बढ़ोतरी करके भारत की मजबूरी का फायदा उठाया था।

सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा इकाइयों की भूमिका 


देश की स्वतंत्रता के बाद उद्योग नीति मे रक्षा-क्षेत्र को सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित किया गया। आर्डिनेंस फैक्टरियों में सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा इकाइयों के माध्यम से रक्षा जरूरतों को पूरा करने का प्रयास किया गया। आज देश में 41 आर्डिनेंस फैक्टरियाँ है। 8 सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा ईकाइयाँ तथा 52 अनुसंधान प्रयोगषालाएं कार्य कर रही है। लेकिन लाल फीताशाही, समय के साथ तकनीक मे बदलाव व बजट की कमी के कारण हम रक्षा क्षेत्र मे स्वावलंबी ना बन सके तथा उत्तरोत्तर आयात पर अश्रित होकर रह गए।


               भारत को रक्षा क्षेत्र में अगर आत्मनिर्भर होना है तो उसे प्रधानमंत्री श्री नरेद्र मोदी की ‘‘मेक-इन-इंडिया’’ पहल रक्षा क्षेत्र में भी आत्म निरर्भता की दिशा में उठाया गया कदम है। इसके रणनीतिक और आर्थिक दोनों ही लाभ है। इससे एक तो विदेशी मुद्रा बचेगी तथा राश्ट्रीय सुरक्षा को सुनिष्चित की जा सकेगी। मेक-इन-इंडिया पॉलिसी के माध्यम से सरकार भारतीय उद्योग जगत को विनिर्माण क्षेत्र में निवेश नवाचार व प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढावा देती है। सरकार द्वारा निजी क्षेत्र को 222 आशय पत्र औद्योगिकी नीति एव संर्वधन विभाग द्वारा जारी किए जा चुके है। 150 कम्पनियों को औद्योगिक उत्पादन के लिए लाईसेंस जारी किए जा चुके है। 46 रक्षा क्षेत्र की कम्पनियों ने अपना उत्पादन भी शुरू कर दिया है। इन कम्पनियों में लार्सन एण्डट्रबों, टाटा ग्रुप, पीपापाव डिफेंस एंड ऑफशोर इंजिनियरिंग सिस्टमस, पीरामल सिस्टम एण्ड टैक्नोलोजी शामिल  है। जो युद्धक विमान, मानवरहित विमान, रेडार, इलैक्ट्रोनिक युद्धप्रणाली, बख्तरबंद गाडियां, नौवहन संबंधी प्रौद्योगिकी उत्पादन करने को अग्रसर है।

 रक्षा उपकरणों में ‘‘मेक-इन-इंडिया’’ अभियान को बढावा


रक्षा मंत्रालय ने स्वदेशी कम्पनियों से 82 हजार करोड़ रूपये के रक्षा उपकरणों की खरीद के लिए 94 समझौते किए है। स्वदेशी कम्पनियों से विमानों, हैलिकॉपटर, मिसाइलों, रडारों व अन्य उपरकणें के खरीद की योजना है। यह कदम रक्षा उपकरणों में ‘‘मेक-इन-इंडिया’’ अभियान को बढावा देने के लिए उठाया जा रहा है। इसके लिए सरकार ने रक्षा खरीद प्रक्रिया में प्रावधान दिये है। जिसमें वैश्विक खरीद की अपेक्षा ‘‘मेक-इन-इंडिया’’ को महत्व दिया जाता है।

               रक्षा क्षेत्रों में आत्मनिरर्भता के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा उत्पादन इकाईयों, आर्डिनेंस फैक्टरियों तथा निजी क्षेत्र की क्षमताओं के भरपूर उपयोग की रणनीति पर अमल शुरू हो गया है। इसके लिए लाईसेंसिग के नियमें को सरल और उदार बनाया जा रहा है ताकि स्वदेशी निजी कम्पनियों को विदेशी कम्पनियों से संयुक्त उपक्रम (जे0वी0) स्थापित करने को तरजीह दी जा रही है। जिससे उन्हे नई तकनीक हासिल हो सके।

भारत सैन्य उत्पादन के क्षेत्र में पूर्व में भी अपना लोहा मनवा चुका है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डी.आर.डी.ओ) द्वारा देश मे ही विकसित और निर्माण की गई 155 मि0मी0 की गन ‘धनुष’ जो हमारी आर्टिलरी के लिए विकसित की गई है इसका उदाहरण है। यह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। जिसे ‘‘देशी बोर्फोस’’ भी कहा जाता है। तीसरी पीढ़ी की टैंकरोधी मिसाईल ‘नाग’ की क्षमता 4 कि0मी0 की है।

               मल्टी बैरल रॉकेट लांचर ‘पिनाक’, जो एक साथ 12 गोलें दाग सकती है तथा रेंज 75 कि0मी0 तक की है। हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड  बनाया गया ‘‘ध्रुव’’ हैलिकॉप्टर व हल्का लडाकू विमान ‘तेजस, सेना, नौसेना, वायुसेना, बी.एस.एफ. के अलावा भारतीय तटरक्षक बल के लिए भी उपयोगी है। भारतीय सेनाओं के लिए स्वदेश निर्मित ‘अर्जुन टैंक’ जो हमारी रूस पर निर्भरता कम करेगा। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन द्वारा विकसित ‘आकाश’, ‘अग्नि’ व ‘पृथ्वी’ मिसाईलों के बल पर हम अपनी सुरक्षा को पुख्ता करने में सफल हुए है। अग्नि मिसाईल की मारक क्षमता को तो 7000 कि0मी0 तक बढ़ाया जा सकता है।

विश्व की दिग्गज़ कम्पनियों के साथ मिलकर संयुक्त उपक्रम स्थापित करने हेतु समझौते 


हम जानते है कि रक्षा क्षेत्र के नित नये तकनीकी परिवर्तन हो रहे है। भारतीय कम्पनियाँ ‘‘मेक-इन-इंडिया’’ मुहिम के माध्यम से दिग्गज़ कम्पनियों के साथ मिलकर संयुक्त उपक्रम स्थापित करने हेतु समझौते कर रही है। भारत सरकार ने रक्षा क्षेत्र एफ.डी.आई की सीमा भी बढाकर 49 प्रतिशत कर दी है। इसी क्रम में बोईंग कम्पनी तथा टाटा एडवांस सिस्टमस में समझौता हुआ है। जो मिलकर भारत में मानव रहित विमान बनाएंगें। रूस की कम्पनी ग्रीग्रोविविच फ्रिगेट के सहयोग से भारतीय कम्पनी पीपावाव डिफेंस युद्धपोत बनाएंगें। सफरन और भारतीय कम्पनी भारत फोर्ज़ मिलकर उच्च तकनीक के कलपूर्जे बनाएंगें। फ्रांसीसी कम्पनी दसाल्ट के साथ राफेल निर्माण के लिए रिलायंस डिफेंस का 22000 करोड़ का अनुबंध हुआ है। जिसमें देश में ही राफेल बनेगा और 74 फीसदी विमान निर्यात किए जाएंगें। भारत रूस के साथ मिलकर पहले ही सूपरसोनिक क्रुज मिसाईल ‘ब्रहोस’ बना रहा है तथा मई मे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दौरें के दौरान वायुयानों ओर ऑटोमोबाईल के क्षेत्र मे भी साथ काम करने के लिए बातचीत हुई है। जिनका निर्माण भी ‘‘मेक-इन-इंडिया’’ के तहत किया जाएगा।

स्वदेशी को भी बढ़ावा और विदेशी मुद्रा की बचत 


               हाल ही में स्वदेशी तकनीक से बनी बुलेट प्रुफ जैकेट को रक्षा मंत्रालय ने उत्पादन के लिए हरी झंड़ी दे दी है। प्रोफेसर शांतनु भौमिक द्वारा बनाई गई यह जैकिट सिर्फ 1.5 कि0ग्रा0 की होगी तथा 50 हजार रूपये कीमत मे तैयार हो सकती है जबकि  अमेरिका से आयात की जाने वाली बुलेट प्रुफ जैकेट 15 से 18 कि0ग्रा0 की होती है तथा प्रति जैकेट 1.5 लाख रूपये में आयात की जाती है। भारत प्रति वर्ष 20 हजार करोड़ रूपये बचा सकता है तथा जवानों के जीवन में भी इससे गुणात्मक सुधार होगा। ‘‘मेक-इन-इंडिया’’ कार्यक्रम के तहत इसका उत्पादन होगा।

               ‘‘मेक-इन-इंडिया’’ के माध्यम से देश सुरक्षा की लिहाज से न केवल आत्मनिर्भर बन सकेगा। बल्कि हम सैन्य-सामग्री का निर्यात कर विदेशी मुद्रा कमा सकते है। अंतरिक्ष के क्षेत्र में हमने अपनी क्षमताओं का लोहा विश्व  में मनवा दिया है। ‘‘मेक-इन-इंडिया’’ के माध्यम से देश में ‘‘विनिर्माण हब’’ बनाने में मदद मिलेगी। जिसमें हमारी कशल श्रम शक्ति को रोजगार के अवसर मुहैया होंगें। सरकार को निजी क्षेत्र की क्षमताओं का भरपूर उपयोग करते हुए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, आर्डिनेंस फैक्टरियों, अनुसंधान प्रयोगशालाओं की कार्य संस्कृति में भी तकनीकी, गुणात्मक व संगठनात्मक सुधार करना होगा। ताकि वे भी अपनी क्षमताओं को बढ़ा सकें तथा ‘‘मेक-इन-इंडिया’’ के माधयम से निजी क्षेत्र के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ सकें।





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