शहीद (लघुकथा)


martyr
शहीद
शहीद का शव तिरंगे में लिपटा था और मंत्री  जी का धुँआधार भाषण जारी था।

"धन्य है वो माँ जिसने ऐसे बहादुर बेटे को जन्म दिया। जिसने मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दे दी। हमें इनकी कुर्बानी पर गर्व है।" फिर उसने बड़ी मुश्किल से याद की गई पंक्तियाँ दोहरा दीं-

"शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले........"

इसी के साथ सारी भीड़ नारे लगाने लगी -

"शहीद बलवान सिंह अमर रहे।"

मंत्री जी फिर शुरू हो गये - इस परिवार की पूरी जिम्मेवारी आज से मेरी है। अपने बेटे राकेश की तरफ इशारा करके कहा-"आज तक मेरा एक ही बेटा था आज दो हो गये हैं।" इतना कहकर शहीद के बेटे को अपनी गोद में उठा लिया।

ऐलान हुआ कि सरकार की तरफ से शहीद के परिवार को दस लाख रुपये व शहीद की विधवा को ताउम्र पेंशन दी जायेगी। प्रशासन ने सैल्यूट ठोका, हवाई फायर किये गये। अंतिम संस्कार के बाद भीड़ छँटने लगी।

घर पहुँचकर मंत्रीजी का लड़का राकेश कहने लगा-"पापा, मैं भी सेना में भर्ती होना चाहता हूँ ताकि मातृभूमि की रक्षा कर सकूँ।"

इतना सुनते ही मंत्री जी के चेहरे की रंगत उड़ गई। क्रोध में आकर बोले-"तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया। फौज में भर्ती होना है। ये हमारा काम नहीं, बल्कि गरीब किसान-मजदूरों के बेरोजगार बेटों का काम है। हम तो उन्हें श्रद्धांजलि दे सकते हैं। शहीद दूसरों के घर में ही अच्छे लगते हैं।"

मंत्री जी के चेहरे पर बेटे को मुखौटा साफ़ नज़र आ रहा था |

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