भारत का आर्थिक परिदृश्य

   

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Indian Economy
पिछले दिनों कारोबारी सुगमता के वैश्विक इंडैक्स में भारत ने विश्व रैंकिग में 130 स्थान में सीधे 100 वें स्थान पर पंहुचकर एक लंबी छलंाग लगाई। अंतराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिग एजेंन्सी मूडीज ने भी तेरह वर्षो के बाद भारत की अर्थव्यवस्था को बी...से बी...की श्रेणी में रखकर आर्थिक विकास को मान्यता दी है। भारतीय शेयर बाजार के सूचकांक सेन्संेक्स 33 हजारी  निफ्टी दस हजारी हो रहे है। विदेशी मुद्रा भंडार 400 अरब डालर के आस-पास है। मंहगाई नियंत्रण में है। भुगतान संतुलन सुधार की दिशा में है। विश्व बैंक के लाजिस्टिक इंडैक्स में भी 19 स्थानों का सुधार हुआ है तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भी भारत 32 स्थान उपर आया हैं विश्व बौद्विक संपदा संगठन की आर्थिक प्रक्रिया में नई खोजे नवीनीकरण में 21 स्थानों का सुधार हुआ हे। 

विकास दर के मोर्चे पर भी उत्साहजनक खबरे रही है। जिसमें माना जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था नोटबंदी जी.एस.टी के संरचनात्मक बदलाव से उभर चुकी है। चालू वित्त बैंक की दूसरी तिमाही मे सकल घरेलू उत्पाद की दर 6.3 प्रतिशत रही है।     इस आशावादी पृष्ठभूमि में हमें यह देखना होगा कि कहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कामेक इन इंडियाका सपना आज के आर्थिक परिदृश्य से ओझल तो नही हो रहा। इसी सपने को लेकर देश के युवाओं के लिए प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना भी खूब जोर-शोर से चलाई गई। लाखों युवाओं के चेहरे पर आशा का भाव दिखाई दिया। लेकिन अब जब हम स्थितियों का मूल्यांकन करते है तो ऐसा लगता है वर्तमान आर्थिक नीतियाँ घरेलू मोर्चे की सच्चाई एक दूसरे के विपरित दिशा मे जाती दिखायी देती है।  

   यह माना गया था कि विदेशी निवेशक तेजी से बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेश करेगें तथामेक इन-इंड़ियाके माध्यम  से हम भारत को विश्व कानिर्माण हबबना सकते है। इन उद्योगों के लिए कुशल कामकारों की पूर्ति हेतु प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना शुरू की गई। लेकिन वर्तमान में प्रशिक्षण रोजगार के अनुपात के आकड़ों का मिलान किया जाये तो यह ऊँट के मुँह में जीरे के समान है। विकास के लबे-चौंड़े आँकड़े अखबारों की हैडलाईन बनते रहे लेकिन युवा अभी अपने सर्टिफिकेट के साथ रोजगार चाहने वालो की लाइनों मे ही खड़ा रहा। 

विदेशी निवेश के नाम पर जो भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया वह दरअसल सेवा क्षेत्र तथा उन तकनीकी क्षेत्रों में आया जहां तुरंत पैसा कमाया जा सकता है। आटोमेशन (स्वचालन) के नाम पर सेवाये ंतो दी जा रही है लेकिन रोजगार सृजन नहीं हो पा रहा है जिसमें घरेलू उद्योगों का अधिग्रहण करने के उपरांत तकनीक के माध्यम से स्थानीय लोगों को रोजगार से वंचित किया जा रहा है।     हमारे नीति निधारकों को यह सोचना होगा कि क्या यही आर्थिक विकास का माडल है जिसके जरिये एक युवा भारत के रोजगार की आशाओं की पूर्ति की जा सकती है।

क्या यहीनये भारतका रास्ता है जहां पर रोजगार वित्तिय विकास देश को चिढ़ा रहा है। यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि भारत के तथाकथित नीति-निर्माता विदेशों की नकल पर आधारित नीति बनाते रहे है। विदेशी संस्थाएं व्यापार सुगमताजी.डी.पी.श्रम नियमों में सुधार का ढ़िढोरा अपने फायदे के लिए पीट रहे है। हमें तथ्य को थोड़ा गहरे जाकर समझना होगा। क्या हम ये नहीं समझ पा रहे कि बिट्रेन यूरोपीयन युनियन से क्यों अलग हुआजबकि वहां की सताधारी विपक्षी पार्टियाँ यूरोपीयन यूनियन मे बने रहने के पक्ष मे थी। जरा याद करे डोनाल्ड ट्रम्प को नतीजो से पहले किस चुनावी सर्वेक्षण ने जितवाया थाक्या इस दोनों घटनाओं के पीछे रोजगार जैसे मुद्दे की अपनी भूमिका नही थीहमें वैश्वीकरण के नाम पर जनता बाजार के हवाले करने का कोई हक नहीं है। सरकारों की अपनी भी जिम्मेवारी रहती। शिक्षास्वस्थ्यरोजगार से सरकारें मुहँ नहीं मोड़ सकती |

हमें जितना जल्दी हो सके अपनी समसामयिक परिस्थितियों का मूल्यांकन करते हुए विदेशी निवेश आर्थिक नीतियों में परिवर्तन कर उनको रोजगारोन्मुख बनाये उतना ही हम फायदे में रहेंगे। वरना रोजगार विहिन समाज युवा किस दिशा में जायेगा क्या यह भी किसी समाज शास्त्री को बताना पड़ेगा। सामाजिक विचलन की स्थिति में कानून व्यवस्था के नाम पर एफ.डी.आई. भी काम नही आयेगी।   विश्व बैंक कुल मिलाकर विकसित देशों की आवाज़ है। जो चाहते है कि विकासशील देश अपने घरेलू बाजारों को और अधिक विदेशी पूंजी के लिए खोले ताकि उनकी बहुराष्ट्रीय कपंनियाँ यहां खुल कर अपना खेल खेल सकें। लेकिन खुली अर्थव्यवस्था तथा बहुपक्षीय व्यापार की पैरवी करने वाले विकसित देश क्या अपने बाजारों को भारतीय कृषि उत्पादोंदवाईयों को कडे वैश्विक मापदड़ो के नाम पर रोकने का काम करते है तथा घरेलू रोजगार संरक्षण के नाम पर भारतीय आई.टी. कर्मियों को विभिन्न प्रकार के अवरोधों का सामना करना पड़ता है। 

विश्व संहिता की परवाह अगर हम करते है तो यह विकसित देशों को भी करनी होगी।अमेरिका जैसा देश खुद तो पेरिस जलवायु समझौते से अलग होते हुए एक क्षण के लिए भी नही सोचता लेकिन विदेशी निवेश के नाम पर यहां हवा-पानी के प्रदूषण से भारतीय जनता को जो स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण ईलाज के लिए अप्रर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं संसाधनों का प्रावधान भी क्या एफ.डी.आई से ही होगा?     क्या यह बात सरकारों को नही पता कि अधिकतर एफ.डी.आई. चेन्नईमुंबई या दिल्ली मे ही हो रहा है|

सरकारों को एफ.डी.आई. आवेदनो की मंजूरी उनके द्वारा रोजगार सृजन की संभावना को ध्यान में रखकर देनी चाहिए। इसमें इस बात का भी विशेष ख्याल रखा जाना चाहिए कि एफ.डी.आई. केवल कुछ शहरों तक सीमित रहकर पूर्वी-भारत तथा पिछड़े राज्यों में भी समान रूप से अपनेे उद्योग स्थापित करें जिससे देश में समान विकास की अवधारणा को संभव बनाया जा सके। एफ.डी.आई. और रोजगार का एक अन्य पहलू यह भी है कि एक विस्तृत अध्ययन इस बात का भी किया जाना चाहिए कि एफ.डी.आई. के माध्यम से देश के संसाधनों का कितना दोहन किया गया तथा कितना लाभांश विदेश में भेजा गया। इसके आधार पर ही भविष्य में विदेशी निवेश संबंधी नीति के बारे में पुर्नविचार संसोधन किया जाना चाहिए।    

 इस तथ्य पर विशेष बल दिया जाना चाहिए कि व्यापार सुगमता का जो ढ़िढोरा पीटा जा रहा है वह सिर्फ विदेशी निवेशकों तक तो सीमित नही है। क्या स्वदेशी निवेशकों उद्योगों को भी वे सुविधायें समान रूप से मिल पा रही है। ऐसा तो नहीं कि विदेशी निवेश आमंत्रित करने के लिए दीये तले अंधेरा रह जाये तथा हम विदेशी निवेश की चकाचौंध में अपने घरेलू उद्योग का उपेक्षित कर दे।

 आधारनोट बंदीजी.एस.टी.श्रम सुधारडायरेक्टर बैनिफिट ट्रांसफररेराडिजिटल भुगतानबैंकों को पुर्नपुंजीकरण आदि अर्थव्यवस्था के सकारात्मक कदमों का लाभ घरेलू उद्योगों को भी मिलना चाहिए। हमें आर्थिक नीतियाँ इस प्रकार की बनानी होगी किमेक इन इंडियातथान्यू इंडियामहज नारेबाजी लगे बल्कि ठोस रूप से धरातल पर भी कुछ परिवर्तन महसूस हो अन्यथा युवा भारत खुद को ठगा महसूस करेगा। यह भी समय सिद्व है कि काठ की हांडी बार-बार नही चढ़ती।

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