किसान की दशा और कर्ज माफी का जिन्न

Farm-distress
Indian Farmer

पिछले कई महीनों से देश के विभिन्न हिस्सों में किसान आन्दोलन हो रहे है। जिनमें कई शांतिपूर्ण तथा कई हिंसक रहे है। तमिलनाडु के किसानों द्वारा दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर काफी समय तक धरना दिया गया। इस दौरान कई कारणो से यह आन्दोलन राष्ट्रीय-अन्र्तराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बना लेकिन सरकार की तरफ से कोई विशेष आश्वाशन न मिलने के कारण असफल रहा। केन्द्र सरकार को इस आन्दोलन में षड्यंत्र दिखाई देता था। इनकी मुख्य मांग कर्ज माफी ही थी। उसके कुछ दिनों बाद महाराष्ट्र में अहमदनगर जिले के कुछ गाँवों के किसानों से शुरू हुआ आन्दोलन देखते ही देखते पूरे महाराष्ट्र में फैलने लगा तो मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड्नविश ने रात भर जाग कर किसानो को कर्ज माफी का वायदा कर आन्दोलन को शांत किया। यह अलग बात है कि उन्हें इसमें शिव  सेना और एन.सी.पी. की राजनीति नज़र आ रही थी। आन्दोलन साथ लगते मध्यप्रदेश में भी फैल गया जहां इस साल दलहन की बंपर फसल हुई थी। सरकार द्वारा अरहर का सर्मथन मूल्य 5050/- प्रति क्विंटल तय किया गया था लेकिन अधिकाश किसानों को 4200/- प्रति क्विटंल का भाव ही मिल पा रहा था। किसानों की नाराज़गी का एक कारण यह भी था कि भरपूर फसल की संभावना के बावजूद सरकार ने 27.8 लाख टन अरहर की दाल का आयात 10114/- रुपये प्रति क्विटंल की दर से आयात किया। इससे आन्दोलन हिसंक हो गया तथा मंदसोर जिले में पाँच किसानों की पुलिस के साथ हिसंक झड़पों मे मृत्यु हो गई। पूर्व मुख्यमंत्री शिव  राज चैहान को आन्दोलन को शांत करने के लिए काफी प्रयास करने पड़े तथा आन्दोलन में यहां भी विपक्ष का हाथ माना गया। इस तरह से किसान आन्दोलन की यह आंच राजस्थान, हरियाणा व पंजाब तक जा पहुँची। एक नज़र में मध्य तथा उत्तर भारत के किसान आन्दोलनरत है। उनकी मांग फसलों के उचित मूल्य व कर्ज़ माफी ही हैं।
भारत एक कृषि प्रधान देश हैं। देश की 69 प्रतिषत आबादी कृषि पर निर्भर है और देश के कई उद्योग भी पूर्ण रूप से कृृषि पर ही आश्रित है। देश के कुल रोज़गार का 56 प्रतिषत कृषि क्षेत्र पैदा करता है। जी.डी.पी. में कृषि का योगदान 16 प्रतिषत है और निर्यात में महज 10 प्रतिषत। अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.1 प्रतिषत है लेकिन कृषि की विकास दर 4 प्रतिषत ही है। इन सारे आकड़ों से ज्ञात होता है कि कृषि देश के लिए अति महत्त्वपूर्ण है। किसानों के आन्दोलन को महज विपक्ष की राजनीतिक चाल समझ कर सरकार दरकिनार नहीं कर सकती।
किसानों की मुख्य मांग कर्ज माफी तथा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों  को लागू करने की है। उत्तर प्रदेश की विधानसभा चुनावों के दौरान कर्ज़ माफी का वायदा भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने किया था तथा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करना वर्ष 2014 के भारतीय जनता पार्टी के घोषणा-पत्र में शामिल था। बी.जे.पी. शासित अन्य राज्यों की जनता का तर्क है कि अगर उत्तर प्रदेश के किसानों का कर्ज़ माफ़ हो सकता है तो उनका क्यों नहीं। लेकिन कर्ज़ माफी किसान की समस्या का हल नही हो सकती। यह केवल फौरी तौर पर राहत दे सकती है। प्रसिद कृषि वैज्ञानिक डा. एम.एस. स्वामीनाथन ने वर्ष 2006 में सौंपी अपनी अन्तिम रिपोर्ट में लागत मूल्य से 50 प्रतिषत अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की सिफारिश की गई हैं। इसके अलावा किसानो को कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध करवाया जाये। अगर कोई किसान ऋण की पुनः भुगतान की स्थिति में नहीं है तो उसका ऋण माफ कर दिया जाये। इसक अलावा फसल बीमा, सिंचाई सुविधाएं तथा भूमि सुधार संबंधी कई कदम उठाने की सिफारिश की गई थी।

एन.एस.एस.ओं.के आंकड़े


सरकार मृदा कार्ड, प्रधानमंत्री सिंचाई योजना, फसल बीमा, ई-मंडी जैसी योजनाओं के नाम पर अपनी पीठ थपथपा रही है। लेकिन सरकार द्वारा घोषित वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए किसान को कर्ज़ नहीं आमदनी चाहिए। अगर आमदनी ही नही होगी तो किसान कर्ज़ के दुष्चक्र में फंसता ही चला जायेगा और बार-बार उसे कर्ज़ माफी के लिए सड़कों पर आना पड़ेगा जो देश में किसान दोनों के ही हित में नही है। वर्ष 2014 के एन.एस.एस.ओ. के आंकड़ों के अनुसार किसान परिवार की औसत मासिक आय 3078/- रुपये है अगर गैर कृृषि कार्यो से आय को भी जोड़ लिया जाये तो यह महज 6000/- रुपये मासिक है। इतनी कम आमदनी में किसान कर्ज़ को उतारना तो दूर वह जीवन की न्यूनतम आवश्यकताएं भी पूरी नहीं कर सकता। सरकार को देर-सवेर स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करना ही पड़ेगा। समाज के दूसरे वर्गों की आय और किसान की फसल के मूल्यों में बढ़ोतरी मे ज़मीन आसमान का फर्क है। 

हरित क्रांति और उसका प्रभाव

हरित क्रांति के माध्यम से हम खाद्यान्न उत्पादन आत्म-निर्भर ही नहीं हुए बल्कि कुछ मामलों में हम निर्यात की स्थिति में भी आ चुके हैं। यह समय कृषि संबंधी प्राथमिकताओं को एक बार फिर से तय करने का है। पंजाब और हरियाणा में धान का रकबा बढ़ता जा रहा है। इसका एक कारण यह है कि इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल जाता है। लेकिन यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि इस क्षेत्र में एक किलो धान उपजाने के लिए 5089 लीटर पानी की खपत होती है। जबकि पष्चिम बंगाल में उगाने के लिए महज 2713 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। इसके परिणास्वरूप पंजाब व हरियाणा केन्द्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार 160 से 172 प्रतिषत ज़्यादा भूमिगत जल का दोहन कर रहे हैं। दोनों राज्यों के ज़्यादातर ब्लाक ‘डार्क जोन’ घोषित हो चुके है। इसका एक इलाज फसलों का विविधीकरण हो सकता है लेकिन गेंहू-धान को छोड़कर दूसरी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य न मिल पाने के कारण हम अपने भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। दूसरी समस्या भी हरित क्रांति से ही जुड़ी हैं। ज़्यादा उपज वाली फसलों में रासायनिक खादों व ज़हरीले रसायनों का अत्याधिक प्रयोग आम बात हो गयी है। ज़मीन की तासीर इस प्रकार की हो गई है कि पिछले वर्ष की अपेक्षा अधिक रासायनिक खाद की जरूरत पड़ती है। इससे लागत मूल्य तो बढ़ता ही है साथ ही साथ हम हमारी ज़मीन को भी ज़हरीला कर रहे हैं। जिससे कैन्सर के रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है। इंड़ियन कांउसिंल आफ मेडिकल रिसर्च ने भी माना है कि हरियाणा में तम्बाकू के बाद पेस्टीसाईड कैन्सर का सबसे बड़ा बन गया हैं। हम पैदावार बढ़ाने की होड़ में बिमारियों की फसल उगा रहे है। पोषण के नाम पर शरीर में खतरनाक कैमिकल जा रहे हैं। 

जैविक कृषि भी है समाधान 

सरकार को इस प्रकार के प्रयासो को प्रोत्साहन देना चाहिए। जिससे किसान जैविक तथा प्राकृतिक खेती की तरफ आकर्षित हो। किसानों को जैविक खेती के बारे में प्रशिक्षण , उत्पादों का प्रमानिकरण व मार्केटिंग के बारे में अवगत कराने के लिए सरकार को अधिक से अधिक प्रयास करने चाहिए। जी.एम. फसलों का भी इसी से जुड़ा मामला है। बी.टी. काॅटन पर सफेद मक्खी के कारण किसानों को हजारों करोड़ का नुकसान हुआ था। अभी जी.एम. सरसों को लेकर भी कुछ सुगबुगाहट शुरू हो गई है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसानों के परम्परागत बीजों की रक्षा हो सकें। जी.एम. सरसों के सभी पहलूओं पर अध्ययन किए बिना इसके उत्पादन की मंजूरी देने की जल्दबाजी किसानों के मन में संदेह पैदा कर रही है।कृषि क्षेत्र में खाद्यप्रसंस्करण, डेयरी व मूल्य संवर्धन की दिशा  में उतना कार्य नही हो रहा जितना अपेक्षित है। इसे महज सरकारी योजनाओं की खानापूर्ति समझकर सफल नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए किसान कल्ब, कृृषि विज्ञान केन्द्र, कृषि विष्वविद्यालय, राज्य और केन्द्र सरकारों को मिलकर प्रयास करने होंगे। फल व सब्जियों की अधिकता की दशा में भंडारण गृह, शीत गृह, ढुलाई खर्च में कमी, अद्योसंरचना संबंधी सुविधाओं पर सार्वजनिक व निजी क्षेत्र द्वारा निवेश में बढ़ोत्तरी करनी होगी।

क्या कर्जमाफी समाधान है?


कर्ज़ माफी किसानों की समस्याओं की फौरी तौर पर राहत हो सकती है लेकिन इलाज नहीं। कृषि के बारे में सरकार को एक बार फिर से अपनी प्राथमिकतायें तय करनी होगी। इसके लिए एक समग्र की आवश्यकता है जिसमें केवल नौकरशाहों और कृषि वैज्ञानिकों की भूमिका ना रहे अपितु किसानों, सामाजिक संगठनों व इस क्षेत्र से जुडे़ सभी व्यक्तियों की सहभागिता सुनिश्चित करने के प्रयास किये जाने चाहिए अन्यथा कर्ज़ माफी का जिन्न फिर-फिर अपना सिर उठायेगा।






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