पैरिस जलवायु समझौते से अमेरिकी पलायन


Paris Climate Agreement
Paris Climate Agreement


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड टंªप ने पैरिस जलवायु समझौते से हटकर सबसे ज्यादा नैतिक झटका अमेरिकी  जनता को ही दिया है जो अपने बचपन से ही अमेरिकी महानता के किस्से सुनकर बडे हुए है। इसी अमेरिका को दुनिया की इतनी मिथ्या चिंता थी कि उसने जापान, लीबिया, वियतनाम, ईराक, अफगानिस्तान और सीरिया से लडाईयां लडी। युद्ध के लिये पैसा चाहिये और पैसों के लिये प्राकृतिक संसाधनोेें का अत्यधिक दोहन। मानवता के इतिहास में अगर किसी एक देश  ने पर्यावरण को सबसे ज्यादा क्षति पहुंचाई है तो वह अमेरिका ही है। इस समझौते से हटने के लिये जो भी कारण गिनवाये गये वह भी बचकाने से है। ट्रंप ने यह कहते हुये पैरिस जलवायु समझौते से बाहर होने की घोषणा की है कि इससे तो सिर्फ चीन और भारत को ही फायदा होगा। जो अमेरिका अभी तक ‘वैश्विक  गांव’ की अवधारणा का प्रवचन देकर आर्थिक उदारीकरण का ढिंढोरा पीटता था। वह आज एंकाकी और संर्कीण सोच से प्रेरित आचरण कर रहा है।

पैरिस जलवायु समझौता क्या है ?

यह एक एतिहासिक संधि है। जिस पर विश्व के 195 के अधिक देशों ने दिसंबर 2015 में फ्रांस की राजधानी पेैरिस ने अपनी सहमति दी थी। भारत ने 2 अक्तूबर 2016 को इस समझौते के प्रति अपनी वचनबद्धता दोहराई थी। इस संधि का मुख्य उदेश्य जलवायु परिवर्तन के बढते खतरे को देखते हुये वैश्विक तापमान में 2 डिग्री सैल्सीयस की कमी लाना है ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन में सन् 2010 की तुलना में 2050 तक 40 से 70 प्रतिशत की कमी लाना है। उसके बाद 2100 तक शून्य का स्तर तय किया गया हैै। इसमें यह प्रावधान किया गया है कि विश्व के कम से कम 55 देश जो कम से कम 55 प्रतिशत वैश्विक ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन करते है और इस समझौते पर हस्ताक्षर कर देते है तो यह कानूनी रुप से बाध्यकारी हो जायेगा। इस संधि पर शुरुआत में ही 177 सदस्य देशों ने हस्ताक्षर कर दिये थे। जलवायु परिवर्तन पर इसी प्रकार का समझौता ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ है जिसकी वैधता 2020 तक है लेकिन उस पर व्यापक सहमति की कमी है। कार्बन उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग को काबू में रखने के लिये पैरिस समेलन के दौरान समस्त सदस्य देशों ने अपने-अपने योगदान को लेकर प्रतिबद्धता जताई थी। हर देश के स्वेच्छा से कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्य तय किये गये थे। यह लक्ष्य न तो कानूनी रुप से बाध्यकारी है और न ही इन्हे लागू करने की कोई व्यवस्था अभी तक बनी है।

पैरिस जलवायु समझौता और भारत 

भारत की लम्बी समुन्द्री सीमा है। विश्व तापमान में थोडी भी बढ़ोतरी तटीय जनसंख्या और संसाधनों को हानि पहुंचा सकती है। भारत के यह मौसम के बदलते मिजाज का ही असर है कि चेन्नई, कश्मीर और राजस्थान में बाढ आ जाती है गर्मी के शुरूआती दिनों मे ही पारा 48 डिग्री सैल्सीयस तक जा पहुंचता है। गंगोत्री, युमनोत्री के ग्लेशियर पीछे खिसक रहे है। केदारनाथ जैसी त्रासदी हो सकती है। स्वच्छ पेयजल के स्त्रोत खत्म हो रहे है।

हांलाकि भारत में पर्यावरण और विकास के बारे में परस्पर विरोधी नज़रिया रहा है। लेकिन हमें सामाजिक आर्थिक और परिस्थितिक कारणों से हरित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने की जरूरत है। हमें पैट्रोलियम पदार्थाें पर अपनी निर्भरता घटाने का अवसर समझकर अच्छी टिकाऊ और समावेषी अर्थव्यवस्था की दिशा  में कदम बढाने चाहिये। भारत जैसी बढती अर्थव्यवस्था में कार्बन उत्सर्जन में कटौती का अर्थव्यवस्था पर सबसे अधिक असर पडेगा। साल 2030 तक भारत ने अपनी कार्बन उत्सर्जन तीव्रता को 2005 के मुकाबले 33-35 फीसदी कम रखने का लक्ष्य रखा है। इसके लिये कृषि , जलसंसाधन, तटीय इलाकों, स्वास्थय और आपदा प्रबंधन पर भारी निवेश की आवश्यकता है। भारत-पैरिस समझौते में विकसित और विकासशील देशों के बीच अंतर स्थापित करवाने में सफल रहा था जिसकी टीस डोनाल्ड टंªप के करोडो डालर वाले ताने में झलकती है।


भारतीय जीवन दर्शन प्रकृति का सहचर माना जाता हैं। यहां पुरातन काल से ही वातावरण शुधि हेतु यज्ञों की परंपरा रही है। हमें पंचतत्वों पर आधारित प्रकृति के संरक्षण के लिये कोयला आधारित संयत्रों मे कमी लाकर और उर्जा की दिशा में महत्वपुर्ण परियोजनायें शुरू की है। कुडमकुलम परमाणु संयंत्र की इकाई 56 का समझौता भी इसी दिशा में उठाया गया कदम है। 

पैरिस जलवायु समझौता और अमेरिका विश्व के कुल कार्बन उत्सर्जन में अमेरिका 14.35 पर्तिशत  उर्त्सजन करता है। जो भारत का दुगुना है। प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन में अमेरिका विश्व में प्रथम है तथा एक आम भारतीय से 8 गुना अधिक कार्बन उत्सर्जन करता है। अमेरिका विश्व की सबसे बडी अर्थव्यवस्था है। यह आर्थिक विकास प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से प्राप्त किया है। अमेरिका को 2025 तक 28 प्रतिशत  कार्बन उत्सर्जन घटाना है जिससे उनकी 27 लाख नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है। समझौते के प्रावधानों के मुताबिक विकसित देशों द्वारा विकाशील देशों को नई तकनीक के लिये वार्षिक 6.44 लाख करोड रुपये दिये जाने थे लेकिन ट्रम्प की व्यापारिक बुद्धि इसे पचा नही पा रही है। 2015 में भारत को इस समझौते के तहत 19 हजार करोड रुपये की मदद मिली जिसमें अमेरिका का हिस्सा महज 600 करोड रुपये का है। अमेरिका जिस आर्थिक मदद का ढिंढोरा पीट रहा है वह भारत के लिये नगण्य हैै। इस समझौते से पलायन का एक दुष्प्रभाव अमेरिकी उत्पादनों पर भी पडेगा क्योंकि सदस्य देश  अमेरिकी उत्पादनों पर कार्बन टैरिफ लगा सकते है जिससे वह महंगे हो जायेगें और अंततोगतवा अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर दुष्प्रभाव पडेगा। 

विश्व के सभी देशों में अमेरिका के इस कदम की निंदा की है। फ्रांस, इटली और जर्मनी के संयुक्त ब्यान जारी कर के कहा है कि अमेरिका एकपक्षीय तरीके से समझौते पर नये सिरे से मोलभाव नही कर सकता। फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने तो इसे ऐतिहासिक गलती करार दिया। अंतराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण के मुददे पर काम करने वाली संस्था ग्रीनपीस ने भी इसे वैश्विक हितों के विपरित बताया है। टंªप की संर्कीण सोच से निराषा के बीच भी आषा की किरण यह है कि अमेरिका के परम्परागत मित्र देश  भी समझौते के साथ खडे नजर आ रहे है लेकिन एक बडा सवाल यह खडा होता है कि अगर विश्व का दूसरे नम्बर का प्रदूषक  देश  अमेरिका ही समझौते को मानने से इंकार कर दे तो पैरिस जलवायु समझौते का भविष्य क्या होगा।

 पैरिस जलवायु समझौते पर अब चीन की पहल 

अमेरिका के किनारा करने के बाद अब पैरिस जलवायु समझौते का नेतृत्व चीन दवारा किये जाने की चर्चा शुरू हो गयी। खुद चीन ने भी इसके लिये अपनी रजामन्दी जाहिर कर दी है। यह कुछ-कुछ वैसी ही स्थिति है जैसे बिल्ली को दुुध का पहरेदार बैठा देना। चीन का कार्बन उत्सर्जन विश्व के कुल उत्सर्जन का लगभग एक तिहाई है। सीमेंट , स्टील व उर्जा क्षेत्रों में चीन पर्यावरण के तय मानकों का सम्मान नही करता। हालांकि पिछले दिनों उसने 100 से ज्यादा कोयला आधारित संयंत्रों  का निर्माण रदद कर दिया है। लेकिन अपनी विकास दर को बनाये रखने के लिये और चीनी जनता के रोजगार को बनाये रखने के लिये चीन अपनी  वायदों पर खरा उतरेगा, इसमें संदेह है। क्योंकि चीन के लाखों रोजगार कोयले, स्टील के कार्बन उत्सर्जन वाले उद्योगों से जुड़े है। अमेरिका के परिदृशय  से हट जाने के कारण चीन को अपनी महत्वाकाक्षाओं को बढाने का मौका मिल सकता है चीन की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं को भी पंख लग सकते है।

               इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि दुनिया की सबसे बडी अर्थव्यव्स्था और स्वघोषित एकमात्र विश्व शक्ति के पास दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जाकर तनाव पैदा करने के लिये तो धन है लेकिन अपनी भावी पीढियों तक विगत प्रकृति के अंधाधुंध दोहन के पापों के प्राश्चित के लिये धन की कमी हो जाती है। हम आशा कर सकते है कि टंªप को यह समझ आयेगी कि एक उद्योगपति ओैर राष्ट्रपति का दृष्टिकोण अलग-अलग होना चाहिये। देर-सवेर अमेरिकी जनता के दबाव में टंªप को अपनी हठ-धर्मिता छोडकर पैरिस जलवायु समझौते को मानना ही होगा। ये अलग बात है कि वह इसके लिये कुछ शर्तों के रुप में राहत चाहेगा जिसका जिक्र ट्रम्प  ने अपने व्यक्तव्य में कर दिया था। अमेरिका का यह शुतुर्मुर्गी रवैया ज्यादा देर तक नही चल सकता।



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