व्यापार युद्ध से चौराहे पर विश्व-व्यवस्था


अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध
अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध 

वर्तमान विश्व-व्यवस्था दो राहे से चौराहे पर आ खड़ी हुई है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्पष्ट रूप से दो ही रास्ते थे। सोवियत संघ के नेतृत्व में लामबंध साम्यवादी और अमेरिका के पूंजीवादी दृष्टिकोण से प्रेरित उसके साथी। साम्यवाद अपने ही खोदे गड्डे में दफन हो गया। पूंजीवाद अतंराष्ट्रीय मुद्रा कोष व विश्व व्यापार संगठन का मुखौटा लगाकर दुनिया भर में छा गया। मगर इसकी नकेल पश्चिम के ही हाथों से चीन छिनने को बेकरार है। जहां पर पूंजीवाद और मार्क्सवाद का घालमेल है।
 नई विश्व-व्यवस्था चौराहे पर खड़ी होकर ग्रीन-सिग्नल का इंतजार कर रही है। इसके एक तरफ अमेरिका और उसका अविश्वसनीय राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प खड़ा है तो दूसरी तरफ उतर कोरिया का सनकी तानाशाह किम जोंग। इसी चौराहे पर विश्व में महाशक्ति घोषित होने की हसरत पाले चीन भी है तथा एक ओर इस्लामी आतंकवाद। विश्व व्यवस्था के इस चौराहे पर एक प्रकार से शंतरज की बिसात बिछा दी गई हैं शह और मात के खेल मे इतना घालमेल है कि सामने वाला खिलाड़ी अपने सफेद मोहरों को छोड़कर दुश्मन के काले मोहरों से खेलने लग जाता है।

अमेरिका और चीन के बीच उत्तर कोरिया का पेंच 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जो अपने चुनाव के दौरान चीन को पानी पी-पीकर कोसता था आज वही अमेरिका उतर कोरिया को साधने के लिए चीन के साथ गलबहियाँ कर रहा है। चीन के भी अपने स्वार्थ है। वह कभी नहीं चाहेगा कि अमेरिका कभी चैन से बैठे। चीन का मानना है कि अगर उतर-कोरिया का संकट खत्म हो गया तो किम जोंग की सत्ता चली जायेगी। दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के एकीकरण की मांग उठेगी। जिससे कोरियाई प्रायद्वीप में चीनी हस्तक्षेप और व्यापार खत्म हो जायेगा। चीन को लगता है कि उत्तर कोरिया बुरा सही पर दुश्मन का दुश्मन तो है। इस लिहाज से उसे अपना माना जा सकता है। अमेरिका को लगता है कि चीन से बाद में निपटा जा सकता है। पहले किम जोंग की मिसाईलों का मुँह तो मोड़ लिया जाये चाहे इसके लिए दो-चार दिन एक दुश्मन को गले लगाना पड़े। उत्तर कोरिया का तानाशाह हंस रहा है क्योंकि उसे पता है कि परमाणु क्षमता और बैलिस्टिक मिसाईलों से लैंस होने के कारण अमेरिका उस पर सीधी सैन्य कार्यवाही करने से बचेगा। केवल आर्थिक प्रतिबंधों से काम चलाना पड़ेगा। उत्तर कोरिया हर दिन अमेरिका के मित्र देशों जापान और दक्षिण कोरिया को डराता रहता है। दक्षिण कोरिया ने अपनी सुरक्षा हेतु मिसाईल रोधी सिस्टम ”थाड“ अपने यहाँ स्थापित कर लिया। इस प्रोजेक्ट के लिए वहाँ की एक कंपनी ‘लोटो’ ने भी कुछ जमीन मुहैया करवा दी। इस ब्रांड के कुछ स्टोर चीन में भी खुले थे। चीन ने ‘लोटो’ कंपनी पर हास्यास्पद आरोप लगाकर उसके स्टोरों को बंद करवा दिया। लोटो कंपनी अब चीन से अपना व्यापार समेट रही है। चीन की यह कार्यवाही कुछ-कुछ उत्तर-कोरिया की पीठ पर हाथ रखने जैसी है।

व्यापार के बहाने सुपर-पॉवर बनने की ललक

जापान के द्वीपों के आसमान से हर दिन कोई न कोई किम जोंग की मिसाईल गुजरती है। जापान का अमेरिका के साथ सुरक्षा समझौता है। लेकिन अमेरिका ‘ट्रम्प काल’ में खुद को वैश्विक मामलों से समेट रहा है। डोकलाम विवाद के दौरान जापान द्वारा भारत के पक्ष में वक्तव्य देने से भी चीन नाराज है। इस क्षेत्र में चीन और उत्तर कोरिया की जुगलबंदी तथा अमेरिका का अविश्वस्नीय रवैया जापान को एक अलग रणनीति बनाने के लिए सोचने पर मजबूर कर रहा है। जापान ने बहुत सोच-समझकर ही एशिया की एक महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में भारत की तरफ हाथ बढ़ाया है। प्रधानमंत्री शिंजो आबे और मोदी के बीच इस दौरान कई वार्ताओं के साथ-साथ व्यक्तिगत समझ भी विकसित हो चुकी है। चीन की ‘वन बेल्ट-वन रोड (ओबोर) की महत्त्वाकाक्षी परियोजना के समान्तर ”एशिया अफ्रीका विकास गलियारे“ के निर्माण के लिए भारत और जापान ने हाथ मिला लिया है। जिसमें दोनों देश एशियाई और अफ्रीकी देशों में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर काम कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि भारत ने ”चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे“ के विरोध स्वरूप ओबोर परियोजना का बहिष्कार किया था। चीन की हिन्द महासागर और बंगाल की खाड़ी में बढ़ रही नौसैनिक गतिविधियों के मध्यनजर भारत-जापान-अमेरिका ने मिलकर इस समुद्री क्षेत्र में मालाबार-2017 नाम से नौसैनिक अभ्यास किया है। अब सिगांपुर और आस्ट्रेलिया भी इस नौ सैन्य अभ्यास में सयुक्त अभ्यास के लिए उत्सुक है। चीन जिस प्रकार से दक्षिण चीन सागर के क्षत्र में मनमानी चला रहा है तथा अंतराष्ट्रीय न्यायालय के निर्णयों की अवहेलना कर रहा है। उसे देखते हुए यह गठजोड़ भविष्य के लिए महत्त्वपूर्ण  हो सकता है।

मध्य-पूर्व में शक्ति-संतुलन

मध्य पूर्व में भी अमरीका उहापोह की स्थिति में है। ट्रम्प मध्य पूर्व की यात्रा पर सबसे पहले सउदी अरब पहुँचे। यह सिया बहुल देश ईरान को साधने के लिए सुन्नी अरब जगत के साथ खड़ा होने की कोशिश थी। सउदी अरब और पाकिस्तान में नजदीकियाँ हैं। अमेरिका पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से लताड़ चुका है। पाकिस्तान अभी तक अमरीका से सैन्य और आर्थिक सहायता प्राप्त करने के बावजूद भी अफगानिस्तान में अमरीकी हितों के खिलाफ कार्य कर रहा है। पाकिस्तान वहां की अफगान सरकार को अस्थिर करने की कोशिश में वहां के तालीबानों की मदद कर रहा हैं। बदलते परिवेश में अमरीका अब अफगानिस्तान में भारत के लिए ‘नई अफगान नीति’ में महत्त्वपूर्ण भूमिका चाहता है। भारत पिछले कई वर्षो में आतंकवाद से ग्रस्त अफगानिस्तान में लोकतंत्र व शांति बहाली के लिए कार्य करता आ रहा है। लेकिन भारत को अब अफगानिस्तान संबंधी अमरीका की नई नीति के अतंगर्त फूक-फूककर कदम रखने की जरूरत है। इसमें दूसरो की आग में अपने हाथ जल जाने का खतरा भी है। अमरीका चाहता है कि भारत अपने सैनिक अफगानिस्तान में भेजे ताकि अमरीका वहां से अपने सैनिक निकाल सके। भारत अभी तक वहां चिकित्सा सड़क परिवहन, विद्युत व सिंचाई के क्षेत्र में अपनी भूमिका निभा रहा है आगे भी असैनिक क्षेत्र में ही अपनी भूमिका जारी रखे। यही भारत के हित में होगा। क्योंकि वहां पर गृह युद्ध का लंबा इतिहास है। मध्यपूर्व में इस्लामिक आंतकवाद अपनी जड़े गहरी जमा चुका है। धार्मिक कट्टरता, कबीलाई संस्कृति, घरेलू परिस्थितियाँ तथा अतंराष्ट्रीय राजनीति ने इस क्षेत्र को आंतकी गतिविधियों का अखाड़ा बना दिया है। शीत युद्ध के दौरान सोवियंत संघ और अमरीका ने इस क्षेत्र की धार्मिक कट्टरता का प्रयोग एक-दूसरे को शह-मात देने के लिए किया। वर्तमान में आई.एस.आई., इराक और सिरिया में अपने कदम पीछे हटाने पर मजबूर हो गया है। लेकिन इस विचारधारा का इतनी आसानी से खात्मा नहीं किया जा सकता। खाड़ी युद्ध की यादे अब धुंधली पड़ने लगी है सद्दाम हुसैन को नई पीढ़ी नही जानती पर इराक अभी तक सुलग रहा है।

व्यापार युद्ध में संयुक्त-राष्ट्र की भूमिका 

अमरीका व दूसरी शक्तियों को इस क्षेत्र में फूक-फूककर कदम रखने चाहिए अन्यथा जब आग लगती है तो वह अपना-पराया नहीं देखती। अतंराष्ट्रीय राजनीतिक मसलों और आंतकवाद को अलग-अलग किया जाना बहुत जरूरी है, इस बारे में दृष्टि बिल्कुल साफ होनी चाहिए। उन देशों और संस्थाओं को भी सीमित बयानबाजी से आगे जाकर कड़े संदेश देने होगें जो विभिन्न मसलों का बहाना बनाकर आतंकवाद के पैरोकार बन जाते है। संयुक्त राष्ट्र संघ जो विश्व-व्यवस्था की नियामक इकाई है वह दिन-प्रतिदिन अप्रासंगिक होती जा रही है। वीटो के अधिकार प्राप्त कुछ देश नीति स्वार्थो हेतु इसका उपयोग करते हेै। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की विश्व-व्यवस्था से हम काफी आगे निकल आये है। भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान जैसे देश जहाँ विश्व की आबादी का एक बड़ा हिस्सा बसता है, उनको इस व्यवस्था में सही सहभागिता देनी होगी। सामूहिक नेतृत्व की भावना से प्रेरित नई विश्व-व्यवस्था के माध्यम से विश्व को उन्नति और शांति के पथ पर चलने की जरूरत है। 

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 विश्व के लिए खतरा है चीन