अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ती बैंकिंग अनैतिकता


अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ती बैंकिंग अनैतिकता
भारतीय रिज़र्व बैंक 

पिछले काफी दिनों से आर्थिक क्षेत्र की  ख़बरें मीडिया में छायी रही है | जिनमे कुछ सकारात्मक तो कई नकारात्मक रहीं है|भारत विश्व की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया तथा हमारी विकास दर विश्व की सभी अर्थव्यवस्थाओ में शीर्ष पर है | लेकिन आर्थिक क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण पहलु बैंकिंग व्यवस्था भी है | जहां से निरन्तर नकारात्मक और अनैतिक आर्थिक व्यवहार की ख़बरें आ रही है | जो देशवासियों तथा अंशधारकों के विश्वास को विचलित करती हैं|

बैंक और आर्थिक अपराध 


वर्ष 2016 में नोट्बंदी के दौरान बैंकिंग सेक्टर ने सराहनीय कार्य किया था लेकिन साथ ही साथ सार्वजानिक क्षेत्र तथा निजी क्षेत्र के बैंकों के कर्मचारी /अधिकारी अनैतिक कार्यों में लिप्त पाए गए थे | उसके बाद नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, विजय माल्या को जिस प्रकार से खैरात की तरह लोन बांटे गए और वे देश से फरार हो गए| यह घटना बताती है कि हमारी व्यवस्था में काफी कुछ खामी है जिसे दुरुस्त करने की तत्काल आवश्यकता है| इसी  खामी की वजह से हमारे देश में बैंकिंग सेक्टर का कुल एन.पी.ए. 10 लाख करोड़ हो गया है | इसी कारण भारतीय रिज़र्व बैंक ने सार्वजनिक क्षेत्र के ग्यारह बैंकों के खिलाफ तवरित सुधारात्मक कार्यवाही करते हुए उन बैंकों द्वारा  ऋण जारी करने पर रोक लगा दी | जिसके कारण केंद्र सरकार और रिज़र्व बैंक के बीच बेवजह विवाद भी उत्पन्न हो गया था। जनवरी 2019 में रिज़र्व बैंक ने बैंक ऑफ़ इंडिया, बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र , ओरिएण्टल बैंक ऑफ़ कॉमर्स आदि बैंकों से  त्वरित सुधारात्मक कार्यवाही सम्बन्धी कार्यवाही से  छुट दे दी क्योंकि एन बैंकों का एन.पी.ए रिज़र्व बैंक द्वारा तय मानकों पर आ गया था| बैंकों की वितीय हालात सुधारने के लिए केंद्र सरकार ने बैंकों को वितपोषण के तहत 85000 करोड़ रुपये भी दिए थे ताकि वे मांग के अनुसार ऋण प्रदान करते रहें और अर्थव्यस्था में तेजी बनी रहे|

एन.पी.ए  के माध्यम से बट्टे खाते का खेल 


बैंकों में नैतिकता संम्बधी प्रशनचिंह सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों तक सीमित नहीं है बल्कि निजी क्षेत्र के बैंक भी इसमें शामिल रहे है| पिछले कई महीनों से आईसीआईसीआई बैंक की पूर्व डायरेक्टर चंदा कोचर द्वारा विडियोकॉन कंपनी को दिया गया ऋण तथा बाद में उसे एन.पी.ए  के माध्यम से बट्टे खाते में डालने और उसमे हुआ कथित भ्रष्टाचार सुर्ख़ियों में रहा है | सीबीआई ने छापे की कार्यवाही करके उनके खिलाफ केस दर्ज कर लिया तो बैंक ने भी उनको बर्खास्त कर दिया | इस प्रकार बैंकिंग सेक्टर के एक सितारे को दाग लग गया| चंदा कोचर और विडियोकॉन का मामला आखिरी मान लेना भी भारी भूल होगी| अभी भी बहुत कुछ अलमारियों में कैद है जो देर सवेर बाहर निकलेगा|

वर्ष 2007-08 के दौरान वश्विक आर्थिक मंदी में  जहां अमेरिकी आर्थिक जगत की बड़ी बड़ी कम्पनियां दिवालिया हो गई थी तब भी भारतीय अर्थ तंत्र और बैंक सुरक्षित रहे थे | यह निवेशकों और ग्राहकों के विश्वास के कारण ही संभव हो पाया था | इसमें बैंकिंग नियामक तंत्र की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही था | आज सबसे बड़ी आवश्यकता अंशधारकों के विश्वास बहाली की है | क्योंकि नीरव मोदी और मेहुल चौकसी प्रकरण के बाद पंजाब नेशनल बैंक के शेयरों का का क्या हाल हुआ था यह सभी जानते है | 

देश के विकास में बैंकों की भूमिका 


बैंकिंग तंत्र अर्थवयवस्था की नीव होता है | अगर किसी देश की बैंकिंग व्यवस्था से विश्वास उठ गया तो यह देश के इतिहास में काला अध्याय होगा | केंद्र सरकार, रिज़र्व बैंक और अन्य  नियामक तंत्र की यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि वह सार्वजनिक और निजी  क्षेत्र के बैंकों में उन छिद्रों को बंद करें जिनसे अर्थव्यवस्था का जहाज डूबने का खतरा हो सकता है |भारत की 130 करोड़ आबादी को विकास के मौके प्रदान करना सरकार की कोशिश रहती है | डायरेक्ट बेनिफिट ट्रान्सफर तथा अन्य सामाजिक सुरक्षा सम्बन्धी योजनाओं के सफल क्रियान्वन के लिए बैंकों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है | इसलिए भविष्य में भारत के लिए बैंकिंग सेक्टर की नैतिकता सर्वोच्च स्तर पर रहनी चाहिए ताकि स्वदेशी तथा विदेशी निवेशकों का विश्वास भी कायम रहे |


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