अफगान शांति वार्ता की पथरीली राह और भारतीय हित




America-Taliban Peace Talks
America-Taliban Peace Talks


अफगानिस्तान का इतिहास अशांति और युधों का इतिहास रहा है | वर्तमान अमरीकी – तालिबान युद्ध भी पिछले 18 सालों से चल रहा है | जिसमे असंख्य अफगान नागरिक, तालिबान लड़ाके और अमेरिका के अगुआई में लड़ रही संयुक्त सेनाओं के हजारों सैनिक अपनी जान गवां बैठे है |


इतने बलिदानों और सैनिक संसाधनों के बाद भी अमेरिका को इस विदेशी भूमि पर निर्णायक जीत हासिल नहीं हुई है | केवल ओसामा बिन लादेन को पकिस्तान में मार देना या कुछ अफगान कमांडरों की मौत को अमरीकी सेना की सफलता नहीं माना जा सकता | तालिबानी विचारधारा अफगानिस्तान से ख़त्म नहीं हुई है बल्कि अमेरिकी सेना से सम्बद्ध एक अध्ययन दल ने अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया है कि अफगानिस्तान के अंदरूनी इलाकों में तालिबान दोबारा अपनी जड़ें जमाता जा रहा है | इसी का परिणाम है कि अमेरिका इस युद्ध को लम्बा नहीं खींचना चाहता तथा अंत में उसे भी तालिबान के साथ बातचीत की मेज पर आना पड़ा |


अफगानिस्तान में अमेरिका जहां अपनी भूमिका सिमित करना चाहता है वहीँ बदली परिस्थितिओं में चीन वहां पर अपनी उपस्थिति बढ़ाने का प्रयास कर रहा है | वह “चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे” की पहुँच अफगानिस्तान तक चाहता है ताकि मध्य एशिया तक चीन निर्मित सामान की पहुँच में आसानी हो सके | यह एक प्रकार से अमेरिका द्वारा वैश्विक पटल पर खाली की गई जगह को अपनी व्यापारिक गतिविधियों का केद्र बनाना चाहता है | क्योंकि अमेरिका की ताकत उसकी सैनिक शक्ति थी वही चीन की ताकत उसकी व्यापारिक शक्ति है |


अफगानी समाज कबीलाई समाज है जहां लोकतांत्रिक मूल्य अपनी जगह नहीं बना पायें है | आम अफगानी के मन में वहाँ की वर्तमान सरकार के प्रति उतना विश्वास नहीं है जितना क्षेत्रीय कबीलाई कमांडरों में है | अफगानिस्तान की तथाकथित सरकारों के मुखिया विदेशों में पढ़े-लिखे ही रहे है जिनकी अशिक्षित अफगानी जनता में कोई पैठ नहीं है | 1748 में अहमदशाह दुर्रानी के काल से लेकर ब्रिटेन और बाद के दिनों में सोवियत संघ का हस्तक्षेप सरकारों में तो रहा लेकिन क्षेत्रीय नियंत्रण पख्तून, उज्बेक, तजाकी और हजारा जातियों या कबीलों के सरदारों के अधीन ही रहा है |


एक मजबूत केन्द्रीय अफगान सरकार की कमी के परिणाम स्वरूप केन्द्रीय क़ानून व्यवस्था लचर रही है और सामाजिक नियंत्रण धार्मिक रीति-रिवाजों द्वारा संचालित रहा है | आधुनिक शिक्षा की कोई व्यवस्था न होने के कारण कट्टरपंथ को मदरसों के माध्यम से नफरत के बीज युवा पीढ़ी में बोने का मौका मिल गया जिससे तालिबान का जन्म हुआ | कबीलाई सेना को वेतन व अन्य सुविधायों के लिए अफीम की खेती धडल्ले से हो रही थी जिसे बाद के दिनों में तालिबान ने अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया |


भारत प्रारंभ से ही अफगानिस्तान में सिर्फ विकास और पुनर्निर्माण के कार्यों तक ही सिमित रहा है | वहाँ की संसद, अस्पताल, पुल, रेल व सड़क निर्माण का कार्य भारत ने अपने कर्मचारियों और अधिकारीयों की सहादत देकर भी पूरा किया है | अमेरिकी सरकार ने भारत को कई बार युद्ध में घसीटने का प्रयास किया लेकिन भारत ने इसे दरकिनार कर दिया | भारत इस मामले में रक्षात्मक रहा क्योंकि कश्मीर समस्या के चलते वह तालिबान से सीधे तौर पर भिड़ना नहीं चाहता था | कंधार विमान अपहरण के समय भी तालिबानी सरकार का भारत को सहयोग नहीं मिला था बल्कि वह पाकिस्तानी जासूसी एजेंसी आई.एस.आई की कठपुतली ही बनी रही |


पकिस्तान शीत युद्ध के दिनों से ही अमेरिका का पिछलग्गू बना हुआ था | लेकिन मध्य-पूर्व में उभरती वहाबी विचारधारा का प्रभाव पाकिस्तान व अफगानिस्तान में पड़ना शुरू हुआ | पाकिस्तान एक तरफ तो अमेरिकी सहयोग से सोवियत संघ के विरुद्ध तालिबान को हथियारों और डॉलर की सप्लाई कर रहा था | सोवियत सेनाओं के अफगानिस्तान से लौट जाने के बाद तालिबान निरंतर मजबूत होता चला गया और वह समय भी आया जब उसने काबुल पर अधिकार करके देश की सत्ता को अपने हाथों में ले लिया | तालिबान शासन के दौर में अफगानिस्तान एक लिहाज से मध्य युग में लौट गया था | महिलाओं पर अनेक प्रतिबन्ध लगा दिए गए आधुनिकता के विरोध के नाम पर समाज में दहशत का माहौल कायम किया गया | त्तालिबान के ओसामा बिन लादेन के सम्पर्क में आने के बाद जब 09/11 को वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हमले के बाद अमेरिका ने अफगानी तालिबान सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया तब पकिस्तान ने अमेरिकी मदद के नाम पर अरबों डॉलर वसूले लेकिन अमेरिका से डबल क्रॉस भी करता रहा| पाकिस्तानी छावनी एटबाबाद में ओसामा बिन लादेन का अमेरिकी बलों के हाथों मारे जाने के बाद तो पाकिस्तान बेनकाब हो गया था | डोनाल्ड ट्रम्प के सत्ता में आने के बाद पकिस्तान को दी जाने वाली अमरीकी मदद रोक दी गई और कई बार तो सार्वजनिक तौर पर पाकिस्तान को खरी खरी सुनने को मिली |


अमेरिका अफगानिस्तान के इस युद्ध को और लम्बा खींचना नहीं चाहता | अफगानिस्तान में 14000 अमेरिकी सैनिक अभी भी तैनात है | अमेरिकी जनता में भी रोष है तथा डोनाल्ड ट्रम्प भी अमेरिकी संसाधनों को फैलाना नहीं बल्कि समेटना चाहते है | तालिबान से अभी तक तीन दौर की वार्ता हो चुकी है | क़तर की राजधानी दोहा में अमेरिकी मुख्य वार्ताकार जलमय खलीलजाद और तालिबान वार्ताकारों की बातचीत के बाद अब फ़रवरी के आखिरी सप्ताह में पाकिस्तान में दोनों पक्षों की बातचीत तय थी  लेकिन पुलवामा में केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल की बस पर हुए आंतकी हमले के बाद पैदा हुए वातावरण के कारण इस्लामाबाद में होने वाली वार्ता टाल दी गई है | इसका एक कारण कुछ तालिबानी वार्ताकारों पर यात्रा सम्बन्धी अंतर्राष्ट्रीय पाबंधियाँ लगा होना भी कहा जा रहा है |


भारत इस वार्ता में अधिकारिक तौर पर शामिल नहीं है लेकिन अफगानिस्तान में भारत के पूर्व राजदूत अमर सिन्हा तथा पाकिस्तान में सेवा दे चुके पूर्व उच्चायुक्त टी. सी. ए. राघवन गैर-अधिकारिक तौर पर वार्ता में शामिल रहे है | भारत के लिए यह स्थिति गंभीर है क्योंकि एक तरफ तो यह इस क्षेत्र में शांति की दिशा में प्रयास है जिसका स्वागत होना चाहिए लेकिन इसके गंभीर परिणाम भी हो सकते है क्योंकि अफगानिस्तान में तालिबान दोबारा सत्ता में आयेगा तथा पाकिस्तान के साथ उसकी कट्टरपंथी जुगलबंदी इस क्षेत्र और विशेषकर कश्मीर के मामले में खतरनाक सिद्ध हो सकती है | तालिबान के मंसूबों का इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह अफगानिस्तान की वर्तमान सरकार को ही वार्ता में शामिल करने को तैयार नहीं है | भारत को इस समय फूक-फूक कर कदम रखने की जरुरत है क्योंकि पड़ोस की आग झुलसा भी सकती है |








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